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इस हॉरर फिल्म में है एक अलग तरह का 'डर'
रवि बुले
Updated Fri, 14 Nov 2014 10:39 AM IST
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जैसा दिखता हो वैसा ही हो, यह जरूरी नहीं है। फिल्म 6-5=2 नाम से भले ही चौंकाए लेकिन सिनेमाहॉल में बहुत निराश करती है। आपको बताया जाता है कि यह सिद्धार्थ नाम के युवक द्वारा शूट किया गया एक वीडियो है, जिसे आवश्यक संपादन के साथ दर्शकों के लिए पेश किया जा रहा है। असल में यह सिनेमा में कहानी कहने की नई पद्धति विकसित हो रही है।
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फाउंड फुटेज जॉनर यानी कहीं मिला हुआ वीडियो। कैमरा अब हाथ-हाथ में पहुंच गया है और हर कोई कुछ न कुछ शूट कर रहा है। ऐसे में यह संभव है कि किसी साधारण घटना को शूट करते हुए कोई असाधारण बात कैमरे में कैद हो जाए। इस फिल्म में यही होता है।
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छह दोस्त कर्नाटक के जंगलों में ट्रेकिंग के लिए जाते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं, खतरे को दावत देते हैं। खतरा क्या है...? भूत या कहिए कुछ ऐसा ही! नतीजा यह कि इस जाल में फंसते हुए छह में से तीन दोस्तों की लाश वन अधिकारियों को मिलती है, दो जंगल में लापता हैं और एक जिंदा लौट पाता है। फिर डायरेक्टर ने 6-5=2 क्यों बताया? तर्क यह कि कैमरा भी तो जंगल से लौटा है, जिसमें यह कहानी कैद है!
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कहानी के साधरण होने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन फिल्म कई सवालों के जवाब नहीं देती। जैसेः हंसते-खेलते दोस्त अचानक कैसे सहमत हो जाते हैं कि कोई शक्ति उनकी जान के पीछे पड़ी है। जंगल में एकाएक कौन सिद्धार्थ का नाम लेकर पुकारता है। जंगल में एक पेड़ खोपड़ियों से सजा हुआ क्यों और कैसे है।
क्या उसकी कोई कहानी है। अगर है तो क्या। ऐसे कई सवाल हैं। जब जवाब नहीं मिलते तो फिल्म बेसिर-पैर की लगती है। ऐसी कहानियों का रोमांच तभी है जब जवाब भी मिलें।
फिल्म में गौरव कोठारी को छोड़ कर बाकी ऐक्टरों की मौजूदगी ठीक से दर्ज तक नहीं होती। कई जगहों पर हॉरर की जगह कॉमेडी का एहसास होता है। फिल्म देख कर आपको लगता है कि नतीजा सिफर यानी शून्य रहा।