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श्याम बेनेगल समिति की सिफारिशें ठंडे बस्ते में, नया लोगो अपनाकर 'सेंसर बोर्ड' आज बदलेगा अपना चेहरा
Sat, 31 Aug 2019 11:25 AM IST
शिप्रा सक्सेना
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिप्रा सक्सेना
Updated Sat, 31 Aug 2019 11:25 AM IST
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Shyam Benegal and Prakash Javadekar
- फोटो : file photo
सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टीफिकेशन भी अपना चेहरा मोहरा बदलने की जुगत में जुट गया है। श्याम बेनेगल समिति की फिल्मों को सर्टिफिकेट देने की सिफारिशें भले अभी तक ठंडे बस्ते में पड़ी हों लेकिन सेंसर बोर्ड को लगता है कि नया लोगो और नया सर्टिफिकेट उसे नए जमाने के साथ कदमताल करने लायक जरूर बना देगा। ये लोगो शनिवार को मुंबई में प्रस्तावित एक खास समारोह में सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर जारी करेंगे।
नए लोगो और सर्टीफिकेट को लेकर सेंसर बोर्ड के चीफ प्रसून जोशी खासा उत्साहित हैं। उत्साह जताते हुए प्रसून कहते हैं, "नए लोगो का नया डिजाइन फ्यूचरिस्टिक है और आज की डिजिटल दुनिया के लिए एकदम सटीक बैठता है। यह नया और खास डिजाइन रोहित देवगन और नेशनल सेक्योरिटीस डिपोसिट्री लिमिटेड की टेक्निकल सपोर्ट टीम ने मिलकर किया है।"
बता दें कि दादासाहेब फाल्के निर्मित भारत की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' के 1913 में रिलीज होने के बाद, भारतीय सिनेमाटोग्राफ अधिनियम पारित किया गया था। इसे लागू होने में ही सात साल लग गए थे। सेंसर बोर्ड तब मद्रास, बॉम्बे, कलकत्ता, लाहौर और रंगून के शहरों में पुलिस प्रमुखों के अधीन रखा गया था। क्षेत्रीय सेंसर बोर्ड तब अपने फैसले खुद लेने के लिए स्वतंत्र थे।
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देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद क्षेत्रीय सेंसर बोर्ड्स की स्वायत्तता को समाप्त कर दिया गया और उन्हें बॉम्बे बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर के तहत लाया गया। बोर्ड को 1952 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के तहत एकीकृत और पुनर्गठित किया गया। सर्टीफिकेट नियमों को आखिरी बार 1983 में संशोधित किया गया।
यह भी पढ़ें:- एक्सक्लूसिव: ऋतिक ने साझा किए जिंदगी के सबक, बोले- 'नकारात्मक लोगों से इसलिए दूरी बहुत जरूरी'
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नए लोगो और सर्टीफिकेट को लेकर सेंसर बोर्ड के चीफ प्रसून जोशी खासा उत्साहित हैं। उत्साह जताते हुए प्रसून कहते हैं, "नए लोगो का नया डिजाइन फ्यूचरिस्टिक है और आज की डिजिटल दुनिया के लिए एकदम सटीक बैठता है। यह नया और खास डिजाइन रोहित देवगन और नेशनल सेक्योरिटीस डिपोसिट्री लिमिटेड की टेक्निकल सपोर्ट टीम ने मिलकर किया है।"
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बता दें कि दादासाहेब फाल्के निर्मित भारत की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' के 1913 में रिलीज होने के बाद, भारतीय सिनेमाटोग्राफ अधिनियम पारित किया गया था। इसे लागू होने में ही सात साल लग गए थे। सेंसर बोर्ड तब मद्रास, बॉम्बे, कलकत्ता, लाहौर और रंगून के शहरों में पुलिस प्रमुखों के अधीन रखा गया था। क्षेत्रीय सेंसर बोर्ड तब अपने फैसले खुद लेने के लिए स्वतंत्र थे।
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देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद क्षेत्रीय सेंसर बोर्ड्स की स्वायत्तता को समाप्त कर दिया गया और उन्हें बॉम्बे बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर के तहत लाया गया। बोर्ड को 1952 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के तहत एकीकृत और पुनर्गठित किया गया। सर्टीफिकेट नियमों को आखिरी बार 1983 में संशोधित किया गया।
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