फिल्म समीक्षा/शोरगुल: कोई नहीं बचाएगा प्रेमपत्र
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निर्माताः स्वतंत्र विजय सिंह/व्यास वर्मा
निर्देशकः जितेंद्र तिवारी/पी.सिंह
सितारेः जिमी शेरगिल, आशुतोष राणा, हितेन तेजवानी, संजय सूरी, नरेंद्र झा, एजाज खान, सुहा गजेन, अनिरुद्ध दवे
रेटिंग ***
हर धर्म प्रेम और इंसानियत का संदेश देता है। सद्भाव सिखाता है। शांति का आह्वान करता है। इसके बावजूद अगर अमानवीयता, भेदभाव और हिंसा का शोरगुल है तो साफ है कि संदेश लोगों के आचरण में नहीं उतरा। निर्देशक जितेंद्र तिवारी/पी.सिंह की फिल्म इसी निहितार्थ के साथ संवाद करती है, मगर इसकी एप्रोच राजनीतिक है। यूपी का परिदृश्य फिल्म की पृष्ठभूमि में है। जो गंगा-जमुनी संस्कृति होने पर भी धर्मगत/जातिगत रूप से संवेदनशील माना जाता है।
शोरगुल सहज भाव से शुरू होती है। रघु (अनिरुद्ध दवे) और जैनब (सुहा गजेन) बचपन के दोस्त हैं। पड़ोसी हैं। एक कॉलेज में पढ़ते हैं। जैनब का निकाह सलीम (हितेन तेजवानी) से तय हो चुका है। स्थितियां तब बदलती हैं जब सलीम का चचेरा भाई आता है। वह रघु-जैनब की दोस्ती को दोस्ती की तरह नहीं देखता। उधर, धीरे-धीरे मालूम होता है कि रघु मन ही मन जैनब को चाहता है। इस बीच स्थानीय नेताओं के रंग उभरते हैं, जो धर्म की राजनीति को हवा देते हैं। यह हवा तब बवंडर में बदल जाती है जब जैनब के सामने रघु के दिल का हाल खुलता है और सलीम के चचेरे भाई के हाथों रघु मारा जाता है।
इसके आगे की कहानी धर्म के नाम पर नेताओं द्वारा लोगों को उकसाने, दंगा कराने, मार-काट और नफरत की राह पर बढ़ जाती है। इन हालात में प्रेम और मनुष्यता को बचाए रखने का संघर्ष भी यहां है।
दूरे भाग में दंगे और राजनीति
फिल्म पहले हिस्से में उतार-चढ़ाव से भरी रोचक प्रेम कहानी से बांधे रखती है और दूसरे हिस्से में उसका ट्रेक दंगों और राजनीति की तरफ मुड़ जाता है। यहां भाषा आक्रामक है। उद्वेलित करती है। निर्देशक कथानक और संवादों को सच्चाई के करीब रखने में कामयाब हैं। फिल्म बताती है कि मुट्ठी भर नेता और धर्म के ठेकेदार अपने फायदे के लिए कैसे जनता का इस्तेमाल करते हैं।
शोरगुल किसी भी स्तर पर अनावश्यक रूप से भावुक नहीं होती। इसे देखते हुए हिंदी की प्रसिद्ध प्रेम कविताओं में शुमार बद्री नारायण की ‘प्रेत आएगा’ की आखिरी पंक्तियों की विवशता याद आती हैः प्रलय के दिनों में सप्तर्षि मछली और मनु/सब वेद बचाएंगे/कोई नहीं बचाएगा प्रेमपत्र/कोई रोम बचाएगा कोई मदीना/कोई चांदी बचाएगा कोई सोना/मैं निपट अकेला कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेमपत्र?
फिल्म में राजनीतिक किरदारों के नाम न केवल यूपी के नेताओं की तर्ज पर हैं, बल्कि उनकी छवि भी दिखती है। जिमी शेरगिल आक्रामक हिंदू नेता रंजीत ओम हैं तो नरेंद्र झा मुस्लिमों की राजनीति करने वाले लीडर अलीम खान। संजय सूरी मुख्यमंत्री मिथिलेश यादव बने हैं। आशुतोष राणा गांव के चौधरी हैं। सभी ने अपने किरादारों को खूबसूरती से निभाया है।
हितेन तेजवानी आधा दर्जन फिल्में कर चुके हैं परंतु सलीम की भूमिका उल्लेखनीय है। तुर्की से आई सुहा गजेन और अनिरुद्ध दवे भी जमे हैं। गीत-संगीत का पक्ष जरा मजबूत रहता तो फिल्म के लिए फायदेमंद होता।