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Darjeeling Ground Report: नेपालियों के दिल में गोरखालैंड है, तो मोदी भी; कांग्रेसी गढ़ में पहले लाल सलाम अब भग
सार
पश्चिम बंगाल के नक्शे में सबसे ऊपर सिक्किम और नेपाल से सटा दार्जिलिंग टी, टूरिज्म, टिंबर इंडस्ट्री के लिए मशहूर है। पहाड़ों की रानी का दर्जा पाए दार्जिंलिंग को गोरखालैंड आंदोलन के कारण अलग राजनीतिक पहचान मिली है। कंचनजंगा की पहाड़ियों के दर्शन कराने वाला यह भूभाग अलग राज्य के आंदोलन के केंद्र में रहा है। सुलगती पहाड़ियां फिलहाल 2017 से शांत हैं। पृथक गोरखालैंड है तो, पर नेपालियों के दिल में। गोरखा वार मेमोरियल के पास मोमो बेचने वाली सुनीता थापा कहती हैं कि वोट गोरखालैंड के नाम पर देंगी, मोदी की जुबान पर भरोसा है। हमें विकास चाहिए लेकिन हमारी पहचान कहीं ज्यादा अहम है।
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लोकसभा चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
साल 1870 का वाकया है। अंग्रेजों के पसंदीदा आरामगाह दार्जिलिंग की पहाड़ियों तक छोटी ट्रेन चलानी थी। ट्रैक बिछाना असंभव-सा हो गया था। तब एक अंग्रेज अफसर फ्रेंकलिन की बीवी ने उसे परदेस से एक लानतनुमा पत्र लिखा-आगे नहीं बढ़ सकते हो तो लौट आओ (इंग्लैंड)। तब ईजाद हुआ एक जुगाड़-जेड रिवर्सल तकनीक। जेड के आकार में ऐसा ट्रैक बनाया गया, जिसमें ट्रेन आगे तो बढ़ती है, कहीं-कहीं कुछ पीछे भी आती है। भाजपा की अलग गोरखालैंड की गाड़ी ऐसे ही जेड ट्रैक पर है। कभी आगे तो कभी पीछे।
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यहां के करीब दो तिहाई नेपालियों की गोरखालैंड राज्य की हसरत गुजरते वक्त के साथ धूमिल पड़ चुकी है, लेकिन चुनाव उम्मीदें जवां कर देता है। हाल में जारी भाजपा के घोषणापत्र में पृथक राज्य या नेपाली जातियों को एसटी के दर्जे पर खामोशी है। यहां के भाजपा विधायक विष्णुप्रसाद शर्मा को ये बेरुखी इस कदर खली कि वे पार्टी छोड़कर भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ मैदान में कूद पड़े।
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हर उम्मीद यूं ही नहीं है। पिछले महीने जलपाईगुड़ी की एक जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोरखालियों को संबोधित करते हुए कहा था कि केंद्र समाधान के करीब है, आपकी आकांक्षाएं पूरी होंगी। साल 2014 के संसदीय चुनाव में भी नरेंद्र मोदी ने गोरखा समुदाय की नब्ज पर हाथ रखते हुए कहा था कि आपके सपने मेरे सपने हैं। मोदी से इस विशालकाय वोटबैंक को उम्मीद है, तभी तो भाजपा यहां हैट्रिक जमा चुकी है। इसके उलट, तथ्य यह भी है कि करीब 30 साल पुरानी इस मांग की राह में मायूसी का हर पड़ाव पूरा होते ही एक नई नेपाली पार्टी जन्म ले लेती है। दार्जिलिंग के साथ ही उत्तर बंगाल के नेपालीभाषी क्षेत्रों को जोड़कर अलग गोरखालैंड बनाने का सपना पीछा नहीं छोड़ रहा। रही चुनाव की बात, तो मौजूदा सांसद राजू बिष्ट को इस बार भी भाजपा ने उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस की ओर से नेपाली बिरादरी के मुनीष तमांग को मैदान में उतारे जाने से लड़ाई रोमांचक और दिलचस्प हो गई है। वे स्थानीय मुद्दों पर लंबे समय से मुखर हैं और क्षेत्र में पृथक गोरखालैंड आंदोलन का मुख्य चेहरा रहे विमल गुरुंग के भी खासमखास रहे हैं। 