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सीट का समीकरण: सपा का अभेद्य किला है जसवंतनगर, चार दशक से मुलायम-शिवपाल का दबदबा; ऐसा है यहां का चुनावी इतिहास
Tue, 27 Oct 2026 08:21 PM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Tue, 27 Oct 2026 08:21 PM IST
सार
- इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट साल 1957 में अस्तित्व में आई।
- इस सीट पर लंबे वक्त से मुलायम सिंह यादव के परिवार का दबदबा रहा है।
- मौजूदा समय में मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव यहां से विधायक हैं। आइये जानते हैं इस सीट का चुनावी इतिहास...
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जसवंतनगर सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो चुकी है। 403 विधानसभा सीटों वाले प्रदेश में हर सीट का अपना अलग राजनीतिक इतिहास है। कुछ सीटें किसी खास पार्टी के गढ़ के तौर पर जानी जाती हैं, तो कुछ ऐसी सीटें हैं जहां दशकों से एक ही परिवार का प्रभाव देखने को मिलता है। इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट भी ऐसी ही सीट है, जहां 1985 से मुलायम सिंह यादव परिवार का दबदबा कायम है।
जसवंतनगर की सियासत की कहानी सिर्फ चुनावी जीत-हार की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक विरासत की कहानी है, जिसकी शुरुआत मुलायम सिंह यादव से हुई और बाद में उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने उसे आगे बढ़ाया। दोनों भाइयों ने अलग-अलग दौर में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया और लंबे समय से जसवंतनगर सीट को यादव परिवार की मजबूत राजनीतिक जमीन बनाए रखा।
पहले जानते हैं जसवंतनगर विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला इटावा है। इटावा जिले में कुल 3 विधानसभा सीटें हैं। इनमें- इटावा, जसवंतनगर और भरथना शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट की बात करेंगे। इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आ गई थी। यहां पहला चुनाव 1957 में ही हुआ था। यहां से पहले विधायक चौधरी अभय राम सिंह यादव बने थे, जिन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। यह विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव के परिवार का प्रमुख गढ़ मानी जाती है। 1967 से लेकर अब तक (केवल 1969 और 1980 के चुनाव को छोड़ दें) तो इस सीट पर लगातार यादव परिवार का ही वर्चस्व रहा है।
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जसवंतनगर की सियासत की कहानी सिर्फ चुनावी जीत-हार की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक विरासत की कहानी है, जिसकी शुरुआत मुलायम सिंह यादव से हुई और बाद में उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने उसे आगे बढ़ाया। दोनों भाइयों ने अलग-अलग दौर में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया और लंबे समय से जसवंतनगर सीट को यादव परिवार की मजबूत राजनीतिक जमीन बनाए रखा।
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पहले जानते हैं जसवंतनगर विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला इटावा है। इटावा जिले में कुल 3 विधानसभा सीटें हैं। इनमें- इटावा, जसवंतनगर और भरथना शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट की बात करेंगे। इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आ गई थी। यहां पहला चुनाव 1957 में ही हुआ था। यहां से पहले विधायक चौधरी अभय राम सिंह यादव बने थे, जिन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। यह विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव के परिवार का प्रमुख गढ़ मानी जाती है। 1967 से लेकर अब तक (केवल 1969 और 1980 के चुनाव को छोड़ दें) तो इस सीट पर लगातार यादव परिवार का ही वर्चस्व रहा है।
