फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Election ›   Lok Sabha ›   55 crore worth of ink on fingers 66 percent more spent than last time

कहानी चुनाव की: अंगुलियों पर 55 करोड़ से लगेगी अमिट स्याही, पिछली बार से 66 फीसदी अधिक होंगे खर्च

Sat, 30 Mar 2024 07:01 AM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जलज मिश्रा Updated Sat, 30 Mar 2024 07:01 AM IST
सार

भारत में हुए पहले आम चुनाव 1951-52 में मतदाताओं की अंगुली में स्याही लगाने का कोई नियम नहीं था। चुनाव आयोग को किसी दूसरे की जगह वोट डालने और दो बार वोट डालने की शिकायतें मिलीं। धांधली रोकने के लिए आयोग में कई विकल्पों पर विचार हुआ, लेकिन समाधान अमिट स्याही के रूप में मिला।

विज्ञापन
55 crore worth of ink on fingers 66 percent more spent than last time
नीली स्याही? - फोटो : istock

विस्तार

इस बार लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल होने वाली अमिट स्याही का खर्च पिछली बार की तुलना में 66 फीसदी बढ़ गया है। 2019 में आयोग ने स्याही की 26 लाख शीशियां खरीदी थीं, जिस पर 33 करोड़ रुपये का खर्च आया था। इस बार आयोग ने करीब 55 करोड़ रुपये से 26.55 लाख स्याही की शीशियां खरीदी हैं। स्याही पर खर्च के बढ़ने का प्रमुख कारण सिल्वर नाइट्रेट है, जो स्याही का प्रमुख घटक है। इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण खर्च में वृद्धि होती है। स्याही बनाने वाली देश की एकमात्र कंपनी मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लि. (एमपीवीएल) के अनुसार चुनाव आयोग के आदेश पर 25 मार्च तक सभी राज्यों को उनके हिस्से की स्याही पहुंचा दी गई है।

विज्ञापन

62 में पहली बार इस्तेमाल
1962 में पहली बार इस स्याही का इस्तेमाल किया गया था। तब 3. 89 लाख शीशियों का उपयोग हुआ था। इस पर 2.27 लाख रुपये खर्च हुए थे। 2024 में अमिट स्याही के भारतीय चुनावों में इस्तेमाल को भी 62 साल हो जाएंगे।

विज्ञापन

अमिट स्याही से धांधली में कमी
भारत में हुए पहले आम चुनाव 1951-52 में मतदाताओं की अंगुली में स्याही लगाने का कोई नियम नहीं था। चुनाव आयोग को किसी दूसरे की जगह वोट डालने और दो बार वोट डालने की शिकायतें मिलीं। धांधली रोकने के लिए आयोग में कई विकल्पों पर विचार हुआ, लेकिन समाधान अमिट स्याही के रूप में मिला।

विज्ञापन
विज्ञापन

आयोग ने नेशनल फिजिकल लैबोरेटरी ऑफ इंडिया (एनपीएल) से ऐसी स्याही बनाने की बात की, जो पानी या किसी रसायन से भी मिट न सके। एनपीएल ने मैसूर पेंट एंड वार्निश कंपनी को स्याही बनाने का ऑर्डर दिया। 1962 से अबतक एमपीवीएल ही अमिट स्याही की सप्लाई करती आ रही है। मैसूर पेंट्स 30 से अधिक देशों में इस स्याही का निर्यात भी करता है।

कोई नहीं जानता सीक्रेट फॉर्मूला
मैसूर पेंट एंड वार्निश लि. ने कभी भी इस स्याही को बनाने के तरीके को सार्वजनिक नहीं किया। इसका कारण बताया गया कि अगर फॉर्मूले को सार्वजनिक किया गया, तो लोग इसके मिटाने का तरीका खोज लेंगे और इसका उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। हालांकि, कुछ जानकारों का कहना है कि स्याही में सिल्वर नाइट्रेट मिला होता है। इंक को तैयार करने में पूरी सुरक्षा और गोपनीयता का ख्याल रखा जाता है। इंक का फॉर्मूला क्वालिटी मैनेजर के पास होता है। इसे किसी के साथ शेयर नहीं किया जाता है। यही वजह है कि कंपनी ने पिछले पांच दशक से अपनी साख बना रखी है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed