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Ground Report: भुवनेश्वर में अपराजिता के खिलाफ BJD की बिसात, कटक में सियासी दलों की उठापटक के बीच उलझे मतदाता

Fri, 24 May 2024 05:28 AM IST
निर्मल कांत अनूप वाजपेयी, भुवनेश्वर (ओडिशा)
अनूप वाजपेयी, भुवनेश्वर (ओडिशा) Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 24 May 2024 05:28 AM IST
सार

Ground Report: गढ़ बचाने के लिए भाजपा नाराज नेताओं को साधने में जुटी, भुवनेश्वर में बीजद ने कांग्रेस के छह बार विधायक रहे सुरेश राउतराय के बेटे मन्मथ को बनाया उम्मीदवार, कांग्रेस ने युवा मुस्लिम चेहरे यासिर नवाज को उतारकर मुकाबले को बनाया दिलचस्प। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर और औद्योगिक नगरी कटक में मतदाताओं की उलझनों के साथ सियासी समीकरण और माहौल समझा रहे हैं अनूप वाजपेयी...

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Ground Report: BJD against Aparajita in Bhubaneswar, voters confused between political parties in Cuttack
अपराजिता सारंगी, मन्मथ राउतराय, भर्तृहरि महताब और संतृत्प मिश्रा (फाइल) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भुवनेश्वर संसदीय सीट पर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। मौसम में आई गर्मी से कहीं ज्यादा चुनावी गर्मी दिख रही है। राज्य में भाजपा की मौजूदा सांसद और पूर्व आईएएस अधिकारी अपराजिता सारंगी को हराने के लिए बीजू जनता दल कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। ओडिशा में सत्ताधारी बीजद के लिए पुरी सबसे कम दस हजार वोट से जीतने और भुवनेश्वर सबसे कम 24 हजार वोटों से हारने वाली सीट रही है। भुवनेश्वर, कटक और पुरी की पहचान बीजद के गढ़ के रूप में होती रही है, लेकिन 2019 में भुवनेश्वर सीट से बीजद उम्मीदवार पूर्व आईपीएस अधिकारी अरुप पटनायक हार गए। बरगढ़ के बाद भुवनेश्वर ऐसी सीट है, जहां सांसद भाजपा का है, लेकिन यहां की सात में से एक भी विधानसभा सीट उसके पास नहीं है। बीजद ने इसे ही ध्यान में रखकर कांग्रेस से छह बार विधायक रहे सुरेश राउतराय के बेटे मन्मथ राउतराय को उम्मीदवार बनाया है। मन्मथ ने पायलट की नौकरी छोड़कर सीधे चुनावी मैदान में लैंड किया है।

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वहीं, मौजूदा सांसद और भाजपा उम्मीदवार अपराजिता का भुवनेश्वर से पुराना नाता रहा है। एक कुशल प्रशासक के तौर पर जनता में उनकी अच्छी पहचान है। हालांकि, इस बार भाजपा के ही कुछ नेता खुलकर उनका विरोध कर रहे हैं। भुवनेश्वर लोकसभा क्षेत्र में आने वाली विधानसभाओं में उतारे गए कुछ उम्मीदवारों को लेकर पार्टी में अपराजिता के खिलाफ नाराजगी सार्वजनिक तौर पर दिख रही है। टिकट बंटवारे को लेकर उनसे नाराज खुर्दा विधायक निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। बीजद भाजपा के नाराज नेताओं को अपने पक्ष में करने के लिए उनसे लगातार संपर्क साध रहा है।
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कांग्रेस से बीजद परेशान
बीजद ने रणनीति के तहत जाटनी के कांग्रेस विधायक के बेटे मन्मथ को प्रत्याशी बनाया, ताकि कांग्रेस का वोट बैंक उसके साथ जुड़ जाए। हालांकि, इससे बीजद के कुछ नेता नाराज हैं। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में यह सीट सीपीएम को सौंप दी थी, लेकिन इस बार एनएसयूआई के युवा मुस्लिम चेहरा यासिर नवाज को उम्मीदवार बनाया है। इससे बीजद की मुश्किलें बढ़ गई हैं।  
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कांग्रेस जितनी मजबूती से लड़ेगी, बीजद को उतना ही नुकसान और भाजपा को फायदा होगा। मन्मथ के लिए सबसे बड़ी चुनौती पिता के क्षेत्र जाटनी के लोगों को अपने पक्ष में करना होगा, क्योंकि यहां के मतदाता लंबे समय से कांग्रेस उम्मीदवार को चुनते रहे हैं।

