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सीट का समीकरण: 2022 के चुनाव में शाहगंज में 20 साल बाद हारी सपा; महज 719 वोट से हुआ फैसला, ऐसा है इसका इतिहास
Wed, 07 Oct 2026 06:01 AM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Wed, 07 Oct 2026 06:01 AM IST
सार
जौनपुर की शाहगंज विधानसभा सीट का इतिहास 1957 से शुरू होता है। शुरुआती दौर में यहां कांग्रेस का प्रभाव रहा, जबकि बाद में भाजपा, बसपा और सपा ने जीत दर्ज की। पिछले यानी साल 2022 के चुनाव में यहां एनडीए उम्मीदावार रमेश सिंह करीबी मुकाबले में जीते।
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शाहगंज सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से हर सीट पर राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण साधने में जुटे हैं। भाजपा जहां अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में है, वहीं विपक्षी दल भी अपने पुराने समीकरणों को नए सिरे से मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में हम आपको यूपी की सभी विधानसभा सीटों का इतिहास, राजनीतिक सफर और चुनावी गणित बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज चर्चा जौनपुर जिले की शाहगंज विधानसभा सीट की। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इसका अब तक का इतिहास क्या रहा है।
पहले जानते हैं शाहगंज जिले की सीटों के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें 403 विधानसभा सीटें आती हैं। इन्हीं में से एक जिला जौनपुर है। जिले में कुल नौ विधानसभा सीटें हैं। इनमें- बदलापुर, शाहगंज, जौनपुर, मल्हनी, मुंगरा बादशाहपुर, मछलीशहर, मड़ियाहूं, केराकत और जफराबाद शामिल हैं।
'सीट का समीकरण' की कड़ी में आज हम शाहगंज विधानसभा सीट की बात करेंगे। शाहगंज विधानसभा सीट वैसे तो साल 1951-52 में देश के पहले आम चुनाव में ही अस्तित्व में है, लेकिन उस समय यह क्षेत्र कई अलग हिस्सों में विभाजित था। हालांकि परिसीमन के बाद यह सीट साल 1957 में अपने नए स्वरूप में अस्तित्व में आई और इसके नए स्वरूप में सीट पर पहली बार 1957 में चुनाव कराए गए।
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शुरुआत में यह विधानसभा एक द्विसदस्यीय सीट थी, यानी यहां से दो विधायक चुने जाते थे। इस विधानसभा क्षेत्र के पहले विधायक कुंवर श्रीपाल और माता प्रसाद बने थे। शुरुआत में यह सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित थी, हालांकि 2008 के परिसीमन के बाद इसे एक सामान्य सीट कर दिया गया।
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पहले जानते हैं शाहगंज जिले की सीटों के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें 403 विधानसभा सीटें आती हैं। इन्हीं में से एक जिला जौनपुर है। जिले में कुल नौ विधानसभा सीटें हैं। इनमें- बदलापुर, शाहगंज, जौनपुर, मल्हनी, मुंगरा बादशाहपुर, मछलीशहर, मड़ियाहूं, केराकत और जफराबाद शामिल हैं।
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'सीट का समीकरण' की कड़ी में आज हम शाहगंज विधानसभा सीट की बात करेंगे। शाहगंज विधानसभा सीट वैसे तो साल 1951-52 में देश के पहले आम चुनाव में ही अस्तित्व में है, लेकिन उस समय यह क्षेत्र कई अलग हिस्सों में विभाजित था। हालांकि परिसीमन के बाद यह सीट साल 1957 में अपने नए स्वरूप में अस्तित्व में आई और इसके नए स्वरूप में सीट पर पहली बार 1957 में चुनाव कराए गए।
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शुरुआत में यह विधानसभा एक द्विसदस्यीय सीट थी, यानी यहां से दो विधायक चुने जाते थे। इस विधानसभा क्षेत्र के पहले विधायक कुंवर श्रीपाल और माता प्रसाद बने थे। शुरुआत में यह सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित थी, हालांकि 2008 के परिसीमन के बाद इसे एक सामान्य सीट कर दिया गया।
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शाहगंज विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
शाहगंज विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में यादव, एससी, क्षत्रिय, बिंद और राजभर आबादी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी यादव मतदाताओं की है, जो लगभग 16% हैं। इसके बाद एससी (दलित) मतदाता लगभग 13%, क्षत्रिय मतदाता करीब 11% और बिंद मतदाता लगभग 9% हैं।
