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हिंदी फिल्में और उनका इक्का-तांगा
रामकृष्ण
Updated Mon, 29 Jul 2013 10:47 AM IST
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दौर कोई भी रहा हो फिल्मों में इक्का-तांगा दिख ही जाया करते हैं। फिल्म स्क्रीन के अलावा रियल लाइफ में फिल्मी कलाकारों की दिलचस्पी इक्के की सवारी को लेकर खूब देखने को मिली है।
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आज से कुछ दशक पहले तक भारत के विभिन्न प्रदेशों मे इक्के-तांगों का बोलबाला था। मसलन उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में अगर इक्के खूब चलते थे, तो पश्चिमी क्षेत्र में सवारी के नाम पर तांगे देखे जा सकते थे। लखनऊ में तांगे और इक्के दोनों का प्रचलन था।
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यह इक्के-तांगे उस जमाने के फिल्म अभिनेताओं को इतना ज्यादा भा गए थे कि जब कभी उनको लखनऊ आने का मौका मिलता, वे उन पर सफर करने से कभी नहीं चूकते। मोतीलाल, कुन्दन लाल सहगल, किशोर साहू और प्रेम अदीब जैसे दिग्गज कलाकार लखनऊ आने पर यहां से वहां आने जाने के लिए हमेशा इन इक्कों-तांगों का ही इस्तेमाल करते थे।
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प्रख्यात कथाकार अमृतलाल नागर इस दिशा में उनके मार्गदर्शक हुआ करते थे। अपने मुंबई प्रवास के दौरान उन्होंने इतने लोगों को अपना प्रियजन बना रखा था कि जब किसी को कोई मौका मिलता, वह नागरजी का सान्निध्य प्राप्त करने लखनऊ आ पहुंचता और फिर नागरजी उसे अपने भंग के गोलों के साथ लखनऊ के गली-कूचों की परिक्रमा कराने में मशगूल हो जाते।
ऐसे मौकों पर नागरजी के मुख्य सहायक हुआ करते थे संवादकार व्रजेन्द्र गौड़ के अग्रज धर्मेंद्र। नागरजी के साथ ही धर्मेंद्र भी अपना काफी समय मुंबई में व्यतीत कर चुके थे और उस कालखंड के प्रायः सभी कलाकारों के साथ व्यक्तिगत स्तर पर उनकी जान-पहचान थी।
उनका निजी फोटो-एल्बम इस गवाही से लबरेज था कि कितनी फिल्मी हस्तियों को उन्होंने इक्के की सवारी कराई और कितने लोग उनके साथ तांगे पर बैठे।
बाद के जमाने में सुनील दत्त ने उस परंपरा को पूरे दमखम के साथ जारी रखा। वे उत्तर प्रदेश फिल्म पत्रकार संघ के प्रशस्ति-समारोहों में भाग लेने आने के पहले ही हम लोगों को सूचित कर दिया करते थे कि उनके लिए एक तांगे का इंतजाम हम पहले से कर रखें और फिर खाली समय में वह उसका भरपूर उपयोग करते थे।
मैंने स्वयं देव आनंद, सुचित्रा सेन, माला सिन्हा, संजीव कुमार और शशि कपूर जैसे कलाकारों को तांगे पर बैठा कर इस परंपरा को प्रश्रय दिया है। अभिनय विधा के आदिपुरुष पृथ्वीराज कपूर को तो रिक्शे पर बैठा कर मैं तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से मिलाने भी ले गया और उसमें उन्हें किंचित कोई आपत्ति नहीं हुई थी।
ऐसे लोगों में निर्माता-निर्देशक चेतन आनंद का नाम भी उल्लेखनीय है, जिन्हें चौधरी चरणसिंह से भेंट कराने के लिए मैं रिक्शे पर मुख्यमंत्री आवास ले गया था।