भाजपा धीरे-धीरे बढ़ा रही ताकत
1956 में ओडिशा की राजधानी कटक से भुवनेश्वर स्थानांतरित की गई। भुवनेश्वर लोकसभा क्षेत्र का गठन 1962 में हुआ। शुरुआती दौर में कांग्रेस उम्मीदवार लगातार तीन बार संसद पहुंचे। तीन बार सीपीएम उम्मीदवार ने भी जीत दर्ज की। 1998 से बीजद ने यहां से जीत का सिलसिला शुरू किया, जो 2019 में खत्म हुआ। 2019 में बीजद के अरुप मोहन पटनायक भाजपा की अपराजिता सारंगी से हार गए थे। अरुप इस बार पुरी से ताल ठोक रहे हैं। भाजपा ने इस सीट पर धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत की है।

2014 में पार्टी ने दूसरे स्थान पर आकर बीजद को ताकत दिखाई थी, जबकि 2009 में कांग्रेस से भी पीछे थी। 2009 के चुनाव में भाजपा को 94 हजार और कांग्रेस को डेढ़ लाख वोट मिले थे। 2014 में भाजपा को करीब ढाई लाख वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को डेढ़ लाख वोट मिले।

पिछले दो चुनावों का हाल
2019
उम्मीदवार                   दल       मत%
भर्तृहरि महताब           बीजद     49.47
प्रकाश मिश्रा               भाजपा    38.04

2014
उम्मीदवार                     दल       मत%
भर्तृहरि महताब             बीजद     53.65
अपराजिता मोहंती          कांग्रेस    22.3


कटक: बीजद से छह बार सांसद रहे भर्तृहरि इस बार कमल खिलाने उतरे, बीजद ने संतृप्त पर लगाया दांव
संस्कृत भाषा के शब्द कटक के कई अर्थ हैं...सैन्य शिविर, सेना के हाथों संरक्षित स्थान। इसे प्राचीन बाराबती किला भी कहते हैं। वर्तमान चुनावी परिदृश्य में कटक का अर्थ किला सटीक बैठता है, क्योंकि इस लोकसभा सीट को बीजू जनता दल का किला ही माना जाता है। दरअसल, यहां के लोगों ने बीते छह लोकसभा चुनावों में बीजद को वोट देकर भतृहरि महताब को संसद भेजा। इस बार भर्तृहरि भाजपा के उम्मीदवार हैं। भाजपा-बीजद की उठापटक में मतदाता उलझ गए हैं कि सातवीं बार उनका वोट बीजद के पक्ष में जाएगा या मौजूदा सांसद भर्तृहरि के नाम पर पड़ेगा। बीजद ने भर्तृहरि का रथ रोकने के लिए संतृप्त मिश्रा को टिकट दिया है। कांग्रेस ने पूर्व मंत्री सुरेश पहापात्र को मैदान में उतारा है, लेकिन मुकाबला भाजपा-बीजद के बीच ही दिख रहा है।