अन्य प्रमुख वर्गों में मुस्लिम मतदाता लगभग 8% और राजभर मतदाता करीब 9% हैं। इसके अलावा ब्राह्मण मतदाता लगभग 7% हैं, जबकि बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों व समुदायों से आते हैं।
शाहगंज विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में यादव, एससी, क्षत्रिय, बिंद और राजभर आबादी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी यादव मतदाताओं की है, जो लगभग 16% हैं। इसके बाद एससी (दलित) मतदाता लगभग 13%, क्षत्रिय मतदाता करीब 11% और बिंद मतदाता लगभग 9% हैं।
अन्य प्रमुख वर्गों में मुस्लिम मतदाता लगभग 8% और राजभर मतदाता करीब 9% हैं। इसके अलावा ब्राह्मण मतदाता लगभग 7% हैं, जबकि बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों व समुदायों से आते हैं।
इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
शाहगंज विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
शाहगंज विधानसभा सीट के चुनावी इतिहास की बात करें तो शुरुआती समय में शाहगंज सीट पर कांग्रेस की पकड़ रही। 1957 के समय में शाहगंज विधानसभा सीट एक द्विसदस्यीय सीट थी। इसके चलते यहां से दो विधायक चुने गए थे। इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार कुंवर श्रीपाल और कांग्रेस के माता प्रसाद विजयी हुए थे।
1962: कांग्रेस के लक्ष्मी शंकर यादव ने मारी बाजी
1962 के यूपी विधानसभा चुनाव में जौनपुर जिले की शाहगंज विधानसभा सीट से कांग्रेस के लक्ष्मी शंकर यादव विजयी हुए। उन्होंने निर्दलीय ठाकुर प्रसाद को 14,994 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में लक्ष्मी शंकर यादव को 32,260 वोट, जबकि ठाकुर प्रसाद को 17,266 वोट मिले।
इसके बाद राज्य में 1967, 1969 और 1974 के चुनाव हुए। इन तीनों ही चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए माता प्रसाद विजयी रहे।
1967 के चुनाव में माता प्रसाद ने भारतीय जनसंघ के राम प्रताप को 18,586 वोटों के अंतर से हराया। इसके बाद 1969 के चुनाव में भी उन्होंने भारतीय जनसंघ के राम प्रताप को 14,554 वोटों के अंतर से शिकस्त दी। वहीं 1974 के चुनाव में उन्होंने भारतीय क्रांति दल (BKD) के उम्मीदवार छोटेलाल को 2,499 वोटों के अंतर से हराया।
शाहगंज विधानसभा सीट के चुनावी इतिहास की बात करें तो शुरुआती समय में शाहगंज सीट पर कांग्रेस की पकड़ रही। 1957 के समय में शाहगंज विधानसभा सीट एक द्विसदस्यीय सीट थी। इसके चलते यहां से दो विधायक चुने गए थे। इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार कुंवर श्रीपाल और कांग्रेस के माता प्रसाद विजयी हुए थे।
1962: कांग्रेस के लक्ष्मी शंकर यादव ने मारी बाजी
1962 के यूपी विधानसभा चुनाव में जौनपुर जिले की शाहगंज विधानसभा सीट से कांग्रेस के लक्ष्मी शंकर यादव विजयी हुए। उन्होंने निर्दलीय ठाकुर प्रसाद को 14,994 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में लक्ष्मी शंकर यादव को 32,260 वोट, जबकि ठाकुर प्रसाद को 17,266 वोट मिले।
इसके बाद राज्य में 1967, 1969 और 1974 के चुनाव हुए। इन तीनों ही चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए माता प्रसाद विजयी रहे।
1967 के चुनाव में माता प्रसाद ने भारतीय जनसंघ के राम प्रताप को 18,586 वोटों के अंतर से हराया। इसके बाद 1969 के चुनाव में भी उन्होंने भारतीय जनसंघ के राम प्रताप को 14,554 वोटों के अंतर से शिकस्त दी। वहीं 1974 के चुनाव में उन्होंने भारतीय क्रांति दल (BKD) के उम्मीदवार छोटेलाल को 2,499 वोटों के अंतर से हराया।
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977: जनता पार्टी ने मारी बाजी
1977 के चुनाव में शाहगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी के छोटे लाल विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के ललता प्रसाद को 9,803 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में छोटे लाल को 27,802 वोट, जबकि ललता प्रसाद को 17,999 वोट मिले। इस जीत के साथ शाहगंज सीट पर कांग्रेस के लंबे समय से चले आ रहे वर्चस्व को बड़ा झटका लगा।
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977: जनता पार्टी ने मारी बाजी
