Jai Bhim Review: भारतीय सिनेमा के ताज में दक्षिण का दमकता नगीना, सूर्या, लिजोमोल की दर्शनीय अदाकारी
ये सच है कि सिनेमा सामूहिक मनोरंजन का सबसे सशक्त माध्यम है, लेकिन कोरोना संक्रमण काल ने ये भी सिखाया कि सिनेमा की सबसे सशक्त पहुंच का माध्यम एक ही है और वह है ओटीटी। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के तमाम इलाकों में अब भी मुसहर जाति रहती है। चूहे पकड़कर खाना उनकी मजबूरी है। दक्षिण भारत में रहने वाली ऐसी ही एक जाति के लोगों की कहानी कहती है फिल्म ‘जय भीम’। अपने नाम से ये फिल्म एक एजेंडा फिल्म भले लगती हो लेकिन एजेंडा अगर सच्चाई को दुनिया के सामने लाना हो तो ऐसा हर एजेंडा स्वागत योग्य होना ही चाहिए। वामपंथी विचारधारा से प्रभावित एक वकील इरुलर जाति के आदिवासियों के पुलिस उत्पीड़न का मामला अपने हाथ में लेता है और उसे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के सहारे अंजाम तक पहुंचाता है। फिल्म ‘जय भीम’ मद्रास हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस चंद्रा के उस चर्चित मामले पर आधारित है जो उन्होंने अपनी वकालत के दिनों में लड़ा। हालांकि, असल में ये मामला कुरवा जनजाति के लोगों के उत्पीड़न का था।
फिल्म ‘जय भीम’ को अपनी असल कहानी पर आने में थोड़ा वक्त लगता है। फिल्म पहले आदिवासी जनजाति के लोगों की जीवन शैली की तरफ ध्यान खींचती है। ये लोग खेतो में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों को पकड़ते हैं और घरों में निकले विषैले सांपों को पकड़कर वापस जंगलों में छोड़ देते हैं। घर में निकले एक सांप को पकड़ने गए एक आदिवासी पर उस घर के लोग चोरी का आरोप लगा देते हैं। फिल्म शुरू होते वक्त दिखाया जाता है कि कैसे आपराधिक मामलों की कागजी खानापूर्ती करने के नाम पर पुलिस निर्दोष लोगों को जेल से रिहा होते वक्त ही फिर से पकड़कर हवालातों में डाल देती है। असरदार के घर चोरी को सुलझाने का दबाव पड़ने पर निर्दोषों की पुलिस हिरासत में बेरहमी से पिटाई होती है और एक दिन पुलिस हिरासत से तीन लोग लापता हो जाते हैं। लापता होने वाले एक आदिवासी की गर्भवती पत्नी अपने पति को खोजते खोजते एक ऐसे वकील के पास पहुंच जाती है जिसके लिए कानून वह इकलौता हथियार है जिसके जरिये शोषितों और वंचितों का इंसाफ दिलाया जा सकता है।
कहानी का नायक एक ऐसे सिस्टम के खिलाफ जंग छेड़ता है जहां इन आदिवासियों के वोटर कार्ड तक बन पाना दूभर है। मामला परत दर परत खुलना शुरू होता है तो थाने से लेकर पुलिस महानिदेशक तक सबकी कुर्सी हिलने लगती है। पीड़ित को खरीदने की कोशिश होती है। वकील पर दबाव पड़ता है लेकिन मार्क्स और लेनिन के विचारों को मानने वाला अंबेडकर का ये अनुयायी अपनी लड़ाई जारी रखता है। फिल्म ‘जय भीम’ देश के हालात पर एक राजनीतिक टिप्पणी भी है और सामाजिक विसंगतियों का आईना भी। फिल्म की कहानी बीसवीं सदी के उस दशक की कहानी है जब देश में मंडल कमीशन लागू हो चुका है और तमिलनाडु की राजनीति में जयललिता का बोलबाला है। लेकिन, फिल्म उस कालखंड की राजनीति में नहीं जाती और अपना फोकस सिर्फ पीड़ितों, पुलिस और न्यायपालिका पर बनाए रखती है।
फिल्म ‘जय भीम’ में वकील चंद्रू का रोल करने वाले सूर्या के अभिनय से ये फिल्म खाद पाती है। सूर्या ने यहां एक वामपंथी विचारधारा को मानने वाले आंदोलनकारी का किरदार तो निभाया है लेकिन वह अपनी विचारधारा में मानवता की हिमायत को आगे रखता है। वह बच्चों के फैंसी ड्रेस शो में किसी के अंबेडरकर न बनने पर भी टिप्पणी करता है और अंबेडकर के वे विचार भी उसके मन में गूंजते रहते हैं जिसमें वह दो हजार साल बाद भी अस्पृश्यता को लेकर टिप्पणी करते हैं। वकील चंद्रू के रोल में सूर्या ने फिल्म में बेहतरीन अभिनय किया है। लेकिन, फिल्म असल पानी पाती है इसके सहायक कलाकारों के अभिनय से। गर्भवती आदिवासी महिला के किरदार सेनगेनी के किरदार में अभिनेत्री लिजोमोल जोस ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने लायक अभिनय किया है। उसका आर्तनाद दर्शकों को भीतर तक हिला देता है। हिरासत में बुरी तरह पीटे गए पति को एक कौर अन्न खिलाने की उसकी कोशिश दर्शकों को सिहरा देती है और अपनी बेटी को उठा लिए जाने के बाद तिराहे पर उसकी चीत्कार सिस्टम के खिलाफ विक्षोभ पैदा करती है। इन दोनों के साथ ही फिल्म में के मणिकंदन, राजिशा विजयन, राव रमेश और प्रकाश राज ने भी अच्छा अभिनय किया है।
दमदार अदाकारी से सजी फिल्म ‘जय भीम’ के लिए जमीन तैयार करने में इसकी तकनीकी टीम ने भी गजब का साथ दिया है। के काथिर के कला निर्देशन ने फिल्म को उसके कालखंड में मजबूती से स्थापित करने का काम किया है। खासतौर से अदालती कार्यवाही के लिए बनाए गए सेट फिल्म को सच्चाई के करीब बनाए रखते हैं। एस आर काथिर की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के साथ दर्शकों को शुरू से आखिर तक जोड़े रखने में कामयाब है। फिल्म में उनका कैमरा शुरू में तो तटस्थ होकर घूमता है लेकिन एक बार सूर्या के परदे पर आने के बाद ये कैमरा दर्शकों की आंखें बन जाता है और जल्द ही दर्शक फिल्म का हिस्सा बनने लगते हैं। फिल्म में शॉन रॉल्डन का संगीत इसके भावनात्मक पहलुओं को मजबूती से पेश करने में मदद करता है। फ़िल्म वैसे तो हिंदी में भी प्राइम वीडियो पर उपलब्ध है लेकिन अगर सबटाइटल्स के साथ गैरहिंदी, गैर अंग्रेजी फिल्में देखने की आदत आपने डाल ली है तो इसे तमिल में देखना ही सबसे मुफीद होगा।