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ग्राउंड रिपोर्ट: आरा में लगातार तीन बार कोई नहीं जीता, भाजपा के आरके सिंह के सामने मिथक तोड़ने की बड़ी चुनौती
सार
Ground Report: नौकरशाह रहे आरके सिंह इस सीट से 2014 और 2019 में जीत चुके हैं। अगर वे इस बार भी जीतते हैं, तो यह कमाल करने वाले पहले सांसद होंगे। 1975 बैच के आईएएस अफसर रहे आरके सिंह केंद्र सरकार में गृह सचिव रहे हैं।
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आरके सिंह, सुदामा प्रसाद
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
नक्सली संगठनों और भूमि सेनाओं के खूनखराबे के दौर से यह क्षेत्र भले ही आगे बढ़ गया हो, पर उस दौर के निशान आज भी देखे जा सकते हैं। आरा को भोजपुर का हृदय कहा जाता है। पटना के नजदीक होने के नाते स्थानीय निवासियों की उम्मीदें भी बड़ी हैं। ...पर धूल भरे इस शहर का अतीत जितना शानदार रहा है, वर्तमान वैसा नहीं दिखता। हां, इतना जरूर है कि लोगों को लगता है कि भाजपा उनकी जिंदगी को बेहतर बना सकती है। दो बार के सांसद और मौजूदा भाजपा प्रत्याशी आरके सिंह इस चुनौती पर कितना खरा उतरेंगे, यह तो 4 जून को नतीजों के वक्त ही पता चलेगा, लेकिन जैसा यह शहर है, वैसा ही खांटी मुकाबला भी दिखता है। युवाओं में दिल्ली और मुंबई जैसी जीवनशैली के मंसूबे हैं, तो कोइलवर पुल के सिक्स लेन जैसी और सड़कें भी चाहिए। वहीं भाकपा-माले उस समाज की बात करता है, जिसकी जिंदगी आज भी खेती और मजदूरी में खप रही है। पार्टी प्रत्याशी सुदामा प्रसाद इस अंतर की तरफ इशारा भी करते हैं। महागठबंधन से भाकपा-माले को तीन सीटें मिली थीं, आरा उसमें से एक है।
भाजपा प्रत्याशी को साफ सुथरी छवि का फायदा
नौकरशाह रहे आरके सिंह इस सीट से 2014 और 2019 में जीत चुके हैं। अगर वे इस बार भी जीतते हैं, तो यह कमाल करने वाले पहले सांसद होंगे। 1975 बैच के आईएएस अफसर रहे आरके सिंह केंद्र सरकार में गृह सचिव रहे हैं। सांसद बनने के बाद वे केंद्र सरकार में बिजली राज्य मंत्री रहे। 2021 में उनके बेहतर काम को देखते हुए कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 80 के दशक में वे पटना और पूर्वी चंपारण के डीएम रहे। सुपौल के मूल निवासी सिंह को 1990 में लालू सरकार ने विशेष अधिकार देकर अपर मजिस्ट्रेट के तौर पर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करने के लिए समस्तीपुर भेजा था। आडवाणी तब रथयात्रा निकाल रहे थे।
गरीब, मजदूर और सुदामा प्रसाद
भाकपा माले का आफिस आरा शहर में घुसते ही दिखता है। वहां मौजूद जिला सचिव जवाहर सिंह कहते हैं हम इस बार मजबूत स्थिति में हैं। आरके सिंह तो अफसर आदमी हैं, वे भला आम आदमी की बात कहां सुनने वाले हैं। किसी मजदूर का घर उजड़ जाए या पुलिस उसकी दुकान गिरा दे तो हम लोग ही मदद को जाते हैं, सुदामा हमारे प्रत्याशी और जनता के आदमी हैं। सुदामा 1997 से भोजपुर में सक्रिय हैं, उच्च जाति के जमींदार की हत्या का उन पर केस चला था, पर वे सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए। 2015 में तरारी विधानसभा क्षेत्र से भाकपा-माले के टिकट पर विधायक बने।
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धुर वामपंथियों का गढ़...अरण्य से बना आरा