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जसवंतनगर विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
जसवंतनगर विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में सबसे बड़ी और निर्णायक हिस्सेदारी यादव मतदाताओं की है, जिनकी संख्या इस क्षेत्र में सबसे अधिक लगभग 37% है। इसके बाद अनुसूचित जाति (दलित) समुदाय के मतदाताओं की एक बड़ी और मजबूत आबादी लगभग 22% है, जो चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वहीं शाक्य, कुशवाहा व काछी वर्ग की हिस्सेदारी करीब 12% और अति पिछड़ा वर्ग (पाल, बघेल, लोधी, निषाद, मल्लाह, सविता, तेली आदि) के लगभग 8% मतदाता हैं। इनके अलावा क्षेत्र में ब्राह्मण समुदाय के करीब 5%, वैश्य, बनिया व कायस्थ समाज के लगभग 4%, अल्पसंख्यक समुदाय के करीब 4% तथा ठाकुर (क्षत्रिय) समाज के लगभग 3% मतदाता मौजूद हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य समुदायों से आते हैं।
1957 में अस्तित्व में आई सीट
जसवंतनगर विधानसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आई और इसी साल यहां पहला विधानसभा चुनाव हुआ। पहले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार चौधरी अभय राम सिंह यादव ने कांग्रेस के प्रबल प्रताप सिंह को 7,554 वोटों के अंतर से हराया।
जसवंतनगर विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में सबसे बड़ी और निर्णायक हिस्सेदारी यादव मतदाताओं की है, जिनकी संख्या इस क्षेत्र में सबसे अधिक लगभग 37% है। इसके बाद अनुसूचित जाति (दलित) समुदाय के मतदाताओं की एक बड़ी और मजबूत आबादी लगभग 22% है, जो चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वहीं शाक्य, कुशवाहा व काछी वर्ग की हिस्सेदारी करीब 12% और अति पिछड़ा वर्ग (पाल, बघेल, लोधी, निषाद, मल्लाह, सविता, तेली आदि) के लगभग 8% मतदाता हैं। इनके अलावा क्षेत्र में ब्राह्मण समुदाय के करीब 5%, वैश्य, बनिया व कायस्थ समाज के लगभग 4%, अल्पसंख्यक समुदाय के करीब 4% तथा ठाकुर (क्षत्रिय) समाज के लगभग 3% मतदाता मौजूद हैं। बाकी बचे मतदाता अन्य समुदायों से आते हैं।
1957 में अस्तित्व में आई सीट
जसवंतनगर विधानसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आई और इसी साल यहां पहला विधानसभा चुनाव हुआ। पहले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार चौधरी अभय राम सिंह यादव ने कांग्रेस के प्रबल प्रताप सिंह को 7,554 वोटों के अंतर से हराया।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1962: पहली बार जीती प्रजा सोशलिस्ट पार्टी
1957 के बाद राज्य में 1962 के विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के चौधरी नत्थू सिंह यादव विजयी हुए। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बिशंभर सिंह यादव को 739 वोटों के अंतर से हराया।
जसवंतनगर की राजनीति को स्थायी तौर पर बदलने वाला मोड़ 1967 के विधानसभा चुनाव में आया। इस चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार मुलायम सिंह यादव पहली बार जसवंतनगर से विधायक बने। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के जे.एस. लाल को 11,794 वोटों के बड़े अंतर से हराया।यहीं से जसवंतनगर और मुलायम सिंह यादव का रिश्ता मजबूत होता चला गया।
हालांकि 1969 में मुलायम सिंह यादव को कांग्रेस के बिशंभर सिंह यादव के हाथों हार का सामना करना पड़ा, लेकिन यह हार उनके राजनीतिक सफर को रोक नहीं सकी। 1974 में भारतीय क्रांति दल के टिकट पर उन्होंने वापसी की और बिशंभर सिंह यादव को 14,258 वोटों से हराया।
1957 के बाद राज्य में 1962 के विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के चौधरी नत्थू सिंह यादव विजयी हुए। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बिशंभर सिंह यादव को 739 वोटों के अंतर से हराया।
