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अच्छी तो है पर कुछ मिस भी करती है 'घनचक्कर'
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Updated Fri, 28 Jun 2013 03:06 PM IST
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'घनचक्कर' फिल्म उतनी इंटरटेनिंग नहीं है जितनी कि यह अपने प्रोमो में लगती हैं। फिल्म हंसाती जरूर है लेकिन यहां हंसी के वैसे फव्वारे नहीं छूटते जैसे कि हम उम्मीद करके गए होते हैं। पूरी फिल्म में लगता है कि कहीं कुछ मिसिंग है। यह मिसिंग कहानी में न होकर स्क्रिप्ट में है। और कई जगह डायलॉग में भी।
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पूरी फिल्म उन 30 करोड़ रुपयों की खोज में बीतती है जिसे फिल्म का हीरो बैंक से लूटकर कहीं रखकर भूल गया होता है। फिल्म पैसे ढूढ़ने वाले इसी सिंगल ट्रैक पर चल रही होती है। यह ट्रैक दर्शकों को उबता तो नहीं है लेकिन फिल्म की रफ्तार को थोड़ा स्लो जरूर करता है। दर्शकों को लगता है कि इस ट्रैक के साथ कुछ और होता तो बेहतर होता।
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'नो वन किल्ड जेसिका' और 'आमिर' जैसी फिल्म बनाने वाले राजकुमार गुप्ता ने इस बार करवट ली है। उनकी यह पहली कॉमेडी फिल्म है। इस लिहाज से देखें तो वह कॉमेडी के लिए अजनबी नहीं लगे हैं। फिल्म में कुछ ऐसे हंसी के मौलिक सीन हैं जिन्हें आप फिल्म खत्म होने के बाद भी याद करके हंस सकते हैं।
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लूटा गया बैंक, गायब हुई मेमोरी
यह कहानी बैंक और एटीएम के लॉकर खोलने में एक्सपर्ट संजय (इमरान हाशमी) की है। लूट के इसी पेशे से जुड़े दो लोग पंडित (राजेश शर्मा) और इदरिश (नमित दास) संजय को एक बैंक लूटने का ऑफर देते हैं। बैंक से 30 करोड़ की लूट होती है। तय यह होता है कि तीन महीने के बाद लूट का यह पैसा इन तीनों में बंटेगा।
तीन महीने के बाद जब पंडित संजय को फोन करके पैसों के बारे में पूंछता है तो संजय उससे कहता है कि उसे याद नहीं हैं कि उसने पैसे कहां रख दिए। फिल्म यहीं से रोचक मोड़ लेती हैं। इदरिश और पंडित संजय के घर में डेरा डाल देते हैं।
संजय पैसे पाने के लिए हर उस आदमी से मिलता है जिससे उससे कोई वास्ता होता है। इधर संजय की पत्नी नीतू (विद्या बालन) सहित सभी को लग रहा होता है कि संजय नाटक कर रहा है। एक झटके के साथ आए फिल्म के क्लाइमेक्स में पैसों के रहस्य से पर्दा उठता है। लेकिन शायद तब तक कुछ देर हो चुकी होती है।
अभिनय सभी का दुरुस्त
यह फिल्म पूरी तरह से चार किरदार इमरान हाशमी, विद्या बालन, राजेश शर्मा और नमित दास के के इर्द-गिर्द घूमती है। इन सभी के पास ऐक्टिंग करने के खूब मौके थे। इमरान हाशमी को जब-जब अपनी इमेज से उलट अभिनय करने का मौका मिला है तो इमरान ने यह साबित किया है कि उन्हें रोमांस और स्मूच के अलावा भी बहुत कुछ आता है। अपनी याददास्त गंवा चुके एक सुस्त से आदमी के किरदार को उन्होंने अच्छी तरह से निभाया है।
फैशन की पत्रिका को देखकर कपड़े पहनने और किताब से डिश पढ़कर खाने बनाने वाली तेजतर्रार पत्नी की भूमिका में विद्या बालन अच्छी लगती हैं। ज्यादा रोल होने के बावजूद राजेश शर्मा वैसा जादू नहीं जगा पाते जैसा उन्होंने 'लव शव चिकन खुराना' फिल्म में पैदा किया था। अब तक कि सबसे लंबी भूमिका में नमित दास भी ठीक-ठाक हैं।
पिछली फिल्म से आगे नहीं बढ़े निर्देशक
एक निर्देशक के रूप में देखें तो राजकुमार गुप्ता कोई खास छलांग लगाते नहीं दिखते। 'आमिर' और 'नो वन किल्ड जेसिका' जैसी गंभीर फिल्में बना चुके राजकुमार गुप्ता उस जगह थोड़े से बौने हो जाते हैं जहां उन्हें फिल्म को भव्य क्लाइमेक्स के साथ खत्म करना था।
सुस्त पति और तेजतर्रार बीवी के बीच होने वाली दिलचस्प बातचीत से जितनी मात्रा में हास्य निकाला जा सकता था यह फिल्म उतना हास्य पैदा नहीं कर पाती। मुख्य कहानी के साथ में अन्य कोई ट्रैक न रखना भी निर्देशक की चूक दिखी।
गाने मजाकिया
फिल्म के ऑडियो कैसेट में कई सारे गाने हैं। इनमें से कुछ गाने फिल्म में प्रयोग किए गए हैं। "अल्ला मेहरबान", "घनचक्कर बाबू" और "लेजी लैड" तीनों ही गाने चूंकि बैकग्राउंड में हैं इसलिए वह फिल्म की रफ्तार को नहीं अटकाते।
यदि यही गाने हीरो-हीरोईन मिलकर नाच-नाचकर गा रहे होते तो शायद अखरते भी ।अमिताभ भट्टाचार्य के लिरक्सि फिल्म के मिजाज की तरह ही मजाकिया हैं।
क्यों देखें
एक ऐसी कॉमेडी फिल्म के लिए जो थोड़ा-बहुत थ्रिल भी पैदा करती है। साथ ही शादी के बाद विद्या बालन को देखने के लिए भी।
क्यों न देखें
यदि आप इसे राजकुमार गुप्ता द्वारा पहली बनायी गयी फिल्मों से जोड़कर इसे देखने जा रहे हों तो।