1977 के चुनाव में शाहगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी के छोटे लाल विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के ललता प्रसाद को 9,803 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में छोटे लाल को 27,802 वोट, जबकि ललता प्रसाद को 17,999 वोट मिले। इस जीत के साथ शाहगंज सीट पर कांग्रेस के लंबे समय से चले आ रहे वर्चस्व को बड़ा झटका लगा।
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1980 का चुनाव
साल 1980 के विधानसभा चुनाव में शाहगंज सीट से कांग्रेस (आई) के उम्मीदवार पहलवान ने जीत दर्ज की। उन्होंने जनता पार्टी (सेक्युलर) के प्रत्याशी दीपचंद सोनकर को 13,851 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में पहलवान को 29,498 वोट मिले, जबकि दीपचंद सोनकर को 15,647 वोट प्राप्त हुए।
1985 और 1989 का चुनाव
1980 के बाद 1985 और 1989 में चुनाव हुए। इन चुनावों में दीप चंद्र सोनकर ने जीत दर्ज की। 1985 के चुनाव में उन्होंने लोकदल के टिकट पर चुनाव जीता। चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के बलि करण को 4,522 वोटों से हराया। वहीं, 1989 के चुनाव में उन्होंने जनता दल के टिकट पर चुनाव में जीत दर्ज की। इस चुनाव में उन्होंने बसपा के राम डावर को 6,699 वोटों के अंतर से हराया।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में शाहगंज विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
साल 1980 के विधानसभा चुनाव में शाहगंज सीट से कांग्रेस (आई) के उम्मीदवार पहलवान ने जीत दर्ज की। उन्होंने जनता पार्टी (सेक्युलर) के प्रत्याशी दीपचंद सोनकर को 13,851 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में पहलवान को 29,498 वोट मिले, जबकि दीपचंद सोनकर को 15,647 वोट प्राप्त हुए।
1985 और 1989 का चुनाव
1980 के बाद 1985 और 1989 में चुनाव हुए। इन चुनावों में दीप चंद्र सोनकर ने जीत दर्ज की। 1985 के चुनाव में उन्होंने लोकदल के टिकट पर चुनाव जीता। चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के बलि करण को 4,522 वोटों से हराया। वहीं, 1989 के चुनाव में उन्होंने जनता दल के टिकट पर चुनाव में जीत दर्ज की। इस चुनाव में उन्होंने बसपा के राम डावर को 6,699 वोटों के अंतर से हराया।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में शाहगंज विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991: पहली बार जीती भाजपा
इस चुनाव में शाहगंज सीट से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राम पारस रजक उर्फ नाटे विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) के राम डावर को 11,098 वोटों के अंतर से हराया।
1993: पहली बार जीती बसपा
इसके बाद 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के राम डावर ने जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा की उम्मीदवार मंजू लता को 9,943 वोटों के अंतर से शिकस्त दी।
भाजपा ने की वापसी
1996 के चुनाव में भाजपा ने वापसी की और उसके प्रत्याशी बांके लाल सोनकर विजयी हुए। उन्होंने बसपा के राम डावर को 7,618 वोटों के अंतर से हराया।
इस चुनाव में शाहगंज सीट से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राम पारस रजक उर्फ नाटे विजयी हुए। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) के राम डावर को 11,098 वोटों के अंतर से हराया।
1993: पहली बार जीती बसपा
इसके बाद 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के राम डावर ने जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा की उम्मीदवार मंजू लता को 9,943 वोटों के अंतर से शिकस्त दी।
भाजपा ने की वापसी
1996 के चुनाव में भाजपा ने वापसी की और उसके प्रत्याशी बांके लाल सोनकर विजयी हुए। उन्होंने बसपा के राम डावर को 7,618 वोटों के अंतर से हराया।
इन चुनावों के बाद राज्य में 2002, 2007, 2012 और 2017 के चुनाव हुए। इस दौरान शाहगंज विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी का कब्जा रहा। हालांकि इस दौरान पार्टी ने प्रत्याशी बदले लेकिन नतीजे में कोई बदलाव नहीं आया और यहां से समाजवादी पार्टी लगातार जीत दर्ज करती रही।
2002: पहली बार जीती सपा
साल 2002 के चुनाव में शाहगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के जगदीश सोनकर विजयी हुए। उन्होंने बसपा के राम फेर गौतम को 5,822 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जगदीश सोनकर को 42,180 वोट, जबकि राम फेर गौतम को 36,358 वोट मिले। वहीं, भाजपा के बांके लाल सोनकर 36,110 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
