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Angry Young Men Review: किसी दुश्मन के बेटे को मोहब्बत की नजर से देखा? अगर नहीं, तो फिर ये रिव्यू मत पढ़िए

Tue, 20 Aug 2024 05:03 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Tue, 20 Aug 2024 05:03 PM IST
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Angry Young Men Review by Pankaj Shukla Salim Javed Story Salman Khan Films Excel Entertainment Tiger Baby
एंग्री यंग मेन - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
एंग्री यंग मेन (वेब सीरीज)
कलाकार
सलीम खान , जावेद अख्तर , सलमान खान , अरबाज खान , हेलेन , हनी ईरानी , फरहान अख्तर और जोया अख्तर आदि
लेखक
उपलब्ध नहीं
निर्देशक
नम्रता राव
निर्माता
रचनात्मक निर्माता
कार्तिक शाह
ओटीटी
अमेजन प्राइम वीडियो
रिलीज
20 अगस्त 2024
रेटिंग
3/5

दीप्तकीर्ति चौधरी की लिखी किताब ‘रिटेन बाई सलीम जावेद’ पढ़ चुके लोगों को उत्सुकता रही है कि प्राइम वीडियो की सीरीज ‘एंग्री यंग मेन’ क्या इसी किताब पर आधारित है? तो इसका जवाब न में हैं। 14 कार्यकारी निर्माताओं ने मिलकर उन दो लोगों पर ये डॉक्यू सीरीज बनाई है जिनके बारे में जोया अख्तर कहती हैं, “उन्होंने 24 फिल्में लिखीं और 22 सुपरहिट रहीं।” सलीम खान की बेटी अलवीरा ने इस डॉक्यू सीरीज का बीज बोया। जोया ने इसको खाद पानी दिया और फिर लोग आते गए, कारवां बनता गया। आमतौर पर किसी सीरीज या फिल्म को देखते समय कागज, कलम लेकर बैठने की मेरी आदत रही नहीं है। इंटरव्यू भी कभी मैंने कागज पर लिखे सवाल देख देखकर नहीं किए। लेकिन, रिव्यू अगर सलीम-जावेद पर बनी डॉक्यूमेंट्री का करना हो तो मन में ये बात तो बनी ही रहती है कि पता नहीं ऐसी कौन सी नई बात पता चल जाए जो इतने बरसों तक हिंदी सिनेमा के बारे में पढ़ते-पढ़ाते अब तक न पता हो। लेकिन, उससे पहले एक पते की बात। और, वह ये कि इस डॉक्यू सीरीज को देखने के बाद ये तो समझा ही जा सकता है कि हिंदी सिनेमा राह कहां से भटका है? जिन पर ये सीरीज बनी है वे दोनों महान लेखक अपनी अधिकतर बात हिंदी, उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी जुबान में करते मिलते हैं और उनके बारे में बातें करने वाले तमाम फन्ने खां फर्राटेदार अंग्रेजी में...!

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Angry Young Men Review by Pankaj Shukla Salim Javed Story Salman Khan Films Excel Entertainment Tiger Baby
निरुपा रॉय - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
ऑस्कर के मंच पर, मेरे पास मां है!

