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एबीसीडी-2 समीक्षाः यह फिल्म डांस के अलावा कुछ पेश नहीं करती

Fri, 19 Jun 2015 04:26 PM IST
Updated Fri, 19 Jun 2015 04:26 PM IST
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ABCD 2 film review

जीतने से ज्यादा अहम है किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेना। यह हमारी फिलॉसफी यानी दर्शन है। हम ट्रॉफियां और मैडल नहीं जीतते। दिल जीतते हैं। हम हिंदुस्तानी हैं। निर्देशक रेमो फर्नांडिस की एनी बडी कैन डांस यानी एबीसीडी-2 की कहानी इसी दायरे में सिमटी है।

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150 मिनट की पूरी तरह से हिप-हॉप को समर्पित यह फिल्म डांस के अलावा कुछ पेश नहीं करती। जबकि सिनेमा के मूल में सबसे पहले रोचक कहानी की अनिवार्यता है। यहां कहानी इतनी है कि टीवी के डांस शो में मुंबई का एक ग्रुप ‘चीटर’ ठहराया जाता है क्योंकि वह कुछ मौलिक के बजाय सिंगापुर के प्रसिद्ध डांस ट्रूप की नकल पेश करता है।
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जगह-जगह अपमानित हुआ ग्रुप बिखर जाता है, मगर इसका लीडर (वरुण) हार नहीं मानता। वह लास वेगस में विश्व स्तर की हिप-हॉप प्रतियोगिता के लिए सबको इकट्ठा करता है। इस बार उसे गुरु/कोरियोग्राफर (प्रभु देवा) भी मिल जाता है। बड़ी तैयारियों के बाद सब वेगस जाते हैं और पहली बार हिस्सा लेते हुए फाइनल तक पहुंचते हैं। इसके बाद...

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वरुण-श्रद्धा की जोड़ी है, मगर रोमांस नहीं

ABCD 2 film review

जहां मंच पर एक हादसे की वजह से इन्हें जीत की जगह हार मिलती है। हारने के बावजूद ये सब दर्शकों का दिल जीत लेते हैं। ...और हमारे यहां हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं!!

रेमो की यह सिनेमाई बाजीगरी बेहद सुस्त, उबाऊ और सपाट है। इसमें भावनात्मक उतार-चढ़ाव पैदा करने की कोशिशें सतही हैं। फिल्म में वरुण-श्रद्धा की जोड़ी है, मगर रोमांस नहीं। यहां कॉमेडी या हल्के-फुल्के क्षण भी नहीं हैं।

यहां डांस भी ज्यादा देर तक बांधे नहीं रख पाता क्योंकि आप महसूस करने लगते हैं कि यू-ट्यूब पर एक के बाद दूसरा वीडियो देख रहे हैं। कोरियोग्राफी पर जरूर मेहनत हुई है मगर मंजे हुए डांसर और ऐक्टर का फर्क आपको लॉरेन गॉटलिब और श्रद्धा कपूर में साफ दिखाई देता है।

निर्देशक ने कहानी कहने से ज्यादा कोरियोग्राफी का कौशल दिखाया है

ABCD 2 film review

कुछ ही महीनों पहले हैप्पी न्यू ईयर में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक डांस प्रतियोगिता सबने देखी थी और उसके साथ हीरों की चोरी, लव स्टोरी, पिता-पुत्र संबंध भी देखे थे। एबीसीडी-2 में भी पति-पत्नी का एक बिखरा हुआ रिश्ता और मां-बेटे का इमोशनल कनेक्ट है। कहानी पर मेहनत होती तो शायद यह फिल्म रोचक होती।

आप समझ नहीं पाते कि प्रतियोगिता के दौरान जब श्रद्धा के पैर में फ्रेक्चर होने पर उन्हें डॉक्टरों को दिखाया जा सकता है तो टीम के उस सदस्य को क्यों नहीं, जिसके मुंह से खून आने लगता है। क्यों वह अपनी हालत सबसे छुपाता है, मालूम नहीं पड़ता। यही डांसर हार का कारण भी बनता है।

वरुण-श्रद्धा ऐक्टर के रूप में निराश करते है। लॉरने गाबलिट जरूर अपनी पिछली फिल्म वेलकम टू कराची के मुकाबले प्रभावित करती हैं। प्रभु देवा की प्रतिभा यहां एक डांस में सिमटी है। निर्देशक ने कहानी कहने से ज्यादा कोरियोग्राफी का कौशल दिखाया है। सिने-प्रेमियों से ज्यादा यह फिल्म उन्हें पसंद आएगी जो डांस के दीवाने हैं और घंटों हिप-हॉप देख सकते हैं। वर्ना कुछ ही मिनटों में अमिताभ बच्चन का यह गाना आपको याद आने लगेगा... मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है।

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