Loveyapa Review: बड़े परदे पर उतरते ही जुनैद खान की खुशी हुई काफूर, तमिल फिल्म की रीमेक का नहीं चला जादू
‘सीक्रेट सुपरस्टार’, ‘लाल सिंह चड्ढा’ और अब ‘लवयापा’। पहली दोनों फिल्मों को बनाने वाली कंपनी आमिर खान प्रोडक्शंस, तीसरी फिल्म बनाई है कभी अनुराग कश्यप, विकास बहल, विक्रमादित्य मोटवानी और मधु मंटेना की शुरू की कंपनी फैंटम ने। पहले तीनों नाम अब कंपनी का हिस्सा नहीं हैं। नेटफ्लिक्स को भारत में स्थापित करने वाली सृष्टि बहल इसकी सीईओ हैं। उनके नेतृत्व में बनी ‘लवयापा’ नए फैंटम की नई फिल्म है। कहानी तीन साल पहले आई तमिल फिल्म ‘लव टुडे’ से ली गई है। ‘लापता लेडीज’ की पटकथा लिखने वाली और ‘महाराज’ में मदद करने वाली स्नेहा देसाई ने एक ऐसी फिल्म की पटकथा लिखने की जिम्मेदारी यहां संभाली है जिसके दोनों मुख्य किरदारों से शायद ही असल जिंदगी में उनका कभी वास्ता पड़ा हो।
फिल्म ‘लव टुडे’ देखने के बाद से ही मुझे लगता रहा कि आखिर इस पर कोई हिंदी फिल्म बनाने की सोच भी कैसे सकता है? तमिल दर्शकों की संवेदनाएं ‘86’ और ‘मारा’ जैसी फिल्मों पर निछावर रहती हैं, हिंदी दर्शकों का प्यार या तो ‘बड़ा नाम करेंगे’ जैसी कहानियों पर उमड़ता है या फिर ‘पहले भी तुमसे मिला हूं’ वाले गानों की फिल्म ‘एनिमल’ पर। हिंदी सिनेमा का दर्शक एक्स्ट्रीम पर डोलने वाला दर्शक है, उसे बीच का अधपका सा कुछ नहीं चाहिए। ‘लवयापा’ की दिक्कत यही है। यहां न तो ‘एक दूजे के लिए’ जैसा एक्स्ट्रीम है और न ही ‘लव स्टोरी’ जैसा ही कुछ। लड़का और लड़की के प्रेम में बाधाएं अब सामाजिक नहीं बल्कि वैयक्तिक हैं। इनकी खुद की बनाई हुई। प्रेम में होने के बाद भी अतीत के प्रेम में अटके रहना या फिर दैहिक इच्छाओं के दमन के लिए वे सारी हरकतें करते रहना, जिनके लिए डिजिटल दौर आने से पहले ‘मस्तराम’ मदद किया करते थे।
साल 2025 की प्रेम कहानी में विलेन कौन होगा? फिल्म ‘लवयापा’ का असल सवाल यही है। आशुतोष राणा बेटी के पिता के किरदार में हैं। बढ़िया सितार बजाते हैं। शुद्ध हिंदी बोलते हैं। घर की दीवार पर उनकी नेमप्लेट उनके शैक्षिक स्वाभिमान का पोस्टर बन चुकी है। दोनों बेटियां पिता से डरती है। उपहार में मिला फोन मॉल में हुए कंपटीशन में जीता हुआ बताती हैं यानी कि झूठ बोलने में उस्ताद हैं। बड़ी वाली दो कदम आगे है। एक लड़के से प्रेम करती है। उससे झूठ बोलकर पहले वाले संग लॉन्ग ड्राइव पर जाती है। और, उससे पहले वाले को साथ लेकर अपने मौजूदा बॉयफ्रेंड से मिलने आती है। जेन जी का ऐसा इंट्रोडक्शन देना जरूरी था क्या? माशूक ऐसी है तो आशिक भी कम नहीं है। वह पोर्न देखता है और ये कहने की हिम्मत रखता है कि ये सब देखता हूं तभी अपनी माशूक के साथ शरीफ रह पाता हूं। मां समझाती भी है, ‘हर दो साल पर मोबाइल बदले जाते हैं, रिश्ते नहीं।’ लेकिन, संवादों का क्या? जब फिल्म ही पूरी मार्केटिंग डील्स में बन गई हो।