28 मार्च को तमांग ने दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी की सदस्यता ली थी। भारतीय गोरखा परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुनीष तमांग इलाके में चर्चित नेता हैं और क्षेत्र में भाजपा के सहयोगी के तौर पर जाने जाते थे। उन्होंने पृथक गोरखालैंड और गोरखा समुदाय के मुद्दों को लेकर भाजपा पर वादा खिलाफी का आरोप लगाया है। कांग्रेस में शामिल होते वक्त तमांग का कहना था कि बीते कई सालों से हमारे गोरखा समुदाय ने भाजपा को मौका दिया, लेकिन उसके बदले हमारे समुदाय को सिर्फ धोखा मिला।
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बैनर-पोस्टर से राष्ट्रीय नेता नदारद
जिले में विधानसभा की सात सीटें हैं, तीन पहाड़ में चार मैदानी। पांच सीटों पर भाजपा काबिज है। करीब दो तिहाई आबादी नेपाली है, इसलिए मुख्य बोली भी नेपाली। खानपान में सबसे प्रिय थुकप्पा जिसे सब्जियों के सूप में मांस डालकर पकाते हैं। सिलीगुड़ी से ऊपर को चलें, तो शहर में जगह-जगह बैनर-पोस्टर मिलते हैं, इन पर नेपाली इबारत दर्ज है और तस्वीरों से राष्ट्रीय नेता नदारद। ममता, मोदी, राहुल कहीं नहीं। 43 साल के रामेंद्र गिरि की शिकायत है कि गोरखाली समुदाय की 11 उपजातियों को एसटी का दर्जा वादे के बाद भी नहीं दिया गया। हमारे बच्चों के लिए रोजगार नहीं है, बाहर जाना पड़ता है। अलग राज्य के लिए मुट्ठियां तानने वाले पुराने गोरखाली नेता भी थकने लगे हैं। इस समुदाय पर पकड़ रखने वाली प्रमुख पार्टियां पिछले 15 साल में भाजपा-तृणमूल जैसे बड़े दलों के पीछे खड़ी हो गई हैं। सुभाष घीसिंग के साथ के तीन बड़े चेहरे विनय तामांग, अनित थापा, विमल गुरुंग मैदान में तो हैं, लेकिन बतौर प्रत्याशी नहीं। किसी न किसी बड़े दल के समर्थक के रूप में। पहले तीनों एक साथ थे, अब अलग-अलग। तृणमूल के साथ खड़े थापा कहते है-गोरखालैंड हमारा सपना है, हमारी भावना है, इसे दलों ने चुनावी मुद्दा बना दिया है। हमें क्षेत्र के विकास को प्रमुखता देनी चाहिए। अलग राज्य से अलहदा भाजपा अब इस क्षेत्र के स्थायी राजनीतिक समाधान की बात करने लगी है।
तृणमूल से खिसककर विमल गुरुंग भाजपा के पक्ष में आ गए हैं, इस शर्त के साथ कि भाजपा इस पर अमल करेगी। इस वादे पर भाजपा प्रत्याशी बिस्ट का कहना है कि इसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, अगले पांच साल में लक्ष्य हासिल होगा। गुरुंग की पार्टी के महासचिव रोशन गिरि का कहना है कि यह अलग गोरखालैंड राज्य जैसा ही है। भाजपा के रवैये से आहत नवगठित हमरो पार्टी और प्रजातांत्रिक मोर्चा स्थानीय चुनावों में अपनी ताकत दिखा चुके हैं। इनका कहना है कि साल 2019 में दार्जिलिंग को एसटी स्टेटस का दर्जा देने का भाजपा ने वादा किया, लेकिन आज तक पूरा न हो सका।