इस सीट के बीजद का किला बनने की नींव रखी बीजू पटनायक ने। बीजू 1996 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में जीते। 1998 में भर्तृहरि मैदान में उतरे और जीते। फिर 1999, 2004, 2009, 2014 और 2019 में लगातार जीतते रहे। यहां 1962 में पहला चुनाव जीतने वाली कांग्रेस को यहां के मतदाताओं ने मात्र चार बार मौका दिया है। कांग्रेस लंबे समय से कटक में दूसरे नंबर पर रही है, लेकिन 2019 में भाजपा ने यह जगह भी छीन ली। तीन बार इस सीट पर जनता दल के उम्मीदवार भी जीतकर संसद पहुंचे हैं।

इलाका बीजद का, भर्तृहरि से नाराजगी
टिकट कटने की चर्चा होने पर बीजद के वरिष्ठ नेताओं में शुमार रहे भर्तृहरि भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा को लगता है कि भतृहरि के दम पर कटक सीट पर बीजद का दम फुला देंगे, जबकि मतदाताओं का मानना है कि यह इलाका बीजद का है। भर्तृहरि के कामकाज को लेकर लोग नाराज थे, लेकिन बीजद उम्मीदवार होने से लोग उन्हें वोट कर रहे थे। इसलिए भाजपा को उन्हें उतारने से सीधा फायदा नहीं मिलेगा। हालांकि, कटक में भाजपा ने धीरे-धीरे पैठ बनाई है। कटक की सड़कों और घरों पर जहां पहले लोग भाजपा का झंडा लगाने से परहेज करते थे, अब ऐसा नहीं दिखता है। हालांकि, अभी भी दोनों दलों भाजपा-बीजद के झंडे एक साथ लगे हुए दिखते हैं।

धीरे-धीरे भाजपा के पक्ष में हुआ माहौल
कटक में भाजपा के पक्ष में माहौल धीरे-धीरे बदला है। बीते तीन लोकसभा चुनाव के नतीजे देखें, तो 2009 में भाजपा करीब 75 हजार वोट पाकर तीसरे नंबर पर रही। 2014 में भाजपा को करीब डेढ़ लाख वोट मिले, लेकिन कांग्रेस दो लाख से अधिक वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रही।

2019 में भाजपा प्रत्याशी को चार लाख से अधिक वोट मिले, हालांकि बीजद प्रत्याशी सवा पांच लाख वोट पाकर जीतने में सफल रहा। कांग्रेस को करीब 99 हजार वोट मिले। तीन चुनाव में कांग्रेस के गिरते ग्राफ को देखें, तो इस चुनाव में उसका प्रदर्शन ही भाजपा के लिए कटक में द्वार खोलेगा। कटक के शहरी इलाकों के मतदाताओं के बीच भाजपा की मौजूदगी स्पष्ट दिखती है, जबकि ग्रामीण इलाकों में बीजद का ही शंखनाद हो रहा है।

कटक की पहचान औद्योगिक क्षेत्र के रूप में होती है। चांदी का काम होने के कारण सिल्वर सिटी भी कहा जाता है। कटक दो नदियों उत्तर में महानदी व दक्षिण कथाजोड़ी नदी के बीच बसा है। ओडिशा की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला जिला भी है। यहां बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। चावल, दालें, नारियल, गन्ना, हल्दी और जूट कटक की पहचान है।


नए चेहरे पर बड़ा दांव 
कटक के मतदाता बीजद की जमीन पर भाजपा के खाता खोलने को लेकर कई तर्क रखते हैं। उनका कहना है कि भाजपा के लिए सुनहरा मौका था, लेकिन भर्तृहरि को टिकट देकर एंटी इन्कंबेंसी का ठीकरा खुद पर फोड़ लिया है। इस बार भर्तृहरि के चेहरे और भाजपा को पसंद करने वाले मतदाताओं की भी परीक्षा होगी, क्योंकि लोगों का कहना है कि भर्तृहरि से नाराजगी के बाद भी लोग बीजद को वोट दे रहे थे। बीजद ने भर्तृहरि से पीछा छुड़ा लिया और संतृप्त को नए चेहरे के रूप में पेश कर दिया।

 
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