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अच्छी शुरुआत के बाद बिखर जाती है डी-डे

Fri, 19 Jul 2013 01:40 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 19 Jul 2013 01:40 PM IST
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movie review of d day

लोग समझते हैं कि पाकिस्तान कोई मुंसीपाल्टी का बगीचा है कि हाथ बढ़ाया और पौधे में लगे फूल को तोड़ लिया। फिल्म में एक ब्यूरोक्रेट यह शिकायत करता है। पाकिस्तान को लेकर जनता की भावना ब्यूरोक्रेट्स और राजनेताओं को रास नहीं आती।

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आखिरकार पाकिस्तान पड़ोसी मुल्क है और हम उसके साथ वैसा बर्ताव कैसे कर सकते हैं, जैसा अमेरिका ने किया था। बिना इजाजत घुस कर आतंकी ओसामा बिन लादेन को मार गिराया! जनता पूछती है कि हम क्यों ऐसा नहीं कर सकते? जबकि हमारा ‘मोस्ट वांटेड’ गुनहगार वहां छुपा बैठा है।
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देश में होने वाले हर धमाके के पीछे उसकी साजिश होती है। हम क्यों अभी तक इस बात के पुख्ता सबूत तक नहीं जुटा सके कि पाकिस्तान ने ही उसे अपना ‘दामाद’ बना रखा है?
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निर्देशक निखिल आडवाणी इन्हीं बातों के पंख लगा कर कल्पना की एक दुनिया में प्रवेश करते हैं-वंस अपॉन अ टाइम इन कराची। इस कल्पना के बीज हॉलीवुड की उन रैंबो या जेम्स बॉन्डनुमा कहानियों में ढूंढे जा सकते हैं, जिनमें अमेरिका और ब्रिटेन के ये नायक दुश्मन देशों में घुस कर अपने मिशन को अंजाम देते हैं।

आडवाणी की कहानी में मिशन है मोस्ट वांटेड अंडरवर्ल्ड डॉन इकबाल (ऋषि कपूर) को जिंदा पकडऩा। इसके लिए रॉ के एजेंट पाकिस्तान में हैं, लेकिन नाकाम। तभी अचानक खबर आती है कि डॉन के बेटे की शादी पाकिस्तान के एक क्रिकेटर के बेटे से होने जा रही है।

डॉन फैसला करता है कि वह शादी में जरूर मौजूद होगा, जबकि पाकिस्तान के सैन्य और खुफिया अधिकारी यह नहीं चाहते। वे नहीं चाहते कि डॉन के उनके यहां होने का कोई सबूत सामने आए।

उधर, रॉ से अलग एक भारतीय जासूस/एजेंट वली (इरफान) बेहद खुफिया ढंग से वहां रह रहा है। पाकिस्तानी बन कर। उसका कटिंग सेलून है, जिसमें वह अपने पड़ोसी आईएसआई एजेंट के दाढ़ी-बाल बनाता है। उसकी बीवी और बच्चा भी है।

वली को डॉन का राज पता चलता है और वह समझ जाता है कि यह ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ जैसा मौका है। भारत खबर पहुंचती है और दो और सीक्रेट एजेंट (अर्जुन रामपाल, हुमा कुरैशी) वली के पास पाकिस्तान पहुंच जाते हैं। फिर शुरू होता है मिशन गोल्डमैन। डॉन को पकडऩे का मिशन।

निश्चित रूप से आडवाणी ने खाका बढिय़ा खींचा, जो आकर्षित करता है। डॉन के बेटे की शादी के दृश्य के साथ फिल्म रफ्तार से शुरू होती है। एजेंट डॉन की घेराबंदी करते हैं। रोमांच पैदा होता है। फिल्म की कहानी किसी हकीकत की तरह दिखती है।

साथ ही यह सवाल भी झूलने लगता है कि क्या डॉन पकड़ा जाएगा...? क्या दो तेज तर्रार और एक हसीन एजेंट कामयाब होंगे...? क्या डॉन को जिंदा हिंदुस्तान लाकर उसकी गलतियों की सजा जाएगी या फिर भारतीय बांकुरे अमेरिकी जांबाजों की तर्ज पर पाकिस्तान में एक और एबटाबाद दोहरा देंगे...?

लेकिन तभी एक लव स्टोरी शुरू हो जाती है! हिंदुस्तानी सीक्रेट एजेंट को कराची के रेड लाइट एरिया की एक वेश्या से प्रेम हो जाता है। उसके प्रेम में वह पागल तो नहीं होता, लेकिन प्रेमिका पर जुल्म करने वाले से बदला लेने को अपने मिशन में शामिल कर लेता है!

वास्तव में अर्जुन रामपाल की मेहनत और कहानी के रोमांच पर पानी फिरने की शुरुआत यहां से होती है और बूंद-बूंद गिरता पानी, जैसे-जैसे फिल्म बढ़ती है पाइप से फूटती धार की तरह बहने लगता है।

कहानी का तिलिस्म टूटने लगता है। नायक-नायिका बेवजह भाग-दौड़ करते दिखते हैं। डॉन हास्यास्पद होता चला जाता है। कयामत बीच में ही आ जाती है। अंत में जो कुछ होता है वह किसी खयाली पुलाव से कम नहीं लगता। इसमें संदेह नहीं कि पाकिस्तान में छुपे बैठे आतंकी दाऊद इब्राहिम को आधार बना कर सब कुछ रचा गया है। ऋषि कपूर के दाऊद के किरदार को जबर्दस्त हाइप भी दिया गया, लेकिन अंतत: उनके गेट-अप और आखिर में एकालाप जैसे एक संवाद के सिवा याद रखने जैसा कुछ नहीं है।

इरफान और अर्जुन का अभिनय अच्छा है। श्रुति हासन हालात की मारी वेश्या के किरदार से न्याय करती हैं, जबकि हुमा कुरैशी को खास मौका नहीं मिल सका।

इंटरवल से पहले कसी हुई फिल्म दूसरे हिस्से में एकाएक खुल कर बिखर जाती है। दिलचस्पी को बनाए रखने में वह नाकाम हो जाती है। फिल्म में कुछ संवाद जरूर अच्छे हैं, लेकिन वे नाकाफी हैं।


करीब एक दशक पहले पाकिस्तान विरोधी फिल्मों का दौर बॉलीवुड में आया था। यह फिल्म भी उसी तर्ज पर नए अंदाज में बातें करती है और पाकिस्तान तथा दुनिया को संदेश देती है कि भारत कमजोर नहीं है। उसे नए चश्मे से देखने का समय आ चुका है। अगर आप ऐसा कुछ देखना चाहते हैं, तो डी-डे आपके लिए है।

अगर नहीं तो अपने चश्मे को कुछ और देखने के लिए संभाल कर रखें।

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