जसवंतनगर की राजनीति को स्थायी तौर पर बदलने वाला मोड़ 1967 के विधानसभा चुनाव में आया। इस चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार मुलायम सिंह यादव पहली बार जसवंतनगर से विधायक बने। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के जे.एस. लाल को 11,794 वोटों के बड़े अंतर से हराया।यहीं से जसवंतनगर और मुलायम सिंह यादव का रिश्ता मजबूत होता चला गया।
हालांकि 1969 में मुलायम सिंह यादव को कांग्रेस के बिशंभर सिंह यादव के हाथों हार का सामना करना पड़ा, लेकिन यह हार उनके राजनीतिक सफर को रोक नहीं सकी। 1974 में भारतीय क्रांति दल के टिकट पर उन्होंने वापसी की और बिशंभर सिंह यादव को 14,258 वोटों से हराया।
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977: आपातकाल के बाद जसवंतनगर सीट पर फिर मुलायम सिंह का कब्जा
1977 का चुनाव देश की राजनीति में आपातकाल के बाद आए बड़े बदलाव का चुनाव था। उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और जनता पार्टी का दौर शुरू हुआ। जसवंतनगर में मुलायम सिंह यादव ने जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और निर्दलीय उम्मीदवार गोरे लाल शाक्य को 26,462 वोटों के भारी अंतर से हरा दिया।
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977: आपातकाल के बाद जसवंतनगर सीट पर फिर मुलायम सिंह का कब्जा
1977 का चुनाव देश की राजनीति में आपातकाल के बाद आए बड़े बदलाव का चुनाव था। उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और जनता पार्टी का दौर शुरू हुआ। जसवंतनगर में मुलायम सिंह यादव ने जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और निर्दलीय उम्मीदवार गोरे लाल शाक्य को 26,462 वोटों के भारी अंतर से हरा दिया।
इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
मुलायम सिंह यादव का पूरा परिवार
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
1980: कांग्रेस की हुई वापसी
1980 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के साथ जसवंतनगर में एक बार फिर समीकरण बदला। इस बार कांग्रेस (आई) के बलराम सिंह यादव ने मुलायम सिंह यादव को 7,611 वोटों से हरा दिया।
1985: मुलायम सिंह की वापसी
1985 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने लोकदल के टिकट पर कांग्रेस के शिवराज सिंह यादव को 25,474 वोटों से हराया। इसके बाद 1989 में उन्होंने जनता दल के उम्मीदवार के तौर पर कांग्रेस के दर्शन सिंह को 26,437 वोटों से मात दी। वहीं 1991 में जनता पार्टी के टिकट पर उन्होंने फिर दर्शन सिंह को हराया।
इस चुनाव के बाद राजनीतिक मतभेदों और उथल-पुथल के बाद उन्होंने 4 अक्टूबर 1992 को नई राजनीतिक राह चुनते हुए 'समाजवादी पार्टी ' का गठन किया। इसके बाद 1993 के विधानसभा चुनाव में वे एक बार फिर अपनी नई समाजवादी पार्टी के टिकट पर जसवंतनगर सीट से चुनावी मैदान में उतरे और शानदार जीत दर्ज कर विधायक बने। इस तरह 1967 के बाद अलग-अलग राजनीतिक दलों के टिकट पर मुलायम सिंह यादव ने जसवंतनगर में अपना मजबूत आधार तैयार कर लिया था।
1980 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के साथ जसवंतनगर में एक बार फिर समीकरण बदला। इस बार कांग्रेस (आई) के बलराम सिंह यादव ने मुलायम सिंह यादव को 7,611 वोटों से हरा दिया।
1985: मुलायम सिंह की वापसी
1985 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने लोकदल के टिकट पर कांग्रेस के शिवराज सिंह यादव को 25,474 वोटों से हराया। इसके बाद 1989 में उन्होंने जनता दल के उम्मीदवार के तौर पर कांग्रेस के दर्शन सिंह को 26,437 वोटों से मात दी। वहीं 1991 में जनता पार्टी के टिकट पर उन्होंने फिर दर्शन सिंह को हराया।
इस चुनाव के बाद राजनीतिक मतभेदों और उथल-पुथल के बाद उन्होंने 4 अक्टूबर 1992 को नई राजनीतिक राह चुनते हुए 'समाजवादी पार्टी ' का गठन किया। इसके बाद 1993 के विधानसभा चुनाव में वे एक बार फिर अपनी नई समाजवादी पार्टी के टिकट पर जसवंतनगर सीट से चुनावी मैदान में उतरे और शानदार जीत दर्ज कर विधायक बने। इस तरह 1967 के बाद अलग-अलग राजनीतिक दलों के टिकट पर मुलायम सिंह यादव ने जसवंतनगर में अपना मजबूत आधार तैयार कर लिया था।
