Film Review: 'डियर जिंदगी' में कुर्सी से सीखिए प्यार का फलसफा
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-निर्देशकः गौरी शिंदे
-सितारेः आलिया भट्ट, शाहरुख खान, कुणाल कपूर, अली जफर
रेटिंग *1/2
अगर आप बहुत दिनों से बोर नहीं हुए तो डियर जिंदगी स्वर्णिम मौका है। फिल्म उनके लिए भी है जिन्हें नींद नहीं आती। जो डिप्रेशन के शिकार हैं। जो जानना चाहते हैं कि उन्हें पैदा करने का आइडिया मां-बाप में से किसका था। जो जिंदगी से ऊबकर समय काटने के लिए जुबानी खर्च की रईसी दिखाते हैं। जिनके पास कालाधन बाकी है।
यह प्लास्टिक किरदारों की प्लास्टिक फिल्म है, जो प्लास्टिक मनी से भी न्याय नहीं करती। आपके भीतर जिंदगी की धड़कनें हैं तो कम से कम आलिया भट्ट के बनावटी हाव-भाव वाले चेहरे के साथ इसे बर्दाश्त कर पाना बेहद कठिन है। कहानी कायरा (आलिया भट्ट) की है, जो फिल्मी दुनिया में डीओपी है यानी कैमरा उसके कंधों पर रहता है।
वह इतनी टेलेंटेड उर्फ खूबसूरत है कि ऐड-फिल्म अच्छी बनने का श्रेय निर्देशक से ज्यादा उसे मिलता है। प्रोड्यूसर (कुणाल कपूर) उसे फिल्म ऑफर करता है। कायरा का बॉयफ्रेंड रेस्तरां मालिक है। फिल्म मिलने होने पर वह बॉयफ्रेंड से रिश्ता तोड़ लेती है। मगर प्रोड्यूसर से वादा नहीं करती कि उसके जीवन में सदा रहेगी। सो, प्रोड्यूसर दूसरी लड़की से सगाई कर लेता है।
अब कायरा परेशान है कि फिल्म करे या न करे? तब उसकी मुलाकात मनोचिकित्सक जहांगीर खान (शाहरुख खान) से होती है। खान अलग-अलग मुलाकातों में कायरा को जिंदगी के फंडे समझाता है। यह काम क्लिनिक में, समुंदर किनारे, खुली सड़क पर साइकिल चलाते और पानी की बोट में चलता रहता है। आप सोचते हैं कि आखिर कितना समझाने पर कायरा के दिमाग की बत्ती जलेगी! फिल्म खत्म होने से पहले आपका धैर्य फ्यूज हो जाता है।
मैट्रो जीवन की तथाकथित जटिलाओं में जीने वाले भले इस फिल्म में कुछ बीन लें, मगर वास्तविक दर्शक के लिए कुछ नहीं है। सिर्फ वक्त और पैसा गंवाना है। शाहरुख स्टारडम की सीढ़ियों से उतरते हुए ऐक्टिंग का शौक पाल रहे हैं। मगर उनके चेहरे से ‘बूढ़ा-तलाकशुदा-राहुल’ झांकता है। आलिया कनफ्यूज हैं। अपनी हर फिल्म में ज्यादा इंटेलिजेंट, ज्यादा मैच्योर दिखने की कोशिश में हैं।
डायरेक्टर गौरी शिंदे ने इंग्लिश विंग्लिश में जो पाया था, वह इस फिल्म में गंवाया है। वह कायरा की बेहद पर्सनल कहानी के साथ स्त्रीवाद काएजेंडा लिए आगे बढ़ती हैं। एजेंडे कहानियों को नाकाम बनाते हैं। साहित्य और सिनेमा दोनों का इतिहास गवाह है।