आरा संस्कृत के शब्द अरण्य का अपभ्रंश है, जिसका मतलब है जंगल। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी वीर कुंवर सिंह की बलिदान धरती यही है। इस सीट से सात विधानसभा क्षेत्र जुड़े हैं। 1977 में शाहबाद सीट का नाम बदलकर आरा किया गया। 1977 और 80 में जनता पार्टी और फिर लोकदल से चंद्रदेव यादव जीते। 84 में कांग्रेस से बलिराम भगत जीते। 1989 में धुर वामपंथियों के राजनीतिक संगठन इंडियन पीपुल्स फ्रंट के रामेश्वर प्रसाद ने कब्जा जमाया। 91 में जनता दल से रामलखन सिंह यादव जीते। 96 में जनता दल से चंद्रदेव प्रसाद वर्मा जीते व 98 में समता पार्टी से हरिद्वार प्रसाद जीते। 99 में राजद से राम प्रसाद तो 2004 में राजद से कांति सिंह जीतीं। 2009 में जद से मीना सिंह जीतीं। इसके बाद से दो बार यह सीट भाजपा के आरके सिंह ने जीती।
क्या हैं जातीय समीकरण: आरके सिंह को राजपूतों का पूरा समर्थन मिलता है। वे भले सुपौल से हों, पर उनकी पत्नी यहीं की हैं। उनकी बेटी की शादी यहां हुई है। सीधे-सीधे कहें तो इस सीट पर लड़ाई अगड़ों और पिछड़ों की है। सिंह के पक्ष में एक बात जाती है कि जद-यू के वोट भी उन्हें मिलेंगे। यहां 60 फीसदी अगड़े और 35 फीसदी पिछड़े हैं। लगभग तीन लाख राजपूत और साढ़े तीन लाख यादव मतदाता हैं। सवा लाख मुस्लिम और एक लाख भूमिहार मतदाता हैं। यही निर्णायक साबित होते हैं।
मुद्दे और मतदाता कवन बात का डर बा
आरा शहर पहली बार देखने में ऐसा लगता है, जैसे कूड़े के ढेर पर बसा हो। यहां एक कहावत है, आरा जिला घर बा, तब कवन बात का डर बा। लगता है यहां के लोगों को कूड़े से भी डर नहीं लगता है, लेकिन लोगों को उम्मीद भी है, वे कहते हैं पहले तो यहां कुछ भी नहीं था। पटना से आरा जाते हुए कोइलवर पुल को पार करते ही ट्रकों की लाइन दिखने लगती है। यहां से छपरा केवल 32 किमी है, पर पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। वजह है गंगा नदी के बालू से भरे ट्रक। इन ट्रकों की रेलपेल की वजह से यहां भारी जाम लगता है। इससे शहर के लोगों को रोज जूझना पड़ता है। रेलवे स्टेशन के पास सैलून के पास खड़े प्रशांत सिंह कहते हैं, आरके सिंह ने यहां बड़ा काम कराया। उनकी स्थिति मजबूत है। रमना मैदान ऐसे ही पड़ा था, उनके प्रयासों से ही इसका सुंदरीकरण हुआ। वहां मौजूद युवा अनुज सिंह कहते हैं, आज हम पटना एक घंटे में पहुंच जाते हैं, पहले चार घंटे लग जाते थे। आरके सिंह के प्रयासों से यह सिक्स लेन हुआ। उन्होंने ही यहां वाशिंग पिट बनवाया। बिक्रमगंज जाते हुए पीरो में दीपक स्वीट पर मौजूद रविंद्र प्रधान कहते हैं, काम तो आरके सिंह का अच्छा है। फिर मोदी ने बहुत काम किया है, माले वाले मुकाबला नहीं कर पाएंगे। लेकिन युवाओं में नौकरी न मिलने से निराशा भी है, यही भाजपा के लिए परेशानी हो सकती है।
पिछले दो चुनाव के नतीजे
2019
उम्मीदवार दल मत%
आरके सिंह भाजपा 52.33
राजू यादव माले 38.73
2014
आरके सिंह भाजपा 43.78
श्रीभगवान सिंह राजद 28.57
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भाजपा प्रत्याशी को साफ सुथरी छवि का फायदा
नौकरशाह रहे आरके सिंह इस सीट से 2014 और 2019 में जीत चुके हैं। अगर वे इस बार भी जीतते हैं, तो यह कमाल करने वाले पहले सांसद होंगे। 1975 बैच के आईएएस अफसर रहे आरके सिंह केंद्र सरकार में गृह सचिव रहे हैं। सांसद बनने के बाद वे केंद्र सरकार में बिजली राज्य मंत्री रहे। 2021 में उनके बेहतर काम को देखते हुए कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 80 के दशक में वे पटना और पूर्वी चंपारण के डीएम रहे। सुपौल के मूल निवासी सिंह को 1990 में लालू सरकार ने विशेष अधिकार देकर अपर मजिस्ट्रेट के तौर पर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करने के लिए समस्तीपुर भेजा था। आडवाणी तब रथयात्रा निकाल रहे थे।
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गरीब, मजदूर और सुदामा प्रसाद