1996: जसवंतनगर सीट पर शिवपाल सिंह यादव की हुई एंट्री
1996 का विधानसभा चुनाव जसवंतनगर की राजनीति में एक और बड़ा मोड़ लेकर आया। इस बार मुलायम सिंह यादव की जगह उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव मैदान में उतरे। समाजवादी पार्टी के टिकट पर शिवपाल सिंह यादव ने कांग्रेस के दर्शन सिंह यादव को 10,939 वोटों से हराया।
यहीं से जसवंतनगर में मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव के हाथों में आ गई।
इसके बाद शिवपाल सिंह यादव ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2002 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बसपा के रमेश चंद्र शाक्य को 52,989 वोटों के भारी अंतर से हराया। वहीं 2007 में उन्होंने बसपा के बाबा हरनारायण यादव को 30,807 वोटों से मात दी।
1996 का विधानसभा चुनाव जसवंतनगर की राजनीति में एक और बड़ा मोड़ लेकर आया। इस बार मुलायम सिंह यादव की जगह उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव मैदान में उतरे। समाजवादी पार्टी के टिकट पर शिवपाल सिंह यादव ने कांग्रेस के दर्शन सिंह यादव को 10,939 वोटों से हराया।
यहीं से जसवंतनगर में मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव के हाथों में आ गई।
इसके बाद शिवपाल सिंह यादव ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2002 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बसपा के रमेश चंद्र शाक्य को 52,989 वोटों के भारी अंतर से हराया। वहीं 2007 में उन्होंने बसपा के बाबा हरनारायण यादव को 30,807 वोटों से मात दी।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
2012 का चुनाव
इस विधानसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव ने जसवंतनगर में अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की। उन्होंने बसपा के मनीष यादव पतराय को 81,084 वोटों के भारी अंतर से हराया। चुनाव में शिवपाल को 1,33,563 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 52,479 वोट मिले।
2017 में भी सपा की ओर से शिवपाल सिंह यादव ने भाजपा के मनीष यादव पत्रे को 52,616 वोटों से हराकर सीट अपने पास बरकरार रखी।
2022 में भी कायम रहा परिवार का दबदबा
2022 के विधानसभा चुनाव में भी जसवंतनगर की तस्वीर नहीं बदली। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार शिवपाल सिंह यादव ने भाजपा के विवेक शाक्य को 90,979 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में शिवपाल सिंह यादव को 1,59,718 वोट मिले, जबकि विवेक शाक्य को 68,739 वोट हासिल हुए। जसवंतनगर विधानसभा सीट पर शिवपाल सिंह यादव की यह लगातार छठवीं जीत थी।
इस विधानसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव ने जसवंतनगर में अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की। उन्होंने बसपा के मनीष यादव पतराय को 81,084 वोटों के भारी अंतर से हराया। चुनाव में शिवपाल को 1,33,563 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 52,479 वोट मिले।
2017 में भी सपा की ओर से शिवपाल सिंह यादव ने भाजपा के मनीष यादव पत्रे को 52,616 वोटों से हराकर सीट अपने पास बरकरार रखी।
2022 में भी कायम रहा परिवार का दबदबा
2022 के विधानसभा चुनाव में भी जसवंतनगर की तस्वीर नहीं बदली। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार शिवपाल सिंह यादव ने भाजपा के विवेक शाक्य को 90,979 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में शिवपाल सिंह यादव को 1,59,718 वोट मिले, जबकि विवेक शाक्य को 68,739 वोट हासिल हुए। जसवंतनगर विधानसभा सीट पर शिवपाल सिंह यादव की यह लगातार छठवीं जीत थी।