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औरंगजेबः मजेदार हैं किरदारों का शातिरपन

Fri, 17 May 2013 04:03 PM IST
रोहित मिश्र
रोहित मिश्र Updated Fri, 17 May 2013 04:03 PM IST
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film review of aurangzeb

'औरंगजेब' का पैटर्न बॉलीवुड की मसाला फिल्मों जैसा ही है। एक शु्द्ध इंटरटेनिंग फिल्म। फिल्म में अपराधी और पुलिस के बीच एक-दूसरे को शतरंज के खेल से बाहर कर देने वाली चालें हैं। कभी कोई जीतता है तो कभी कोई हारता है। खेल से पूरी तरह से बाहर कोई नहीं होता। इन शातिर चालों के बीच जायज-नाजायज रिश्तों की कुछ मार्मिक कहानियां भी हैं।

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यदि गौर से देखें तो रिश्तों की यह कहानियां शातिर चालों को जन्म दे रही होती हैं। यूं तो इन दिनों बन रही हर चौथी फिल्म अपराध जगत या अंडरवर्ल्ड की बात अपने ढंग से कहने की कोशिश करती है लेकिन यह फिल्म अपराध जगत की होते हुए भी अपराध कीनहीं बल्कि रिश्ते की कहानी कहती है।
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यह कुछ-कुछ 1970 जैसा सिनेमा है। जहां फिल्म के अंतिम सीन में बाप अपने अर्से से बिछड़े हुए बेटे को गले लगाता है। जिन दर्शकों ने यश चोपड़ा की 'त्रिशूल', 'दीवार' या राम गोपाल वर्मा की 'सरकार' देखी होगी उन्हें इस 'औरंगजेब' की मेकिंग स्टाईल उन फिल्मों जैसी लग सकती है।
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'औरंगजेब' की खूबी उसके चरित्र हैं। यह फिल्म किसी हीरो और विलेन के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। हर पात्र के अंदर कभी हीरो दिखता है तो कभी विलेन।


कहानी 'पॉवर' पाने की

यह कहानी गांव से शहर बने गुड़गांव के एक भू-माफिया यशवर्धन (जैकी श्राफ) से उसका साम्राज्य छीनने की है। यह साम्राज्य पुलिस का सीनियर ऑफिसर रविकांत (ऋषिकपूर)उससे छीनना चाहता है। इस काम में वह अपने भतीजे आर्या (पृथ्वीराज) की मदद लेता है। मरने से कुछ समय पहले आर्य के पिता उसे अपनी एक दूसरी बीवी और उसके बच्चे के बारे में बताते हैं।

पिता से किए वादे के मुताबिक आर्य जब उन्हें अपने पिता के मरने की खबर देने वहां जाता है तो उसे वहां विशाल (अर्जुन कपूर) मिलता है। विशाल की शक्ल हू-ब-हू यशवर्धन केबेटे अजय (अर्जुन कपूर डबल रोल में) से मिलती है। असल में वह औरत यशवर्धन की पहली बीवी होती है जो आर्य के पिता के लिए पुलिस की मुखबिरी करती है। जिसे एक फर्जीइनकाउंटर में मरा हुआ दिखा दिया गया था।

अब रविकांत और आर्य मिलकर विशाल को अर्जुन बनाकर यशवर्धन के पास भेजते हैं और अजय को बंधक बना लेते हैँ। स्थितियां बदलती हैं। कुछ समय तक तो विशाल, रविकांतको यश के बारे में जानकारी देता है लेकिन बाद में उसका नजरिया अपने पिता के प्रति बदल जाता है और वह उनकी सहायता करने लगता है। फिल्म के बाकी हिस्से में रविकांत कीखुद को भू-माफिया बनाने की कोशिशें और आर्य, विशाल और अजय की बदली मानसिकता की कहानी है।

हर किरदार अपने रोल में परफेक्ट

इस फिल्म की खूबी यह है कि इसमें कोई एक हीरो या एक विलेन नहीं है। हर पात्र के अंदर कई सारे शेड्स हैं। यानी हर चरित्र की अपनी एक खूबी है। फिल्म के सबसे अच्छे संवाद ऋषि कपूर के हिस्से आते हैं इसलिए वह पूरी फिल्म में सबसे सशक्त किरदार बनकर उभरते हैं।

अर्जुन कपूर की दोहरी भूमिका है। बदतमीजी करने वाले दृश्यों में तो अर्जुन कपूर संतुलित लगते हैं लेकिन भावुक दृश्यों में वह ओवरऐक्टिंग करते हुए जान पड़ते हैं। वक्त के साथ बदलती निष्ठा वाले एक पुलिस अधिकारी की भूमिका को पृथ्वीराज ने अच्छे से निभाया है।

अमृता सिंह और जैकी श्राफ भी अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं। फिल्म की अभिनेत्री साशा आगा हैं जरूर लेकिन इस बात को न तो फिल्म बताती है और न ही दर्शक इसे मानने केलिए तैयार होते हैं। उनके अभिनय से ज्यादा उनकी आवाज में गाया गया गाना कैरियर में उनकी राह आसान करेगा।

पहली फिल्म लेकिन निर्देशन कसा हुआ


एक निर्देशक के रूप में यह अतुल सब्बरवाल की पहली फिल्म है। इसके पहले वह 'माई वाइफ्स मर्डर', 'फिर मिलेंगे' और 'डरना मना है' फिल्मों की पटकथा लिख चुके हैं। अतुलअपनी पहली फिल्म से ही प्रभावित करते हैं।

फिल्म का पहला दृश्य ही साफ कर देता है कि वह माफियाओं की फिल्म दिखा तो जरूर रहे हैं लेकिन वह इसके नाम पर गोलियों की अंधाधुंध बौछारें या भाईगीरी टाइप चरित्र नहीं दिखाएंगे।


यह उनकी खूबी है कि मानसिक रूप से अस्पष्ट चरित्र होने के बावजूद अतुल अपनी फिल्म की लाइन साफ रखते हैं। फिल्म के संवाद भी प्रभावी और मौके के अनुरूप हैं।

संगीत

फिल्म में ज्यादा गाने नहीं हैं। राम संपत और साशा आगा की आवाज में गाया गया गाना "बदमाशियां अच्छी लगें" सुनने में अच्छा लगता है। "जिगरा फकीरा" भी सुनने में सुकून देता है।

क्यों देखे

एक ऐसी बॉलीवुड मसाला फिल्म के लिए जिसकी घटनाएं और रहस्य आपको अपनी खुद की दुनिया से कम से कम ढाई घंटे के लिए तो निकाल ही लेंगे।

क्यों न देखें


यदि आप इसे औरंगजेब की जिंदगी पर आधारित ड्रामा मानकर देखने जा रहे हों तो।

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