{"_id":"663180f19b9012c411080323","slug":"ground-report-sister-in-law-and-sister-in-law-will-test-the-power-of-pawar-in-baramati-seat-2024-05-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Ground Report: बारामती में पवारों की ताकत परखेंगी ननद-भौजाई; सुप्रिया के पास अनुभव, सुनेत्रा को पति पर भरोसा","category":{"title":"Lok Sabha","title_hn":"लोकसभा","slug":"lok-sabha"}}
Ground Report: बारामती में पवारों की ताकत परखेंगी ननद-भौजाई; सुप्रिया के पास अनुभव, सुनेत्रा को पति पर भरोसा
Wed, 01 May 2024 05:08 AM IST
निर्मल कांत
विजय गुप्ता, बारामती (महाराष्ट्र)
विजय गुप्ता, बारामती (महाराष्ट्र)
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 01 May 2024 05:08 AM IST
सार
सुनेत्रा के पीछे महायुति की ताकत है, तो सुप्रिया सुले के पीछे महाआघाड़ी की, लेकिन जीत का गणित इस बात पर निर्भर करता है कि बारामतीकर किस पवार के साथ जाते हैं।
विज्ञापन
सुनेत्रा पवार और सुप्रिया सुले (फाइल)
- फोटो : एएनआई
विस्तार
महाराष्ट्र में सबसे बड़ा मुकाबला बारामती में है। गन्ने व अंगूर की मिठास वाले बारामती की सियासी फिजा में इस बार जैसी कड़वाहट कभी नहीं रही। दोफाड़ हुई राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों मुखिया शरद पवार और भतीजे अजीत पवार ही नहीं, उनकी पार्टियों का भविष्य भी इस सीट का नतीजा तय करेगा। इस मुकाबले पर पूरे देश की नजर है।
विज्ञापन
पश्चिम महाराष्ट्र के इस गढ़ पर 40 साल से कब्जा जमाए बैठे पवार परिवार के दो धड़े इस बार एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) में फूट के कारण बंटी हुई ताकतों के साथ अस्तित्व की जंग लड़ी जा रही है। शरद पवार की राकांपा से उनकी बेटी सुप्रिया सुले चौथी बार मैदान में हैं। उन्हें चुनौती दे रही हैं शरद के भतीजे अजीत पवार की राकांपा से उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार। यह सिर्फ ननद-भौजाई की लड़ाई भर नहीं है, बल्कि चाचा-भतीजे की प्रतिष्ठा की भी परीक्षा है। बारामती दोनों पवारों ही नहीं, उनकी पार्टियों का भी भविष्य तय करेगा।
विज्ञापन
सुनेत्रा के पीछे महायुति की ताकत है, तो सुप्रिया सुले के पीछे महाआघाड़ी की, लेकिन जीत का गणित इस बात पर निर्भर करता है कि बारामतीकर किस पवार के साथ जाते हैं। इंदापुर विधानसभा क्षेत्र के जंक्शन गांव के सेवा ध्यान मंदिर में करीब सौ लोगों की सभा को सुनेत्रा संबोधित करती हैं, तो वृद्ध पिटके दादा कहते हैं-आपने जो भी निर्णय किया, अच्छा किया। वहीं, इंदापुर के एक रेस्टोरेंट में बैठे एक सरकारी सेवक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, हम भी अजीत दादा के ही लोग हैं, लेकिन दिल पवार साब (शरद) के साथ है। इस उम्र में उनके साथ ठीक नहीं हुआ...! वहीं पानी की समस्या से जूझते बारामती के मोरगांव के किसान पोपटराव कहते हैं-हर चुनाव में सहानुभूति नहीं होती। हर बार कहते रहे कि मैं पंत प्रधान (प्रधानमंत्री) बन जाऊंगा।
विज्ञापन
यह सहानुभूति ही शरद के पलड़े का वजन तय करेगी। अजीत की चुनौती कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 84 साल के शरद पवार को बहू को हराने और बेटी को जिताने के लिए छोटी-छोटी सभाएं करनी पड़ रही हैं। लोग बताते हैं कि करीब बीस वर्षों से वह हर चुनाव में केवल एक बड़ी जनसभा करते थे। शरद पहली बार 1984 में बारामती से चुने गए थे। फिर 1991 में अजीत को सांसद बनने का मौका मिला, मगर राजनीतिक घटनाओं के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। फिर शरद ने 2009 तक और उसके बाद सुप्रिया इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।
परिवार में यह तय हुआ था कि शरद व सुप्रिया केंद्र की राजनीति करेंगी और अजीत बारामती संभालेंगे। वह यहां से विधायक चुने जाते रहे और परिवार की पावर को बढ़ाते रहे। जनसंपर्क भी ज्यादा उन्हीं से था और इलाके के काम भी वही करवाते रहे। यह पवारों की ताकत ही थी कि र 2019 में अमित शाह ने यहां रैली कर सुप्रिया को हराने की अपील की, लेकिन भाजपा हरा नहीं पाई। इससे अजीत और मजबूत होकर उभरे। अब अजीत भाजपा व शिवसेना के साथ महायुति में हैं। पीएम मोदी उनके लिए रैली कर चुके हैं। जाहिर है कि यह चुनाव एनडीए के लिए भी साख का सवाल बन चुका है।