सपा ने दोहराई जीत
2007 के चुनाव में भी शाहगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के जगदीश सोनकर विजयी हुए। इस बार भी उन्होंने बसपा के राम फेर गौतम को सिर्फ 666 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जगदीश सोनकर को 41,354 वोट, जबकि राम फेर गौतम को 40,688 वोट मिले। वहीं, भाजपा के बांके लाल सोनकर 31,917 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2002: पहली बार जीती सपा
साल 2002 के चुनाव में शाहगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के जगदीश सोनकर विजयी हुए। उन्होंने बसपा के राम फेर गौतम को 5,822 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जगदीश सोनकर को 42,180 वोट, जबकि राम फेर गौतम को 36,358 वोट मिले। वहीं, भाजपा के बांके लाल सोनकर 36,110 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
सपा ने दोहराई जीत
2007 के चुनाव में भी शाहगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के जगदीश सोनकर विजयी हुए। इस बार भी उन्होंने बसपा के राम फेर गौतम को सिर्फ 666 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में जगदीश सोनकर को 41,354 वोट, जबकि राम फेर गौतम को 40,688 वोट मिले। वहीं, भाजपा के बांके लाल सोनकर 31,917 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
2012: सपा ने लगाई जीत की हैट्रिक
2012 और 2017 के चुनाव में शाहगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के शैलेंद्र यादव 'ललई' विजयी हुए। 2012 में उन्होंने बसपा के धर्मराज निषाद को 10,223 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में शैलेंद्र यादव को 74,486 वोट, जबकि धर्मराज निषाद को 64,263 वोट मिले। वहीं, भाजपा के ओम प्रकाश जायसवाल 36,085 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। 2017 के चुनाव में उन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राणा अजीत प्रताप सिंह को 9,162 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में शैलेंद्र यादव को 67,818 वोट, जबकि राणा अजीत प्रताप सिंह को 58,656 वोट मिले। वहीं, बसपा के ओम प्रकाश सिंह 51,176 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2022: एनडीए ने तोड़ा सपा का तिलिस्म
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में जौनपुर जिले की शाहगंज विधानसभा सीट से एनडीए उम्मीदवार निषाद पार्टी के रमेश सिंह विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के शैलेंद्र यादव 'ललई' को महज 719 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रमेश सिंह को 87,233 वोट, जबकि शैलेंद्र यादव 'ललई' को 86,514 वोट मिले। वहीं, बसपा के इंदर देव 48,957 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2012 और 2017 के चुनाव में शाहगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के शैलेंद्र यादव 'ललई' विजयी हुए। 2012 में उन्होंने बसपा के धर्मराज निषाद को 10,223 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में शैलेंद्र यादव को 74,486 वोट, जबकि धर्मराज निषाद को 64,263 वोट मिले। वहीं, भाजपा के ओम प्रकाश जायसवाल 36,085 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। 2017 के चुनाव में उन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राणा अजीत प्रताप सिंह को 9,162 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में शैलेंद्र यादव को 67,818 वोट, जबकि राणा अजीत प्रताप सिंह को 58,656 वोट मिले। वहीं, बसपा के ओम प्रकाश सिंह 51,176 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
2022: एनडीए ने तोड़ा सपा का तिलिस्म
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में जौनपुर जिले की शाहगंज विधानसभा सीट से एनडीए उम्मीदवार निषाद पार्टी के रमेश सिंह विजयी हुए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के शैलेंद्र यादव 'ललई' को महज 719 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रमेश सिंह को 87,233 वोट, जबकि शैलेंद्र यादव 'ललई' को 86,514 वोट मिले। वहीं, बसपा के इंदर देव 48,957 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।