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समीक्षा शोले 3डीः जानिए पुरानी फिल्म से अलग कैसे?
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
Updated Fri, 07 Aug 2015 09:04 PM IST
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इस नश्वर संसार में सब कुछ नष्ट नहीं होता। कुछ चीजें, कुछ बातें, कुछ यादें, कुछ कलाकृतियां सदा के लिए हैं। निर्देशक रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले’ को भी आप इस श्रेणी में रख सकते हैं। जब तक सूरज चांद रहेगा ‘शोले’ तेरा नाम रहेगा। लेकिन सवाल यह है कि इसे किस रूप में सदा के लिए सहेज कर रखा जाए?
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जैसी बनाई गई थी या फिर वक्त के साथ तेजी से विकसित होती तकनीक से इसका रूप बदल कर। ‘शोले-3डी’ इस क्लासिक फिल्म को बदली हुई तकनीक के साथ संभाल कर रखने की कोशिश है। लेकिन बहस का मुद्दा यह है कि क्या ऐसा करने से असली फिल्म का जादू खत्म हो गया है।
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इस मामले में आपको निर्देशक रमेश सिप्पी से इतना तो सहमत ही होना पड़ेगा कि फिल्म का ‘3डीकरण’ उसकी मौलिकता को खत्म कर देता है। तकनीक से किरदार तो आंखों के सामने ज्यादा जीवंत मालूम पड़ते हैं, लेकिन कहानी का रामगढ़ कोई गांव नहीं, फिल्म के लिए तैयार किए गए सेट-सा आंखों में खटकता है। अचानक बनावट सामने आ जाती है। सिनेमा का जादू दरकरने लगता है।
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कहानी का क्या कहना
सलीम-जावेद के द्वारा लिखी यह फिल्म अपने कथानक, दृश्यों और संवादों में बेजोड़ है। किसी भी फिल्म में कैसे एक छोटे से छोटा पात्र भी कमाल की छाप छोड़ सकता है, यह इस फिल्म में देखा जा सकता है। फिल्म की कहानी ठाकुर (संजीव कुमार) और डाकू गब्बर सिंह (अमजद खान) की आपसी दुश्मनी की है। जिसमें गब्बर ने ठाकुर के परिवार का खून बहाया है। साथ ही ठाकुर के दोनों हाथ काट कर अपाहिज कर दिया है।
बदले की आग में जलते ठाकुर ने गब्बर से बदला लेने के लिए दो छोटे मगर बेहद बहादुर बदमाशों जय (अमिताभ बच्चन) और वीरू (धर्मेंद्र) को रामगढ़ बुलाया है। कारण...? लोहा ही लोहे को काटता है! ‘शोले’ की इस कहानी में और कहानियां भी हैं। जय और वीरू की दोस्ती की कहानी। वीरू और बसंती के प्यार की कहानी। इमाम साहब (एके हंगल) की दर्दनाक कहानी।
सूरमा भोपाली (जगदीप) और अंग्रेजों के जमाने के जेलर (असरानी) के कॉमिक किस्से इस कहानी के तनाव को हल्का करते हैं। लेकिन कॉमिक रिलीज देने में पटर पटर करती बसंती (हेमा मालिनी) का कोई जवाब नहीं है। वह जब जब पर्दे पर आती है, अपनी बातों से मन मोह लेती हैं।
संवाद सदाबहार
1975 में आई ‘शोले’ वह फिल्म थी जिसकी रिलीज के बाद इसके संवाद लोगों की जुबान पर चढ़ गए थे और आज करीब चालीस साल होने आ रहे, उन्हें कोई भूला नहीं है। कितने आदमी थे। तेरा क्या होगा क्या कालिया। जब पचास पचास कोस दूर बच्चा रोता है तो मां कहती है बेटा सो जा... नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा।
हम अंग्रेजों को जमाने के जेलर हैं। तुम्हारा नाम क्या है बसंती। जहां लड़की देखी वहां लाइन लगाना शुरू...। ये संवाद अंतहीन सिलसिले की तरह है। जिन्हें कितनी ही बार सुनिए उनका मजा खत्म नहीं होता।
खास बात यह कि जब ये आपके कानों में बजते हैं या जुबान पर आते हैं तो उसी अंदाज में जैसा कि इन्हें पर्दे पर बोला गया है। ‘शोले’ को आप उसकी कहानी और संवादों के लिए हजार बार देख सकते हैं। यह पूरी तरह से पैसा वसूल हैं।
गब्बर लाजवाब
यूं तो पूरी फिल्म में सारे अभिनेताओं का काम बेहतरीन है, लेकिन जो कलाकार आंखों में बस जाता है वह है गब्बर सिंह। अमजद खान की यह पहली फिल्म थी। ठाकुर से नफरत, गांववालों के प्रति क्रूरता और अपनी ताकत का घमंड गब्बर के चेहरे से टपकता है। अगर आपको पता न हो कि यह आदमी फिल्मी है तो वाकई गब्बर डरा देने वाला किरदार है।
अपने जमाने में भी गब्बर ने शोहरत पाई थी और नई पीढ़ी के दर्शकों को भी सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाला किरदार वही है। उसकी खूबी यह है कि उसकी क्रूरता के बावजूद आप उससे नफरत नहीं कर पाते। अमजद खान के चेहरे पर तरुणाई की ताजगी इस फिल्म में दिखती है। फिल्म के इस 3-डी फॉरमेट में अगर कोई सबसे ज्यादा जंचता है तो गब्बर सिंह।
महबूबा भी नाची, बसंती भी नाची
‘शोले’ का संगीत सदाबहार है। ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, महबूबा, टेसन से गाड़ी जब छूट जाती है तो और जब तक है जां जाने-जहां मैं नाचूंगी... सभी गानों की मिठास आज भी बरकरार है। सैकड़ों फिल्में इतिहास में समा चुकी हैं जिनका संगीत जीवित है।
परंतु शोले अपनी गीत-संगीत के साथ मनोरंजन करती है। साथ ही हेलन का डांस और बसंती का नाच सदा नई ऊर्जा से भरा लगता है। फिल्म के शानदार संगीत के साथ आरडी बर्मन हमारे बीच मौजूद हैं।
साउंड, ऐक्शन और नई पीढ़ी
सवाल यह उठता है कि अपने नए ‘3डी’ संस्करण में ‘शोले’ क्या पुराना मजा देती है? निश्चित रूप से साउंड, रंगों और दृश्यों की स्पष्टता नई तकनीक के इस्तेमाल बेहतर हुए हैं। लेकिन जहां तक 3डी का मामला है, कई दृश्य अपना आकर्षण खो देते हैं। इनमें मुख्य रूप से गांव और गब्बर के अड्डे के वे सीन शामिल हैं, जो किसी फिल्मी सेट की तरह दिखने लगते हैं।
‘शोले 3-डी’ को देखने में उस पीढ़ी को मजा आएगा जो इसकी महिमा से वाकिफ है। जो इसे देख कर और इसके बारे में सुनती हुई बड़ी हुई है। लेकिन नई पीढ़ी को यह फिल्म जरूर थोड़ी पुरानी मालूम पड़ेगी। इसके बावजूद क्लासिक के रूप में इसका महत्व कम नहीं होता। अतीत को जानना भविष्य के लिए हमेशा बेहतर है।