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चल भागः समीक्षा पढ़ तय करें देखना है क्या?

Fri, 13 Jun 2014 08:54 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई Updated Fri, 13 Jun 2014 08:54 PM IST
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film review of chal bhaag

एक नई किस्म की प्रयोगधर्मी फिल्म चल भाग इस शुक्रवार रिलीज हुई। इस फिल्म की समीक्षा पढ़ तय कीजिए कि देखना या छोड़ना?

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पुलिस के एनकाउंटर झूठे भी होते हैं। वह निर्दोषों को फंसाती है। अपने रिकॉर्ड दुरुस्त रखने या फिर निजी खुन्नस निकालने के लिए उन्हें गोली मार देती है। यह बात नई नहीं है और अदालतों में तक फर्जी एनकाउंटर के कई मामले साबित हो चुके हैं।

सैकड़ों में सुनवाई चल रही है। पुलिस की वर्दी पर दाग वाले विषय सिनेमा बनाने वालों को आकर्षित करते रहे हैं। लेकिन हर कोई इस पर सच्ची और अच्छी फिल्म बना सके, ऐसा संभव नहीं।
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निर्देशक प्रकाश सैनी ने ‘चल भाग’ को थोड़ा कॉमिक और थोड़ा सीरियस बनाने की कोशिश की है। साफ दिखता है कि इस विषय के ट्रीटमेंट को लेकर वह कनफ्यूज है। अतः फिल्म में न ट्रेजडी है और न कॉमेडी। यह बुरी तरह निराश करती है।
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फिल्म को कई जगहों पर गैर-पेशेवराना ढंग से शूट किया गया है। आप साफ देख सकते हैं कि जहां सीन शूट हो रहे हैं, वहां पर लोग इकट्ठा होकर शूटिंग देख रहे हैं। सिनेमा के छात्र तक आज इस ढंग से शूटिंग नहीं करते।

फिल्म की शुरआत एक पूर्व एमएलए की हत्या से होती है, जिससे दिल्ली हिल जाती है। तीन लोग दिनदहाड़े उसे गोली मार कर फुर्र हो गए। इसके बाद फिल्म तीन छोटे-मोटे अपराधियों को अलग-अलग कारनामे करती दिखाती है। पूरी दिल्ली में दो ही पुलिसवाले हैं और वे तीनों को पकड़ते हैं। थाने की नए रंग-रोगन वाली कोठरियों में इन्हें बंद किया जाता है।

तीन असली हत्यारे भी पकड़े जाते हैं, लेकिन उनका बॉस इतना प्रभावशाली और शक्तिशाली है कि थानेदार को हड़का कर उन्हें छुड़ा लेता है। थानेदार पर सरकारी दबाव भी है कि वह तीनों हत्यारों को जल्द से जल्द जिंदा या मुर्दा पकड़े पकड़े। थानेदार तीन असली मुजरिमों को छोड़ कर उनकी जगह पकड़े गए तीन अन्य का एनकाउंटर करने का मन बना लेता है। इसके बाद क्या होता है, अगर आप जानना चाहें तो फिल्म देख सकते हैं।

फिल्म की स्क्रिप्ट बचकाने ढंग से लिखी गई है। शुरुआत से ही यह दूसरे दर्जे की मालूम पड़ती है और होते होते तीसरे दर्जे में पहुंच जाती है। ऐसे में निर्देशन पर बात करना बेकार है। ऐक्टरों ने ऐसे काम किया है मानो वे फिल्म में नहीं बल्कि नाटक में ओवरएक्टिंग कर रहे हैं। दीपक डोबरियाल (ओमकारा, दिल्ली-6) फिल्म का मुख्य चेहरा हैं।


उन्हें कुछ साल पहले तक हिंदी फिल्मों के संभावनाशील कलाकार के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन हाल में उनकी जैसी फिल्में आई हैं, वह उन्हें अतंतः गुमनामी की ओर ढकेल सकती है। एक कलाकार की यह ढलान निराश करती है। मुकेश तिवारी, संजय मिश्रा और यशपाल शर्मा जैसे कलाकार भी यहां बेकार चले गए हैं।

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