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फिल्म समीक्षा/द लीजंड ऑफ माइकल मिश्रा: प्यार में कभी कभी
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
Updated Sat, 06 Aug 2016 05:38 PM IST
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निर्देशकः मनीष झा
सितारेः अरशद वारसी, अदिति राव हैदरी, कायोज ईरानी, बोमन ईरानी
रेटिंग **1/2
कभी न कभी प्यार सबको होता है। कभी कम उम्र में तो कभी बढ़ी उम्र में। कभी एक तरफा तो कभी दो तरफा। कभी सीरियसली तो कभी गफलत में। कभी इस प्यार का अंजाम ट्रेजिक होता है तो कभी कॉमिक। निर्देशक मनीष झा की फिल्म द लीजंड ऑफ माइकल मिश्रा प्यार की ऐसी कॉमिक कहानी कहती है, जिसमें सामने एक पहलू दिख रहा होता है और अंत होते-होते दूसरा पहलू प्रकट होकर चौंका देता है। फिल्म मुख्य रूप से उनके लिए है जो सिनेमा में ऐसा अंदाज-ए-बयां देखना चाहते हैं जो रूटीन फिल्मों से हट कर हो। जिसमें कहानी भले ही बॉलीवुड के अंदाज की हो लेकिन उसे कहने का ढंग जरा अलग हो। मनीष की फिल्म ऐसी ही है।
फिल्म में पटना के जिस माइकल मिश्रा (अरशद वारसी) की कहानी आप देख रहे होते हैं, वह असल में सुनाई जा रही होती है। सुनाने का काम बोमन ईरानी ने किया है। नन्हा माइकल दर्जी है और इस काम में उसे महारत हासिल है। मगर एक बार उसके हाथों धोखे से पटना का गैंगस्टर मारा जाता है और लोग उसे सिर-आंखों पर बैठा लेते हैं। यह घटना माइकल को टेलर से किडनैपर बना देती है। मगर दूसरा हादसा इससे बड़ा होता है जब पुलिस की पकड़ से भागते हुए एक लड़की माइकल को दिखती है और वह उसे दिल दे बैठता है।
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फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, इस सीधी बात में कई पेंच सामने आते हैं। फिल्म में अदिति राव हैदरी और बोमन ईरानी के पुत्र कायोज ईरानी भी अहम भूमिकाओं में हैं। फिल्म जाने भी दो यारो और अंदाज अपना अपना जैसी फिल्मों के नरेशन तथा अभिनय वाले अंदाज की इस फिल्म की एकमात्र समस्या रफ्तार है। यह धीमी गति से बढ़ती है और क्लाइमेक्स पूर्व कुछ हिस्सों में दोहराव दिखता है। किडनैपिंग और क्राइम के संदर्भों के बावजूद थ्रिल का अभाव अखरता है। परंतु आखिरी आधे घंटे का रोमांच काफी कुछ भरपाई करता है।
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अरशद वारसी और अदिति कुछ दृश्यों में जमे हैं परंतु उनका काम ऐसा नहीं कि पूरी फिल्म पर असर छोड़े। कोयज कहीं-कहीं प्रभावी हैं। बोमन से यहां कोई खास उम्मीद करना ठीक नहीं होगा। मनीष झा को अपनी पहली फिल्म मातृभूमि-अ नेशन विदाउट वीमन (2005) के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली थी। उनकी अगली फिल्म अनवर (2007) नाकाम रही थी। लंबे समय बाद वह अब माइकल मिश्रा के साथ लौटे हैं। अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करने के लिए मनीष को निरंतर काम करना होगा। कभी कभी काम करने से बात नहीं बनेगी।