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व्हाट द फिशः डिंपल ने किया निराश

Fri, 13 Dec 2013 01:00 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई Updated Fri, 13 Dec 2013 01:00 PM IST
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film review of what the fish

छोटे पर्दे के धारावाहिक तो फिल्मों की नकल करते ही हैं। परंतु कई बार लगता है कि फिल्म निर्देशक भी छोटे पर्दे से प्रभावित होते हैं। फिल्म को सीरियल की तरह बना डालते हैं। निर्देशक गुरमीत की सिंह की ‘व्हाट द फिश’ का मामला कुछ यही है।

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यहां मुद्दा सिर्फ इतना है कि दिल्ली की एक पॉश कॉलोनी में अकेली रहने वाली सनकी-चिड़चिड़ी सुधा मिश्रा (डिंपल कपाड़िया) अपने बेटे से मिलने महीने भर के लिए विदेश जा रही हैं। बंगलेनुमा घर किसके भरोसे छोड़ें? उनकी मॉडल भांजी सू उर्फ सुमन को भी शूटिंग के लिए बाहर जाना है।
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अतः घर सू के बॉयफ्रेंड सुमित के भरोसे है। साथ में मिसेज मिश्रा की प्यारी रंग-बिरंगी मछली मिष्टी और मनी प्लांट की जिम्मेदारी भी। लड़के केयरलैस होते हैं सबको पता है...। नतीजा...! मिसेज मिश्रा की गैरमौजूदगी में पार्टी...!
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यहां से फिल्म छोटे-छोटे एपिसोड्स में बंट जाती है। छोटी-छोटी कहानियां आती हैं। पार्टी में सहारनपुर से बॉयफ्रेंड के साथ भाग कर आई लड़की की कहानी। ‘हर एक बारी नई सवारी’ की फिलॉसफी मानने वाले एक बदमाश कुंवारे द्वारा उस लड़की को फुसला कर संबंध बनाने की कहानी।

एक युवा बॉक्सर की कहानी जो देश के लिए रिंग में उतरने की तमन्ना रखता है और रात में लड़कियों वाले कपड़े पहन कर पैरों में घुंघरू बांध लेता है। एक कहानी बॉक्सर के दोस्त की जो शादीशुदा होते हुए मैरीकॉम टाइप बॉक्सर लड़की को फंसाता है, मगर खुद फंस जाता है। इसके अलावा भी छोटी-छोटी कहानियां। खुद मिसेज मिश्रा की एक कहानी, जिन्हें घर लौटते ही पता चलता है कि इसमें एक चुड़ैल का वास हो गया है।

फिल्म में बहुत सारे बिखरे हुए सिरे हैं, जो फिल्म को उसके नाम के अनुकूल ही बनाते हैं। व्हाट द फिश। फिल्म कुल जमा यह बताती है कि पराये माल पर सब जुल्म ढाते हैं। मिष्टी मछली मर जाती है। मनीप्लांट टूट-बिखर जाता है। घर घर नहीं रह जाता।

बिखरी हुई फिल्म बांधती नहीं है। कुछेक हिस्से जरूर अच्छे लगते हैं। परंतु कहानी एक गोल चक्कर में घूमती हुई खुद ही उलझी रहती है। डिंपल के दृश्यों और संवादों में ढेर सारा दोहराव है। फिल्म उनके नाम पर प्रमोट की गई है, परंतु उनकी नहीं है।


डिंपल के फैन निराश होंगे। छैल-छबीले युवा के रूप में मनु ऋषि आनंद का काम अच्छा है। बाकी कलाकार साधारण हैं। ‘वार्निंग’ के बाद एक बार फिर निर्देशक गुरमीत सिंह निराश करते हैं। अगर फिल्म देखना बहुत जरूरी ही न मालूम पड़े तो इसे छोड़ा भी जा सकता है।

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