आखिर कब तक चलेगी ये गंदी बात?
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एबीसीडी पढ़ ली बहुत, ठंडी आहें भर ली बहुत, अच्छी बातें कर ली बहुत, अब करूंगा तेरे साथ गंदी बात.... फिल्में और गाने युवाओं के मन पर बहुत असर डालते हैं। सिनेमा में हीरो द्वारा हीरोइन का पीछा करना कथित मर्दानगी जैसा दिखाया जाता है मगर असल जिंदगी में इसके घातक परिणाम आते हैं।ना मतलब ना। सिनेमाघरों में इन दिनों लगी 'पिंक' यह दो टूक संदेश दे रही है। दूसरी तरफ राजधानी दिल्ली से मंगलवार को आई बेरहम आशिकों की खबरों ने लोगों को दहलाया। एक ने पीछा करते हुए सरेआम युवती की हत्या कर दी और दूसरे ने युवती द्वारा शादी से इंकार करने पर उसे दूसरी मंजिल से फेंक दिया।
इसी सुबह चेन्नई से खबर थी कि एक एनजीओ द रेड एलिफेंट फाउंडेशन ने ऑनलाइन याचिका अभियान शुरू किया है जिसमें साउथ के फिल्मकारों से अपील की गई कि वो पर्दे पर हीरो द्वारा हीरोइन का पीछा करने के दृश्यों को कूल और रोमांटिक अंदाज में पेश न करें। यह महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को महिमामंडित करता है।
ड्रामा रिसर्चर ऐश्वर्या वी. ने याचिका में कहा कि तमिल फिल्में लगातार ऐसे दृश्य दिखाती हैं जिसमें पीछा करता हुआ हीरो हीरोइन को आकर्षित करने का प्रयास करता है। कुल जमा संदेश जाता है कि आखिरकार लड़की पीछा करने वाले के आगे समर्पण कर देती है। यह सीन साबित करते हैं कि महिलाओं को ना कहने का अधिकार नहीं है। तमिलनाडु में बीते महीनों में आधा दर्जन मामले सामने आए जिनमें पीछा करने वाले को ना कहने वाली महिलाओं की घर, स्कूल या सार्वजनिक स्थल पर हत्या कर दी गई।
वास्तव में यह हीरोगिरी सिर्फ तमिल फिल्मों में नहीं होती। बॉलीवुड में भी हीरो द्वारा हीरोइन का पीछा करना, छेड़ना, उल्टी-सीधी बातों से रिझाने की कोशिश करना आम चलन है। इसे न तो निर्माता-निर्देशक-एक्टर अपराध के रूप में देखते हैं और न ही दर्शक। राज कपूर, शम्मी कपूर, देवानंद के जमाने से गढ़े जा रहे हीरोइनों का पीछा करने के ये सीन अमिताभ बच्चन, धर्मेंद, जीतेंद्र से होते हुए तीनों खानों के बाद शाहिद कपूर, रणबीर कपूर, धनुष तक बने और चर्चित हुए हैं।
बॉलीवुड फिल्मों के माध्यम से समाज में किसी अपराध के बढ़ने या उससे किसी के प्रेरित होने की बात स्वीकार नहीं करता। उसका तर्क है कि जो समाज में होता है हम वही दिखाते हैं। यह सही है या गलत अंतहीन बहस का मुद्दा है। मुश्किल यह भी है कि पिंक देखते हुए संवेदनशील हो जाने वाले दर्शक किसी अन्य फिल्म में जब देखते हैं कि उनका पसंददीदा हीरो हीरोइन का पीछा करते हुए अंततः उसे हासिल कर लेता है तो वही ताली बजाते हुए खुशी-खुशी बाहर आते हैं।
क्या यह दोहरी मानसिकता है? क्या इस मामले में एक्टर कोई पहल कर सकते हैं? क्या हीरोइनें किसी ऐसे दृश्य का हिस्सा बनने से इंकार कर सकती हैं? क्या हीरो फिल्म के प्रोड्यूसर-डायरेक्टर से कह सकता है कि वह हीरोइन का पीछा करने वाला सीन नहीं करेगा। नहीं मतलब यकीनी तौर पर नहीं।
1-दीवाना मुझसा नहीं (1990): आमिर खान को लगता है कि हंस-हंस कर बोलने वाली माधुरी दीक्षित उनसे प्यार कर बैठी हैं। माधुरी मामला स्पष्ट करना चाहती हैं और सचमुच प्यार में पड़ जाती हैं।
2-डर (1993): शाहरुख खान कॉलेज में साथ पढ़ने वाली जूही चावला के दीवाने हैं। छुप-छुप कर देखते और पीछा करते हैं। वह किसी और से प्यार करती हैं। शाहरुख का प्यार हिंसक हो जाता है।
3-अंजाम (1994): फ्लाइट में मिली माधुरी के आगे शाहरुख शादी का प्रस्ताव रखते हैं। वह इंकार कर कहीं और शादी कर लेती हैं। चार साल बाद शाहरुख लौटते हैं। खूनी संघर्ष होता है।
4-दरार (1996): पत्नी को प्रताड़ित करने वाले अरबाज खान को पता चलता है कि हादसे में वह मर गई। ऐसा होता नहीं। वह यहां-वहां पता करते हुए पत्नी को ढूंढ निकालते हैं।
5-जीत (1996): हत्यारे बने सनी देओल का दिल करिश्मा कपूर पर आ जाता है। वो उसका पीछा करते हैं। वह आखिरकार मान जाती है लेकिन बाद में सलमान खान के साथ चली जाती है।
6-दीवानगी (2002): बचपन में अजय देवगन-उर्मिला मातोंडकर की शादी माता-पिता ने पक्की कर दी थी। बड़े होने पर हालात बदल गए। अजय बचपन की बातें भूल नहीं सके।
7-तेरे नाम (2003): कॉलेज के दबंग सलमान को संस्कारी भूमिका चावला पसंद आ जाती हैं। वह रात दिन उसके बारे में सोचते हैं, उसका पीछा करते हैं। एक दिन उठा भी ले जाते हैं।
8-सांवरिया (2007): रणबीर कपूर पूरी फिल्म में सोनम का पीछा करते हैं कि वह उनसे प्यार करने लगे। अंत में सोनम सलमान के साथ चली जाती हैं।
9-रांझणा (2013): धनुष लगातार सोनम का पीछा करते हैं। अपने प्यार का सबूत देने के लिए कलाई की नस तक काट लेते हैं। वह उन्हें दोस्त मानने पर मजबूर होती हैं।
10-तनु वेड्स मनु रिटर्न्स (2015): आर.माधवन के दोस्त बने दीपक डोबरियाल का दिल एक लड़की पर आ जाता है। वह इंकार करती है। दीपक पीछे पड़ जाते हैं। दोस्तों के साथ मिल कर घर से उठा लाते हैं।
-माना जनाब ने पुकारा नहीं क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं (पेइंग गेस्ट, 1957)
-मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं (संगम, 1964)
-दीवाना मुझ-सा नहीं इस अंबर के नीचे (तीसरी मंजिल, 1966)
-तेरा पीछा ना मैं छोड़ूंगा सोणिये (जुगनु, 1973)
-कोई हसीना जब रूठ जाती है तो और भी नमकीन हो जाती है (शोले, 1975)
-खंभे जैसी खड़ी है (दिल, 1990)
-लाल दुपट्टे वाली तेरा नाम तो बता (आंखें, 1993)
-अब करुंगा गंदी बात (आर... राजकुमार, 2013)