भ्रष्टाचार से लेकर राम मंदिर तक की हो रही चर्चा
1986 में सुभाष घीसिंग की अगुवाई में गोरखालैंड आंदोलन शुरू हुआ। कई जानें गईं, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा। एक तितरफा शांति समझौते के साथ खत्म हुआ। एक सीमित स्वायत्तता के साथ गोरखा हिल काउंसिल बनी। लेकिन, तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद 2011 में इसकी जगह गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन गठित किया गया। गुरुंग इसके प्रमुख बने। लेकिन 2013 में असंतुष्ट गुरुंग ने तृणमूल पर गोरखा की पहचानें मिटाने की साजिश का आरोप लगाते हुए फिर आंदोलन शुरू कर दिया। 2017 में यह आंदोलन 104 दिन तक चला। 80 के दशक में खूनखराबे के बाद गोरखा नेताओं ने लोकतांत्रिक रास्ता पकड़ा और अपनी मांग के साथ चुनाव में हिस्सा लेने लगे। कई गोरखा नेता भाजपा के टिकट पर विधायक बनते आ रहे हैं।
यहां का चुनावी नजारा भी अजब-गजब है। सिलीगुड़ी से न्यू जलपाईगुड़ी जाने वाली रोड पर भक्तिनगर के बाजार में एक-एक दुकान पर चार-चार दलों के झंडे लगे थे। जो भी आता, अपना खोंस जाता, दुकानदार भी सर्वदलीय समभाव के अंदाज में दिखते हैं, दिल में चाहे जो हो। यहीं एक चायपानी की छोटी-सी दुकान पर उसके मालिक वयोवृद्ध नंदन बसु मिले। चर्चा शुरू की तो बोले-वो तो हमेशा से लाल झंडे को वोट देते आ रहे हैं, उसी को देंगे, जीते चाहे हारे।
52 साल के संजय गुप्ता सिलीगुड़ी के मुख्य बाजार सेवक रोड पर होटल चलाते हैं। चुनावी माहौल का जिक्र होने पर कहते हैं कि भाजपा राज्य में इस बार 25 सीटें जीतेगी। राम मंदिर बनने से यहां के हिंदू और मारवाड़ी वोट भाजपा को जाएंगे। उत्तर बंगाल या कहें कि पहाड़ी क्षेत्र के इस प्रवेश द्वार में प्रवासी हिंदुओं की खासी आबादी है और मूल बंगाली कम हैं, इसलिए यहां भाजपा का दबदबा दिखता है। पिछले चुनाव में उत्तर बंगाल की आठ में से सात सीटों पर भाजपा जीती थी।
न्यू जलपाई गुड़ी जाने वाली रोड पर एक पान की गुमटी पर 45 साल के सुदीप्त सरकार मिल गए। धुएं के छल्ले उड़ाते बोले, दीदी ने यहां का काफी विकास किया है, लेकिन उनके मंत्रियों के घोटाले से लोग गुस्सा हैं। भ्रष्टाचार मुद्दा है। राम मंदिर बनने से भाजपा का वोट बैंक मजबूत हुआ है। युवा पान दुकानदार शुभोजीत साहा 22 साल के हैं, इस बार पहला वोट डालेंगे। कहते हैं मोदी पसंद है, क्यों पता नहीं। टैक्सी चालक मुजम्मिल (53) की राय यूं हैं-मोदी काम तो कराता है, पर उसकी पार्टी झगड़ा (हिंदू-मुस्लिम) कराता है।
कांग्रेसी गढ़ में पहले लाल सलाम अब भगवा
संसदीय सीट पर 1957 से 67 तक कांग्रेस का कब्जा रहा। 71 से 89 तक वाम दलों ने यहां पर लाल सलामी दी। 1991 में कांग्रेस फिर आई। 1996 से 2004 तक फिर भाकपा (मार्क्सवादी) ने कब्जा जमाया। 2009 में पहली बार कमल खिला। तब से यहां भगवा लहरा रहा है। 2004 में भाजपा का वोट शेयर बस 12.83 फीसदी ही था। 2009 में भाजपा के वोट में जसवंत सिंह ने 38.67 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज कराई।