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बोलने को तरसती हैं हॉलीवुड की अभिनेत्रियां
भूमिका राय
Updated Sat, 18 May 2013 12:12 PM IST
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बॉलीवुड के बारे में आम धारणा है कि इंडस्ट्री में अभिनेत्रियों का वो दर्जा नहीं, जो अभिनेताओं का है। लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। हाल में हुई एक स्टडी बताती है कि वहां भी एक्ट्रेस के साथ भी भेदभाव होता है। ज्यादातर फिल्मों में हीरोइनों को महज मूक किरदार समझा जाता है, जबकि बॉलीवुड में 'शोले' की बसंती और 'जब वी मेट' की गीत ढिल्लो जैसे बातुनी किरदारों की भरमार है।
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यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया एननेनबर्ग स्कूल फॉर कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज्म के हालिया अध्ययन के मुताबिक हॉलीवुड हीरोइनें फिल्मों में सिर्फ नजर आने के लिए होती हैं, सुनाई देने के लिए नहीं।
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हॉलीवुड में साल 2012 में बनी सैकड़ों फिल्मों की बात करें तो इनमें हीरोइनों के हिस्से केवल 28 प्रतिशत संवाद ही आए। जबकि हीरो के खाते 70 फीसदी से अधिक। अभिनेत्रियों के इन 28 प्रतिशत संवादों में ज्यादातर संवाद सेक्स अपीलिंग वाले ही रहे।
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बॉलीवुड में हीरोइन का कॅरियर काफी छोटा होता है। उम्र बढ़ते ही उनके पास अभिनय के मौके खत्म हो जाते हैं। अध्ययन के मुताबिक, हॉलीवुड भी इससे बहुत जुदा नहीं है। यहां अभिनेत्रियों का जवान होना जरूरी है जबकि हीरो 45 का हो तो भी वो सुपर-स्पाई बनने की काबिलियत रखता है।
हालांकि बॉलीवुड विशेषज्ञ ऐसा नहीं मानते हैं। वरिष्ठ फिल्म आलोचक राम किशोर पारचा की मानें तो बॉलीवुड में ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा, "यह कहना गलत होगा कि बॉलीवुड में हीरोइनों के साथ अन्याय होता है। अगर अन्याय ही होता तो मधुबाला, रेखा, वहीदा रहमान, समिता पाटिल, शबाना आजमी और हेमा मालिनी जैसी अभिनेत्रियों को वो रुतबा ही नहीं मिल पाता, जहां आज वो हैं। न तो आज के दौर में 'कहानी', 'हीरोइन', 'सत्ता', 'अर्थ' जैसी फिल्में ही बन पातीं।"
पारचा का मानना है कि कामर्शियल सिनेमा में भी सशक्त महिला किरदार सामने आए हैं। 'मदर इंडिया' से लेकर 'हीरोइन' तक ऐसी तमाम मुख्यधारा की फिल्में हैं जिनमें अभिनेत्रियों ने दमदार किरदार निभाया है। "फिल्म दीवार की पहचान बन चुका संवाद 'मेरे पास मां है...', उसे बोला भले ही शशि कपूर ने हो लेकिन जिक्र तो मां का ही है। वहीं जब 'शोले' की बसंती बोलना शुरू करती है तो अमिताभ और धमेंद्र दोनों ही फीके नजर आने लगते हैं। ऐसे में अन्याय वाली बात करना गलत होगा।"