बेटी के लिए खुद मैदान में उतरे शरद पवार
सुप्रिया का चुनाव प्रबंधन अजीत ही करते थे। सुप्रिया का जनसंपर्क भी ठीक था, लेकिन लोगों से ज्यादा घुले-मिले अजीत ही रहे हैं। शरद का हाथ होने से अजीत ने कई लोगों की नाराजगी भी मोल ली और वे लोग राकांपा से दूर हुए। अब शरद खुद मैदान में उतरकर उन लोगों को साथ जोड़ रहे हैं। साहित्य, कला, संस्कृति व बुद्धिजीवी वर्ग और संस्थाओं से शरद का जुड़ाव सुप्रिया के काम आ रहा है।
सुप्रिया तीन बार की सांसद हैं। खड़कवासला के खानगांव में कृष्ण मंदिर में हुई सभा में लोग सुप्रिया से शिकायत करते हैं कि पानी, सड़क व बस की समस्या है, तो वह आश्वासन देती हैं कि चुनकर आने पर सबसे पहले यही समस्या हल करेंगी। उनकी सभा में विकास की बात ही हो रही है। सुप्रिया को प्रकाश आंबेडकर के वंचित विकास अघाड़ी (वीबीए) का भी समर्थन है।
अजीत का जनसंपर्क और कैडर सुनेत्रा की ताकत
सुनेत्रा को सियासी पारी की शुरुआत हाई वोल्टेज चुनाव से करनी पड़ रही है। अजीत का खड़ा किया कैडर और मजबूत जनसंपर्क ही उनकी ताकत है। बूथ मैनेजमेंट, ग्राउंड वर्किंग में अजीत माहिर हैं। सुनेत्रा अपनी सभाओं में मोदी के हाथ मजबूत करने के लिए वोट मांगती हैं। साथ ही कहती हैं कि दादा (अजीत) के काम पर विश्वास करें।
सुनेत्रा के चुनाव एजेंट किरण गुजर कहते हैं कि अजीत ने वित्त मंत्री रहते इलाके के लिए बहुत कुछ किया है। दावा करते हैं कि 18 से 20% समर्थकों की सहानुभूति ही पवार के साथ है। वे भी ज्यादा बुजुर्ग और किसान हैं, जिनके बच्चे व अन्य सदस्य हमारे साथ हैं। पिछली बार राकांपा एक ही थी, तो भाजपा को पांच लाख वोट पड़े थे। इस बार राकांपा का वोट तो बंटेगा, लेकिन भाजपा के वह सभी वोट तो हमें ही आएंगे।
धनगर निर्णायक
बारामती संसदीय सीट के में छह में से चार विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा व राकांपा (अजीत) के विधायक हैं। कांग्रेस के केवल दो, जो सुप्रिया के साथ हैं या नहीं, कहा नहीं जा सकता। धनगर समाज यहां निर्णायक हैं जिनके दो बड़े नेता महादेव जानकर और दत्तात्रेय भरणे उनके साथ हैं। पिछले चुनाव में महादेव जानकर सुप्रिया के सामने थे और केवल 70 हजार वोटों से हारे थे।
पिछले दो चुनावों का हाल
2019
उम्मीदवार पार्टी मत%
सुप्रिया राकांपा 52.63
कंचन राहुल भाजपा 40.69
नवनाथ पडलकर वीबीए 3.38
2014
सुप्रिया सुले राकांपा 58.88
महादेव जनकर रासप 42.35
सुरेश खोपडे आप 2.47
पार्टी-चुनाव चिह्न छिन गया...हमें आदत हो गई अन्याय सहने की : सुप्रिया
चुनाव में किस तरह की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है? पहले तो अजीत पवार आपका चुनाव मैनेज करते थे?
चुनौती नहीं, जो हो चुका, उसे स्वीकार करना पड़ेगा और आगे बढ़ना होगा। जब जिम्मेदारी बढ़ती है, तो सब आ जाता है। किसी को आप पानी में फेंक दें तो उसे तैरना तो सीखना ही पड़ेगा न।
शरद पवार ने राकांपा को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलवाया। टूट के बाद अब फिर यह राज्य की पार्टी बनकर रह गई।
अचानक कुछ नहीं हुआ। सब दुनिया जानती है कि क्या हुआ। हमारी पार्टी छिन गई, चुनाव चिह्न छिन गया। हमको तो अन्याय की आदत हो गई है। लेकिन, हम लड़ते रहेंगे, रोते नहीं रहेंगे। कभी-कभी जिंदगी में संघर्ष करना पड़ता है। सबकी जिंदगी में आता है। अभी हमारी बारी है। पार्टी को फिर से दर्जा दिलाने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। मेहनत में हम लोग कम नहीं पड़ेंगे।
राकांपा के कार्यकर्ता असमंजस में हैं, किस पवार के साथ जाएं?
यह तो कार्यकर्ताओं से ही पूछना पड़ेगा। हमारे कार्यकर्ता हमारे साथ हैं। यह अजीत का तो इलेक्शन ही नहीं है। न शरद पवार जी खुद लड़ रहे हैं, न अजीत। यह देश का चुनाव है। इस देश में बारामती की आवाज बनकर कौन वहां खड़ा होकर रहने वाला है, यह मायने रखता है।
कहा जा रहा है कि केंद्र की राजनीति में जाने के कारण यहां जनता से अजीत ही जुड़े रहे। आप डिसकनेक्ट ही रहीं।
ऐसा कैसे संभव है। यह ठीक है कि हमारा चुनाव ही केंद्र के लिए हुआ है, तो हमें वहीं की राजनीति देखनी थी। वो तो 18 साल से मंत्री रहे हैं। उनको तो यहां देखना ही था। ऐसा नहीं है कि हम केंद्र में थे तो डिस्कनेक्ट रहे। गांव-गांव तक गए हैं। केंद्र की योजनाएं गांवों तक पहुंचाई हैं।