फिल्म ‘लवयापा’ की रिलीज से पहले पहली बार अभिनेता जुनैद खान से सीधी मुलाकात हुई। इस मुलाकात में ही समझ आ गया कि वह अभी हिंदी सिनेमा के हीरो बनने को तैयार नहीं हैं। पिता आमिर खान भले उन्हें जमीन से जुड़ा सितारा बताने के लिए तमाम बनावटी किस्से सुनाते रहे हों, पर जुनैद को अपने पूर्वजों का घर लखनऊ याद है, शाहाबाद (हरदोई) नहीं। किरदारों की तैयारी उनकी कैसी है और किसने करवाई है, इसका खुलासा तो जब होगा, तब होगा लेकिन उनको बदलती दुनिया के सामान्य ज्ञान का रत्ती भर भी इल्म नहीं है। हर सवाल से पहले और बाद में तीस सेकंड तक हंसकर वह जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं और फिल्म के परदे पर भी उनके वही भाव दिखते हैं तो समझ आता है कि ये उनके अभिनय का शायद स्थायी भाव है। निर्देशक की कमजोरी ऐसे में ही समझ आती है। फिल्म ‘महाराज’ में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने जो जंग जीत ली थी, उसमें ‘लवयापा’ के निर्देशक हार गए हैं।
पंजाबी शब्द ‘सियापा’ और लव से बने फिल्म के नाम ‘लवयापा’ की क्रिएटिविटी आमिर खान की है। याद रखने वाली बात ये है कि ऐसी ही क्रिएटिविटी आमिर अपने भांजे इमरान के लिए डी के बोस जैसे गाने बनाकर भी दिखा चुके हैं। इमरान खान को हिंदी सिनेमा का धूमकेतु बने जमाना हो चुका है। जुनैद भी उसी राह न चल निकलें, उसके लिए उन्हें अपने पिता आमिर खान के सामने वैसे ही डटकर खड़ा होना होगा, जैसे सूरज बड़जात्या की पहली सीरीज ‘बड़ा नाम करेंगे’ का हीरो अपने ताऊजी के सामने खड़ा होता है। दो नए सितारों की दो नई प्रेम कहानियां देखने को इस हफ्ते मिलीं। एक सात घंटे की है लेकिन कतई बोर नहीं करती है। दूसरी सवा दो घंटे में ही पका देती है।
फिल्म ‘लवयापा’ की प्रेम कहानी का जरूरत से ज्यादा वैयक्तिक होना। सामाजिक परिवेश में उसका कोई योगदान न होना और प्रेम की बाधाएं समाज की न होकर खुद की बनाई हुई होना, इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी है। दूसरी बड़ी कमजोर कड़ी फिल्म की हीरोइन खुशी कपूर हैं। वह भी अभी पूरी तरह से कैमरा फेस करने को तैयार नहीं हैं। सिनेमैटोग्राफी, संपादन, संवाद, संगीत सब दोयम दर्जे का है इस फिल्म का। आमिर खान के बेटे की बड़े परदे पर बोहनी इससे बेहतर फिल्म से होनी चाहिए थी। फिल्म में जुनैद और खुशी से बेहतर ट्रैक किकू शारदा और तनविका का है। अपने शरीर के चलते लगातार सामाजिक प्रताड़ना झेलते एक युवक के किरदार में किकू खूब चमके हैं और उनके मोबाइल के भीतर झांकने की कोशिश में लगी रहने वाली उनकी मंगेतर बनी तनविका का काम भी नोटिस करने लायक है।