भाकपा माले का आफिस आरा शहर में घुसते ही दिखता है। वहां मौजूद जिला सचिव जवाहर सिंह कहते हैं हम इस बार मजबूत स्थिति में हैं। आरके सिंह तो अफसर आदमी हैं, वे भला आम आदमी की बात कहां सुनने वाले हैं। किसी मजदूर का घर उजड़ जाए या पुलिस उसकी दुकान गिरा दे तो हम लोग ही मदद को जाते हैं, सुदामा हमारे प्रत्याशी और जनता के आदमी हैं। सुदामा 1997 से भोजपुर में सक्रिय हैं, उच्च जाति के जमींदार की हत्या का उन पर केस चला था, पर वे सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए। 2015 में तरारी विधानसभा क्षेत्र से भाकपा-माले के टिकट पर विधायक बने।
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धुर वामपंथियों का गढ़...अरण्य से बना आरा
आरा संस्कृत के शब्द अरण्य का अपभ्रंश है, जिसका मतलब है जंगल। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी वीर कुंवर सिंह की बलिदान धरती यही है। इस सीट से सात विधानसभा क्षेत्र जुड़े हैं। 1977 में शाहबाद सीट का नाम बदलकर आरा किया गया। 1977 और 80 में जनता पार्टी और फिर लोकदल से चंद्रदेव यादव जीते। 84 में कांग्रेस से बलिराम भगत जीते। 1989 में धुर वामपंथियों के राजनीतिक संगठन इंडियन पीपुल्स फ्रंट के रामेश्वर प्रसाद ने कब्जा जमाया। 91 में जनता दल से रामलखन सिंह यादव जीते। 96 में जनता दल से चंद्रदेव प्रसाद वर्मा जीते व 98 में समता पार्टी से हरिद्वार प्रसाद जीते। 99 में राजद से राम प्रसाद तो 2004 में राजद से कांति सिंह जीतीं। 2009 में जद से मीना सिंह जीतीं। इसके बाद से दो बार यह सीट भाजपा के आरके सिंह ने जीती।
क्या हैं जातीय समीकरण: आरके सिंह को राजपूतों का पूरा समर्थन मिलता है। वे भले सुपौल से हों, पर उनकी पत्नी यहीं की हैं। उनकी बेटी की शादी यहां हुई है। सीधे-सीधे कहें तो इस सीट पर लड़ाई अगड़ों और पिछड़ों की है। सिंह के पक्ष में एक बात जाती है कि जद-यू के वोट भी उन्हें मिलेंगे। यहां 60 फीसदी अगड़े और 35 फीसदी पिछड़े हैं। लगभग तीन लाख राजपूत और साढ़े तीन लाख यादव मतदाता हैं। सवा लाख मुस्लिम और एक लाख भूमिहार मतदाता हैं। यही निर्णायक साबित होते हैं।
मुद्दे और मतदाता कवन बात का डर बा
आरा शहर पहली बार देखने में ऐसा लगता है, जैसे कूड़े के ढेर पर बसा हो। यहां एक कहावत है, आरा जिला घर बा, तब कवन बात का डर बा। लगता है यहां के लोगों को कूड़े से भी डर नहीं लगता है, लेकिन लोगों को उम्मीद भी है, वे कहते हैं पहले तो यहां कुछ भी नहीं था। पटना से आरा जाते हुए कोइलवर पुल को पार करते ही ट्रकों की लाइन दिखने लगती है। यहां से छपरा केवल 32 किमी है, पर पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। वजह है गंगा नदी के बालू से भरे ट्रक। इन ट्रकों की रेलपेल की वजह से यहां भारी जाम लगता है। इससे शहर के लोगों को रोज जूझना पड़ता है। रेलवे स्टेशन के पास सैलून के पास खड़े प्रशांत सिंह कहते हैं, आरके सिंह ने यहां बड़ा काम कराया। उनकी स्थिति मजबूत है। रमना मैदान ऐसे ही पड़ा था, उनके प्रयासों से ही इसका सुंदरीकरण हुआ। वहां मौजूद युवा अनुज सिंह कहते हैं, आज हम पटना एक घंटे में पहुंच जाते हैं, पहले चार घंटे लग जाते थे। आरके सिंह के प्रयासों से यह सिक्स लेन हुआ। उन्होंने ही यहां वाशिंग पिट बनवाया। बिक्रमगंज जाते हुए पीरो में दीपक स्वीट पर मौजूद रविंद्र प्रधान कहते हैं, काम तो आरके सिंह का अच्छा है। फिर मोदी ने बहुत काम किया है, माले वाले मुकाबला नहीं कर पाएंगे। लेकिन युवाओं में नौकरी न मिलने से निराशा भी है, यही भाजपा के लिए परेशानी हो सकती है।
पिछले दो चुनाव के नतीजे
2019
उम्मीदवार दल मत%
आरके सिंह भाजपा 52.33
राजू यादव माले 38.73
2014
आरके सिंह भाजपा 43.78
श्रीभगवान सिंह राजद 28.57