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डराता है 'एक थी डायन' का रहस्य
रोहित मिश्र
Updated Fri, 19 Apr 2013 02:51 PM IST
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'एक थी डायन' फिल्म अपने भुतहे अंदाज से नहीं बल्कि अपने रहस्यों से डराती है। एक डर इन रहस्यों के पीछे-पीछे परछाईं की तरह चल रहा होता है। यह डर कब उचककर दर्शकों की गोद में बैठ जाता है और दिल से होता हुआ दिमाग पर हावी हो जाता है वह जान भी नहीं पाता है।
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'एक थी डायन' एक अलग किस्म की हॉरर फिल्म है। इस फिल्म का 'डर' रामसे ब्रदर्स या भट्ट कैंप की फिल्मों के 'डर' से कुछ उसी तरह से अलग है जैसे यश चोपड़ा का 'रोमांस' इम्तियाज अली के 'रोमांस' से। यह फिल्म वर्तमान में उतनी खूबसूरत नहीं है जितनी की फ्लैशबैक के नैरेशन में।
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छोटी-छोटी घटनाओं से रहस्य का जो एक मकड़जाल बुना जाता है दर्शक उस मकड़जाल में अपने को फंसा हुआ महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि जब क्लाइमेक्स से पर्दा उठेगा तो उन्हें राहत मिलेगी। अर्से बाद कोई ऐसी फिल्म आयी है जिसके भुतहे दृश्यों पर दर्शक हूट नहीं कर रहे होते हैं।
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फिल्म की कुछ कमियां भी हैं। पूरी फिल्म में 'एक थी डायन' भुतही फिल्मों के जिन चालू तरीकों से बचने की कोशिश करती है अंत में जाकर उन्हीं तरीकों का दामन थाम लेती हैं। यह एक निर्देशकीय समझ या सीमाओं का सवाल भी हो सकता है। इसे टाला भी जा भी सकता है और नहीं भी। हां एक बात और, फिल्म यह भी नहीं बताती कि यह भुतही डायनें हीरो का ही पीछा क्यों कर रही होती हैं।
जादूगर और उसकी डायनें
फिल्म की कहानी एक जादूगर बोबो (इमरान हाशमी) के इर्द गिर्द घूमती है। वह अपनी गर्लफ्रेंड तामारा (हुमा कुरैशी) के साथ रह रहा होता है। जादू के शो के दौरान उसे कुछ अनजान शक्तियों का एहसास होता है। परेशान बोबो इसकी मदद के लिए एक साइकोलोजिस्ट के पास जाता है। साइकोलोजिस्ट उसे हिप्नोटाइज करता है। हिप्नोटाइज होने के बाद बेबो अपनी बचपन के किस्से को यादकर उन्हें नैरेट करता है। जहां उसका पूरा परिवार एक डायन की वजह से तहस-नहस हो जाता है।
उसी दौरान उसे एहसास होता है कि वह डायन अब एक बार फिर से उसकी जिंदगी में दाखिल हो रही है। अब वह शक्ल बदलकर कर आयी है। बेबो उसके बारे में पता लगा रहा ही होता है कि उसकी पत्नी बन चुकी गर्लफ्रैंड के साथ एक एक्सीडेंट हो जाता है। इस बीच वह साइकोलोजिस्ट भी मारा जाता है। फिल्म के क्लाइमेक्स में बेबो का इन्हीं डायनों से बदला लेना दिखाया जाता है। फिल्म में काल्कि कोचलीन और कोंकणा सेन शर्मा की क्या भूमिका है यह हम आपकों नहीं बताएंगे। साथ ही यह भी नहीं कि इन लड़कियों में डायन कौन है? या सभी हैं।
सब अपनी जगह फिट
अपनी टाइप्ड फिल्मों के अलावा इमरान हाशमी बीच-बीच में यह झलक देते रहते हैं कि उनमें अभिनय की बहुत बड़ी संभावनाएं हैं। डर से जूझते एक जादूगर की भूमिका को इमरान हाशमी ने नेचुरल तरीके से जिया है। तीन नायिकाओं में सबसे ज्यादा फुटेज हुमा कुरैशी को मिलते हैं।
हुमा, फिल्म में मोटी और अनाकर्षक तो लगती हैं पर उनका अभिनय अच्छा है। काल्कि कोचलीन हमेशा की तरह चीखकर और कोंकणासेन शर्मा आंखों से अभिनय कर रही होती हैं। फिल्म में हर किरदार अपनी जगह फिट है और वह ओवरऐक्टिंग करने का प्रयास नहीं करता।
संवादों से निखर आया निर्देशन
कन्नन अय्यर की इस फिल्म के संवाद विशाल भारद्वाज और मुकुल शर्मा ने मिलकर लिखे हैं। फिल्म को मनोरंजक बनाए रखने के लिए यह सवांद कई बार दृश्यों से भी ज्यादा जरूरी मालूम पड़ते हैं। फिल्म के निर्देशक कन्नन अय्यर की खूबी डर के ताने-बाने को बुनने में है।
फ्लैशबैक में वह जैसी उपकथाएं दिखाते हैं वह फिल्म की असली जान होती हैं। एक निर्देशक के रूप में कन्नन निराश नहीं करते लेकिन क्लाइमेक्स में फिल्म की वह धार खो देते हैं जो पूरी फिल्म में दर्शकों को प्रभावित कर रही होती है। कई प्रश्नों का उत्तर दिए ही कन्नन 'पैक अप' बोल देते हैं।
अलग तरह के गाने
हॉरर फिल्मों का संगीत आमतौर पर अच्छा होता है। यह बात तो भट्ट कैंप की फिल्में भी साबित करती आयी हैं। ''एक थी डायन'' के संगीत का मिजाज फिल्म की तरह ही गंभीर है। फिल्म में म्यूजिक विशाल भारद्वाज का है और गानों में उनकी छाप देखने को मिलती है। सुरेश वाडेकर और रेखा भारद्वाज की आवाज में गाया गया गाना "तोते उड़ गए" दर्शकों को संगीत की एक अलग तरह की भव्यता में ले जाता है।
सुनिधि चौहान की आवाज में गुलजार का लिखा गाना "और अपना दिल" एक तरह का प्रयोग है। सुनिधि जब किसी गाने मुखड़ा पूरा कर रही होती हैं तो वह और भी बेहतर हो जाती हैं। इस गाने में गुलजार अपनी लिरिक्स के साथ खुद भी किताब के पोस्टर के रूप में मौजूद होते हैं।
क्यों देखें
एक अलग तरह की भुतही फिल्म देखने के लिए। साथ ही कुछ अच्छे और नए किस्म के गानों के लिए भी।
क्यों न देखें
यदि आप इसे भट्ट कैंप की 'गर्मागर्म' हॉरर फिल्म जैसी सोचकर जा रहे हों तो।