EVM: जिस ईवीएम पर लग रहा आरोप, उसी से 20 साल पहले जीती थी कांग्रेस, 2004 के आम चुनाव में मिली थी सत्ता
जीत के बाद पार्टी के भीतर विरोध का सामना करते हुए भी सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को यूपीए सरकार के प्रमुख के रूप में चुना। हालांकि, उन्होंने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का नेतृत्व स्वीकार किया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में 2004 का लोकसभा चुनाव पहली बार पूरी तरह से ईवीएम से कराया गया। 14वीं लोकसभा के नतीजों ने न सिर्फ भाजपा, बल्कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को भी हैरान कर दिया। हालांकि, कांग्रेस को भाजपा से केवल सात सीटें अधिक मिलीं, पर यूपीए की संख्या 225 सीटों तक पहुंच गई। इसे बसपा, सपा, केरल कांग्रेस और वाम मोर्चा से बाहरी समर्थन मिला और यूपीए की सरकार बन गई। 20 साल पहले जिस ईवीएम के बूते यूपीए ने सरकार बनाई थी, आज उसी पर आरोप लगा रही है।
इसके नतीजे अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों, चुनाव विशेषज्ञों, लेखकों, इंडिया शाइनिंग अभियान के समर्थकों और इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्टों की अपेक्षाओं के विपरीत थे। इन सभी ने पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को समय पूर्व चुनाव के लिए प्रेरित किया था। राजनीतिक वैज्ञानिक फिलिप ओल्डेनबर्ग ने तर्क दिया कि कांग्रेस इसलिए नहीं जीती कि उसे वोट-स्विंग, सत्ता-विरोधी वोट या इंडिया शाइनिंग से बाहर रह गए ग्रामीण गरीबों के विद्रोह का लाभ मिला था, बल्कि इसलिए जीत गई क्योंकि उसने कई राज्यों में अच्छे गठबंधन बनाए। विशेषज्ञ महेश रंगराजन ने जीत का श्रेय गठबंधन सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे को दिया। चुनाव विशेषज्ञ योगेंद्र यादव के अनुसार, वह डिफॉल्ट जीत थी। एक किस्सा यह भी है कि कई पेंशनभोगी व वरिष्ठ नागरिक डाकघरों और बैंकों में जमा पर ब्याज दरों में भारी गिरावट से नाराज थे।
समानांतर सत्ता की आलोचना
जीत के बाद पार्टी के भीतर विरोध का सामना करते हुए भी सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को यूपीए सरकार के प्रमुख के रूप में चुना। हालांकि, उन्होंने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का नेतृत्व स्वीकार किया। अतिरिक्त सांविधानिक निकाय के रूप में यह सरकार पर निगरानी रखती थी। इसकी आलोचना हुई, क्योंकि यह समानांतर सत्ता का केंद्र बन गई थी।
2009 के चुनाव में निर्णायक मोड़
2009 में कांग्रेस और यूपीए ने और बेहतर प्रदर्शन किया। कांग्रेस ने अकेले 206 सीटें जीतीं, जो भाजपा से 90 अधिक थीं। इस नतीजे ने प्रधानमंत्री बनने की लालकृष्ण आडवाणी की महत्वाकांक्षा का अंत कर दिया। इसी चुनाव ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के भविष्य के नेतृत्व का मार्ग प्रशस्त किया। इस चुनाव के बाद, राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथियों की ताकत 59 से घटकर 26 रह गई। बाद में, आडवाणी ने जुलाई, 2009 में एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर चुनाव आयोग किसी तरह की हेराफेरी से मुक्त ईवीएम और उसमें हर तरह गड़बड़ी को ठीक करना सुनिश्चित नहीं कर पाता, तो हमें मतपत्रों की तरफ लौट जाना चाहिए।
वाजपेयी के गढ़े शब्दों पर बनी कांग्रेस की राह
यह नतीजा यूपीए के दोनों कार्यकालों में गठबंधन धर्म को निभाने का प्रदर्शन था, जो कि वाजपेयी द्वारा गढ़ा गया शब्द था। इसका मतलब था कि प्रधानमंत्री को गठबंधन सहयोगियों की कई अनुचित मांगें भी माननीं पड़ीं। इसी तरह, मनमोहन ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि 2जी घोटाले के बीच डीएमके के ए. राजा के दूरसंचार मंत्री बने रहने में गठबंधन धर्म कारण था। पीएम के पास गठबंधन सहयोगियों से आए अपने सहयोगियों पर कोई वास्तविक अधिकार नहीं था।
बीते दो चुनाव व्यक्ति विशेष पर केंद्रित
2014 और 2019 के चुनाव कई मायनों में राष्ट्रपति के चुनाव जैसे थे, क्योंकि वोट नरेंद्र मोदी के नाम पर मांगे गए। 2014 में भाजपा 282 सीटें जीतीं, जबकि एनडीए की कुल सीटें 336 थीं। 2019 में प्रदर्शन में और सुधार हुआ और भाजपा को अपने दम पर 303 सीटें मिलीं। वहीं, गठबंधन सहयोगियों ने अन्य 50 सीटें जीतीं, जिससे एनडीए की कुल संख्या 353 हो गई।
कांग्रेस का रुतबा घटा
कांग्रेस 2014 में 44 सीटों के साथ निचले स्तर पर पहुंच गई। 2019 में 52 सीटों पर जीत हासिल की। दोनों बार आधिकारिक विपक्षी दल के रूप में दावा करने के लिए भी अयोग्य थी। मुख्य विपक्षी दल के लिए कम से कम 55 की आवश्यकता होती है।