फिल्म समीक्षा: डर के आगे जीत को बताती कहानी है 'नीरजा'
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निर्माताः अतुल कस्बेकर, निर्देशकः राम माधवानी
सितारेः सोनम कपूर, शबाना आजमी, शेखर रावजीयानी, योगेंद्र टिकू
रेटिंग ***
साधारण मनुष्य साधारण परिस्थितियों में साधारण काम करते हैं। असाधारण मनुष्य असाधारण परिस्थितियों में असाधारण काम करते हैं। नीरजा असाधारण थीं। 1986 में भारत से अमेरिका जा रहे विमान का चार आतंकवादियों द्वारा अपहरण करके जब कराची (पाकिस्तान) में उतारा गया तो उसमें 360 से अधिक यात्री थे। मात्र 23 वर्ष की नीरजा विमान की मुख्य परिचारिका थीं।
सोलह घंटों से अधिक के बंधक ड्रामे में नीरजा ने साहस और बुद्धिमानी से न केवल 355 से ज्यादा यात्रियों की जान बचाई बल्कि तीन बच्चों की रक्षा करते हुए प्राण न्यौछावर कर दिए। उन्हें भारत सरकार ने शौर्य का सर्वोच्च पुरस्कार अशोक चक्र मरणोपरांत प्रदान किया। यह सम्मान पाने वाली वह सबसे कम उम्र की वीर हैं।
निर्देशक राम माधवानी ने नीरजा के जीवन के आखिरी दो दिनों, विमान अपहरण और यात्रियों को बचाने के घटनाक्रम को विश्वनीय ढंग से पर्दे पर उतारा है। फिल्म में भावनात्मक उतार-चढ़ाव भी हैं। नीरजा के बिखरे विवाह, मॉडलिंग के सपने और साहसी एयरहोस्टेस के रूप में उनकी कहानी क्रमशः सामने आती है।
राजेश खन्ना की फैन यह साधारण-सी दिखती लड़की सामने खड़े आतंकियों से जरा नहीं डरती और देशभक्ति की नई परिभाषाएं गढ़ रहे हमारे समय में विमान में मौजूद अमेरिकी, ब्रिटिश, पाकिस्तानी समेत सभी भारतीयों को बचाने की हर संभव कोशिश करती है। अंततः वह काका के इस फिल्मी संवाद की राह पर चलती है कि जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं, बाबू मोशाय!
सोनम कपूर के करियर का सबसे अहम रोल
यह सोनम कपूर के अब तक के करिअर की सबसे अहम भूमिका है। उन्होंने नीरजा को जीवंत किया है। मुख्य कथा के बीच आने वाले फ्लैशबैक उनके किरदार को निखारते हैं लेकिन कहीं-कहीं फिल्म की गति को रोकते हैं। माता-पिता के साथ नीरजा का लगाव फिल्म को भावनात्मक ऊंचाई देता है लेकिन सवाल उठता है कि ऐसी बायोपिक में गीत-संगीत के मोह से बचा नहीं जा सकता?
नीरजा जीवन के दो विपरीत छोरों पर साथ खड़ी दिखती है। दांपत्य जीवन में हारती हुई मगर आतंकियों को जीतने नहीं देती। डर के आगे जीत है जैसा प्रेरक वाक्य फिल्म देखते हुए याद आता है। फिल्म यूं तो नीरजा के पूरे जीवन को दिखाने की कोशिश है मगर विमान अपहरण और उसके बाद नीरजा का लगातार दृढ़ होता किरदार ज्यादा आकर्षक हैं।
ऐसे भी पल आते हैं जब आंखे भीग जाती हैं
हाईजैक और उसके बाद का ड्रामा राम माधवानी ने प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा है। फिल्म में आपको 1980 का दशक नजर आता है। आतंकियों की क्रूरता और यात्रियों का डर आप महसूस कर पाते हैं। मां के रूप में शबाना आजमी और पिता बने योगेंद्र टीकू की भूमिकाएं दिल को छूती हैं।
ऐसे भी पल आते हैं जब आंखें नम हो जाती हैं। लेट्स टॉक के बाद माधवानी ने मजबूत वापसी की है। नए दौर में नीरजा उल्लेखनीय बायोपिक है। बॉलीवुड में ऐसी कहानियों की तलाश और मांग अब बढ़ जाएगी। क्या आपके पास या आस-पास ऐसी कहानी है?