तीन एपिसोड की डॉक्यू सीरीज एंग्री यंग मेन’ में सबसे ज्यादा फोकस साल 1975 की दो फिल्मों ‘शोले’ और ‘दीवार’ पर है और मजे की बात ये भी कि जब मुझे फिल्म ‘शोले’ देखने का पहली बार मौका मिला तब तक मुझे फिल्म ‘शोले’ पूरी जुबानी याद हो चुकी थी। जी हां, पॉलिडोर पर आए फिल्म के संवादों के रिकॉर्ड उन दिनों गांवों में लाउडस्पीकर पर खूब बजे थे। सीरीज में इसका जिक्र भी है। इसे बनाने वालों सबसे ज्यादा तारीफ लायक काम अगर किसी ने किया है तो वह हैं इस सीरीज की एडीटर गीता सिंह ने। एक नमूना देखिए- रणवीर सिंह ‘आज मेरे पास बंगला, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है...’ से शुरू करते हैं और ऑस्कर समारोह में खड़े ए आर रहमान बोलते हैं ‘मेरे पास मां है’। रोंगटे खड़े हो जाते हैं इस अहसास पर। वीडियो एडिटिंग की ऐसी कुशलता गीता ने आगे भी ‘सीता और गीता’ लिखने वाले इन लेखकों की जीवनी पर बनी इस डॉक्यू सीरीज में दिखाई है। हां, निरूपा रॉय का इंटरव्यू एडिट करते समय जंप कट आता है। सबटाइटलिंग में भी सीरीज एक जगह मार खाती है जब सलीम खान कहते हैं कि मेरी पहली फिल्म रिलीज हुई 1965 में और स्क्रीन पर लिखे सबटाइटल में ये साल दिखता है 1969।

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एंग्री यंग मेन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हिंदी सिनेमा की कहानी अंग्रेजीदां सितारों की जुबानी

वेब सीरीज में कुछ खटकने वाली बातें और भी हैं। सिनेमा में ऐसी गलतियों को नजरबट्टू कहते हैं। और, सीरीज में नजर उतारने वाले ये किस्से कुछ और भी हैं, जैसे, पत्रकार अनुपमा चोपड़ा फिल्म ‘जंजीर’ का कालजयी संवाद पहले एपिसोड में ही गलत पढ़ जाती हैं, आदि, इत्यादि। पहले एपिसोड के शुरू के 8 मिनट 47 सेकंड के हिस्से में करण जौहर के आने तक 25 लोग बोल चुके होते हैं। इनमें से नोट करके रखे जाने लायक दो बातें हैं। पहली जो सलीम खान कहते हैं कि लेखन का शौक उन्हें दोस्तों के लिए चिट्ठियां लिखने से हुआ और दूसरी जो शत्रुघ्न सिन्हा कहते हैं कि सलीम-जावेद ने छोटे छोटे संवादों से अपनी कहानियों में जान भरी। ‘एंग्री यंग मेन’ कोई ऐसी सीरीज नहीं है जिसे देखकर हिंदी सिनेमा का आम दर्शक लहालोट ही हो जाए क्योंकि इसमें करीब 80 फीसदी बातें अंग्रेजी में हैं और हिंदी सिनेमा का रामपुर, मेरठ, कानपुर, नासिक, इंदौर में बैठा दर्शक शायद ही ऋतिक रोशन की फर्राटेदार अंग्रेजी समझ पाए। हां, इसे देखते समझ ये भी आता है कि ऐसी सीरीज बनाना भी बस सलीम खान और जावेद अख्तर के बच्चों के ही वश का है। मैंने जी न्यूज के लिए कभी फिल्मी सितारों की बायोग्राफी पर ऐसी ही एक सीरीज बनाई थी, ‘बॉलीवुड बाजीगर’। ऐसा कोई काम कितना मुश्किल है, ये इस बात से समझा जा सकता है कि ऐसी हर सीरीज में सबसे ज्यादा जरूरी होते हैं फिल्मों के उन संवादों और दृश्यों की वीडियो क्लिपिंग्स जिनके सहारे ये कहानियां आग बढ़ती हैं। और, इनके अधिकार हासिल करने में नानी, दादी, दादा सब याद आ जाते हैं।

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हनी ईरानी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आंसुओं के सहारे निकला मन का मैल

