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रिदम कला महोत्सव: पंडित राजेंद्र गंगनी ने कला और नृत्य पर रखे अपने विचार, कहा- कला ना जीत की है ना हार की है, यह सिर्फ अपने व्यवहार की है

Thu, 03 Mar 2022 11:46 AM IST
हर्षिता सक्सेना एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: हर्षिता सक्सेना Updated Thu, 03 Mar 2022 11:46 AM IST
सार

अंजना वेलफेयर सोसायटी के सहयोग से रिदम कला महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव के दौरान संगीत एवं नृत्य की कार्यशाला आयोजित की जा रही है। 26 जनवरी से शुरू हुआ यह कला महोत्सव 45 दिन तक ऑनलाइन आयोजित किया गया।

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Rhythm kala mahostav: Pandit Rajendra Gangni expressed his views on art and dance said  art is not about win or loss its about ones behavior
कला महोत्सव का आयोजन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अंजना वेलफेयर सोसायटी के सहयोग से रिदम कला महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव के दौरान संगीत एवं नृत्य की कार्यशाला आयोजित की जा रही है। 26 जनवरी से शुरू हुआ यह कला महोत्सव 45 दिन तक ऑनलाइन आयोजित किया गया। अब इस महोत्सव को नोएडा, दिल्ली में ऑफलाइन आयोजित किया जाएगा। बीते 8 सालों से आयोजित हो रहे इस  महोत्सव का मकसद युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ना है। इस महोत्सव के तहत हर सप्ताहांत में कला के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इसके तहत आयोजित होने वाली कार्यशाला का हिस्सा बनते हैं।  इसी क्रम में इस सप्ताहांत आयोजित हुई आखिरी ऑनलाइन कार्यशाला में बतौर मेहमान नजर आए भारत के प्रख्यात कथक प्रतिपादक और केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता पंडित राजेंद्र गंगनी। इस दौरान कार्यशाला में शामिल हुए पंडित राजेंद्र गंगानी ने कला और इससे आगे बढ़ाने पर अपने विचार साझा किए

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कार्यशाला के दौरान अंजना वेलफेयर सोसायटी  की फाउंडर माया कुलश्रेष्ठ ने बताया कि अंजना वेलफेयर सोसाइटी बीते 8 सालों से कला और कलाकारों के लिए काम कर रहा है। इस क्षेत्र में काम करते हुए यह सोसाइटी का नौवां साल है। इसके तहत सोसाइटी की तरफ से विभिन्न कार्यशालाएं, कुछ सुर- ताल और रिदम फेस्टिवल आयोगित किए जाते हैं।  सुर ताल फेस्टिवल गुरुजनों के साथ और उनकी उपस्थिति में आयोजित किया जाता है, जबकि रिदम फेस्टिवल युवाओं के लिए आयोजित किया जाता है। कार्यशाला में शामिल हुए पंडित राजेंद्र से बातचीत करते हुए माया कुलश्रेष्ठ ने उनसे सवाल- जवाब भी किए। 

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सवाल: सभी जानते हैं कि आप जयपुर घराने से ताल्लुक रखते हैं, जिसकी खूबसूरती वीररस है। तो जयपुर घराने की शुरुआत किस तरह हुई और आप एक ऐसे परिवार से संबंध रखते हैं जो पीढ़ियों से नृत्य और पंडित से जुड़ा हुआ है, ऐसे में क्या-क्या जिम्मेदारियां हैं जो आपने देखी है?

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जवाब: मैं खुद को सौभाग्यशाली समझता हूं, जो मैंने ऐसे परिवार और घराने में जन्म लिया जिन्होंने अपने पूरे जीवन इस कला को निभाया और इसे हम तक पहुंचाया ताकि हम इसे आगे ले जा सके। घराने की शुरुआत की बात करें तो जब मुगल हमारे यहां आए तो वह अपने साथ कालीन कला, सारंगी, सरोत, संगीत जैसी अपनी कला भी साथ लेकर आए। उस दौरान सिर्फ कथक ही एक ऐसा नृत्य था, जिन्होंने उन्हें आकर्षित किया। इसी आकर्षण की वजह से उनकी कला कथक के साथ जुड़ गई। संगीत और नृत्य के आपस में जुड़ने से तो शैलियां विकसित हुई और इस तरह यह एक पहचान बनी और घराने में तब्दील हो गई।


सवाल: जब कथक में जयपुर घराने के बारे में सीखते हैं तो कहा जाता है कि इसमें तेजी और हाथों के संचालन में तलवार से धार होनी है। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

जवाब: जहां तक बात तेजी की की जाए तो इसका अर्थ यह है कि इसे गति के साथ किया जाए। पुराने समय के कथक की बात करें तो जब व्याकरण कथक होता था तो इसे पूरी तैयारी के साथ किया जाता था। लेकिन जब अदायगी भी इसमें शामिल हुई तो इसकी गति थोड़ी धीमी हो गई। वहीं जयपुर कथक में तैयारी के साथ-साथ अंग की खूबसूरती भी रखी जाती है। वह गति में होते हुए भी खूबसूरत लगती है। पहले के समय में कथक मंदिर प्रांगण में होता था, जो कि काफी छोटी जगह होती थी। पहले के समय में मंच नहीं हुआ करते थे, लेकिन अब मंच, लाइट, साउंड के साथ कथक पहले से और विकसित हुआ है।


सवाल: आप कथक केंद्र में गुरु है, जितना मुझे पता है आपने बहुत जल्दी सिखाना शुरू किया था। इस दौरान आपने समय का परिवर्तन भी देखा है। ऐसे में आज के विद्यार्थियों में आप किस तरह का बदलाव देखते हैं?

जवाब: उस समय की बात करें तो जब मैंने सिखाना शुरू किया था, तब जो छात्र छात्राएं होते थे उनके पास समय की कोई पाबंदी नहीं थी। उन्हें बाहरी जिसे अपनी ओर आकर्षित नहीं करती थी। वहीं आज के टाइम में यह थोड़ा सा परिवर्तन आया है कि आज के विद्यार्थियों को और भी बहुत सारी चीजें करनी होती हैं।


सवाल: आज के समय में बहुत कम ही ऐसे युवा हैं, जो शास्त्रीय कलाओं को सीखना चाहते हैं और जो सीखना चाहते हैं वह उन्हें इन्हीं वजह से आगे नहीं बढ़ा पाते। ऐसे में एक गुरु होने के नाते हम किस तरह उन युवाओं को बता सकते हैं कि वह इसे आगे बढ़ाएं या हम कैसे उन्हें प्रेरणा दे सकते हैं?


जवाब:
इसके लिए सबसे जरूरी बात यह है कि जो इसे सीखना चाहते हैं, उन्हें खुद यह फैसला करना होगा कि वह इसे क्यों सीखना चाहते हैं। क्योंकि जब आप इसमें कोई वजह ढूंढेंगे तो यह आपको भ्रमित करने लगता है। युवाओं की परिस्थिति तब खराब हो जाती है जब वह इसमें कुछ और ढूंढने लग जाते हैं। इसे सीखने से पहले आप को यह तय करना चाहिए कि आपको यह पसंद है और आपने इसे अपनाया है। कला को सीखने वाले सभी लोगों को यह मानना चाहिए कि वह जो भी सीख रहे हैं, इसे अपने लिए सीख रहे हैं, किसी दूसरे के लिए या जीत हार के लिए नहीं सीख रहे हैं। क्योंकि कला ना जीत की है ना हार की है, कला स्वयं के व्यवहार की है। अमर उजाला इसमें मीडिया पार्टनर है।
 

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