वेब सीरीज ‘एंग्री यंग मेन’ के पहले दो एपिसोड बहुत शानदार हैं क्योंकि इनमें सलीम और जावेद की जिंदगी के शीर्ष की बातें हैं, तीसरा हिस्सा ढलान का है। जीवन का असल फलसफा हालांकि इस तीसरे एपिसोड में ही है और जब जावेद अख्तर अपनी पहली किताब ‘तरकश’ का जिक्र करते हुए उसके पहले सफे पर छपी कृश्न चंदर की पंक्तियां दोहराते हैं, तो न सिर्फ उनकी आंखें भर आती हैं, बल्कि देखने वाला भी भावुक हो ही जाता है। ये लाइनें हैं, “अपनी जिंदगी में तुमने क्या किया? किसी से सच्चे दिल से प्यार किया? किसी दोस्त को नेक सलाह दी? किसी दुश्मन के बेटे को मोहब्बत की नजर से देखा? जहां अंधेरा था वहां रौशनी की किरन ले गए? जितनी देर तक जिये, इस जीने का क्या मतलब था?” रोना इस सीरीज की मेकिंग के दौरान और भी कई लोगों को आया है। हनी ईरानी की आंखें तब भर आती हैं, जब वह जावेद से पहली मुलाकात का किस्सा बताते हुए भावुक होती हैं। जया बच्चन ‘जंजीर’ के दिनों की याद कर भावुक होती हैं। सलीम खान को अपनी मां को याद कर रोना आता है। फरहान अख्तर अपने पिता की रुसवाई का जिक्र करते करते भावुक हो जाते हैं और सबसे भावुक पल सीरीज का वो है जब जावेद अख्तर खुद को अपनी पहली बीवी हनी ईरानी का गुनहगार होना स्वीकारते हुए करीब करीब रो पड़ते हैं। एक बार वह तब भी रोते हैं जब अपनी फाकाकशी के दिनों की लकीर वह फाइव स्टार होटल में सुबह सुबह ट्रॉली पर आने वाले नाश्ते तक लाकर पूरी करते हैं। ये सीरीज जिंदगी जीने वालों के लिए है, जिंदगी को जानने वालों के लिए है और ये सीरीज कृश्न चंदर की ऊपर लिखी पंक्तियों को समझने वालों के लिए है।

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एंग्री यंग मेन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
किसने छापा था ‘शोले’ का मर्सिया?

निर्देशक नम्रता राव ने जोया अख्तर के साथ लंबा काम किया है, उनकी फिल्में एडिट की हैं और अब बतौर निर्देशक ये डॉक्यू सीरीज बनाई है, ‘एंग्री यंग मेन’। सीरीज में जावेद अख्तर के तमाम पुराने इंटरव्यू और मुंबई के स्टूडियो में उनकी चहलकदमी की फुटेज भी शामिल है। सीरीज में सलीम-जावेद के लिखे की आलोचना के स्वर इक्का दुक्का ही सुनाई देते हैं। अंजुम रजब अली ‘त्रिशूल’ में हेमा मालिनी के किरदार पर सवाल उठाते हैं। कोमल नाहटा विस्तार से बताते हैं कि कैसे ट्रेड पत्रिका ट्रेड गाइड और इंडियन एक्सप्रेस ने ‘शोले’ का मर्सिया छाप दिया था, लेकिन फिल्म सोमवार के बाद चल निकली थी। भारती प्रधान और भावना सोमैया जैसी वरिष्ठ पत्रकार भी सलीम-जावेद की शैतानियों, नादानियों और मनमानियों की बातें साझा करती दिखती हैं। जया बच्चन बताती हैं कि उन्होंने ‘जंजीर’ क्यों की और अमिताभ बच्चन पहली बार नजर आते हैं पहले एपिसोड के करीब 35 मिनट बीतने के बाद। मुझे उम्मीद थी कि ये सीरीज अमिताभ बच्चन से ही शुरू होगी। आखिर सलीम-जावेद पर जब भी लिखा जाएगा या जब भी उनका तस्किरा इतिहास में होगा, तो जो शक्ल लोगों को याद आएगी, वह विजय की ही तो होगी! नहीं?

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