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Jharia Seat: देवरानी-जेठानी की जंग में किसे चुनेगा झरिया, एक के पति को लगी थी 67 गोलियां, दूसरे का पति जेल में

Thu, 14 Nov 2024 02:13 AM IST
शिवेंद्र तिवारी स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Thu, 14 Nov 2024 02:13 AM IST
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सार
Jharia: झारखंड के धनबाद जिले की झरिया विधानसभा सीट का मुकाबला एक बार फिर से जेठानी-देवरानी के बीच है। कोयलांचल की झरिया सीट धनबाद के सबसे पावरफुल सियासी खानदान सूर्यदेव सिंह के परिवार की दो बहुएं आमने-सामने हैं। हमारे खास कार्यक्रम सीट का समीकरण में आज इसी झरिया सीट की बात की...
 
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jharia assembly seat history history and singh mansion Suryadeo Singh politics news in hindi
झारखंड विधानसभा चुनाव 2024 - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

एक जिला जो कोयले के लिए जाना जाता है… एक जिला जिसे भारत की कोयला राजधानी कहा जाता है…एक जिला जिसकी अर्थव्यस्था कोयले से चलती है…1950 के दशक में एक युवा उत्तर प्रदेश के बलिया से इसी कोयले से अपनी किस्मत बदलने की उम्मीद में यहां आता है। बीतते वक्त के साथ ये कोयला उस युवा की किस्मत बदल देता है…सिर्फ किस्मत नहीं बदलता बल्कि उसे इस जिले की राजनीति का पर्याय बना देता है। दशकों तक इस चेहरे की धमक यहां की राजनीति में रहती है। अचानक वो चेहरा दुनिया छोड़कर चला जाता है। लेकिन उसकी धमक ऐसी होती है यहां से उसके परिवार को शुरुआती नाकामी के बाद फिर से सफलता मिलने लगती है। ये सफलता परिवार में कलह भी लेकर आती है। कलह भी ऐसी कि वो खूनी जंग में बदल जाती है। अब इसी परिवार के चेहरों के बीच जिले की एक विधानसभा सीट पर वर्चस्व की लड़ाई है। वो सीट जो इस पूरे किस्से की गवाही देती है, वो सीट है झारखंड के धनबाद जिले की झरिया विधानसभा सीट….




हमारे खास कार्यक्रम सीट का समीकरण में आज इसी झरिया सीट की बात…बात इस सीट के इतिहास की… बात सूर्यदेव सिंह की, उनके परिवार और परिवार की अदावत की… बात होगी उस महिला की भी जिसने सूर्यदेव सिंह परिवार की चुनौती दी… चुनौती ही नहीं दी बल्कि उनके भाई को हराकर लालू प्रसाद यादव सरकार में मंत्री भी बनीं…

 

सबसे पहले बात झरिया सीट की…
झरिया विधानसभा सीट झारखंड के कोयलांचल में धनबाद जिले में पड़ती है। साल 1967 के बिहार विधानसभा चुनाव में यह सीट अस्तिव में आई। यहां की आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से  कोयला खनन पर निर्भर है। कोयला खनन झरिया की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है। इस बार यहां 20 नवंबर को दूसरे चरण में मतदान है। मतदाताओं की बात की जाए तो इस सीट पर राजपूत और मुस्लिम मतदाताओं का वर्चस्व है। इसके साथ ओबीसी वोटर भी इस सीट पर बड़ा प्रभाव डालते हैं। 

झरिया सीट पर हुए पहले चुनाव की बात करें तो 1967 के इस चुनाव में झरिया सीट पर कांग्रेस को जीत मिली थी। यहां से कांग्रेस के एसआर प्रसाद जीते। उन्होंने जन क्रांति दल के एसके राय को हराया। दो साल बाद बिहार में नए सिरे चुनाव हुए। 1969 के इन चुनावों में नतीजे पलट गए। पिछले चुनाव में हारने वाले एसके राय इस बार जीतने में सफल रहे। हालांकि, इस बार वो भारतीय क्रांति दल के टिकट पर मैदान में थे। उन्होंने कांग्रेस के शेदराज प्रसाद को हरा दिया। 1972 में एक बार फिर एसके राय यानी शिव कुमार राय को जीत मिली। इस बार राय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज करने में सफल रहे थे।
 

बलिया से आए सूर्यदेव सिंह की धनबाद की राजनीति में एंट्री
अब आता है साल 1977 का चुनाव… वो चुनाव जिसमें सूर्यदेव सिंह की धनबाद की राजनीति में एंट्री होती है। इस चुनाव और इसके बाद के चुनावों की बात करेंगे…, लेकिन पहले कहानी सुन लेते हैं सूर्यदेव सिंह की…

ये कहानी शुरू होती है 1950 के दशक से… उत्तर प्रदेश के बलिया से नौकरी की तलाश में सूर्यदेव सिंह धनबाद आते हैं। यहां आकर वह कोयला क्षेत्र से जुड़े नेता बीपी सिन्हा के अधीन काम करने लगते हैं। वक्त के साथ सूर्यदेव सिंह का प्रभाव बढ़ता है। इस बीच बीपी सिन्हा की हत्या हो जाती है। सिन्हा की हत्या के बाद सूर्यदेव सिंह का बीपी सिन्हा के कारोबार पर नियंत्रण हो जाता है। 1977 से सूर्यदेव सिंह और बाद में उनके परिवार का धनबाद और आसपास के इलाकों की राजनीति में नियंत्रण हो जाता है। सूर्यदेव सिंह की कोठी 'सिंह मेंशन' धनबाद की राजनीति का पर्याय बन जाती है।  

सिंह मेंशन सत्ता का केंद्र बनता गया
सिंह मेंशन 1977 के बाद सत्ता का केंद्र बन गया, जब सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। इस चुनाव में उन्होंने तत्कालीन विधायक शिव कुमार राय को शिकस्त दी थी। सूर्यदेव सिंह को अपने द्वारा बनाए गए मजदूर संघ का समर्थन हासिल था। बाद में उन्होंने बाजार और सियासत को नियंत्रित करना शुरू कर दिया। इसका असर यह हुआ की 1980,1985 और 1990 के चुनाव में भी उन्हें जीत मिली। 1977 में वो जनता पार्टी तो 1980 में जनता पार्टी (जेपी), 1985 में जनता पार्टी तो 1990 में जनता दल के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे। सूर्यदेव सिंह 1991 में अपने निधन तक विधायक बने रहे। 

उनके समय में इस इलाके के लिए सिंह मेंशन सत्ता का दूसरा नाम बन गया था। 1977-1991 की अवधि के दौरान सिंह मेंशन ने न केवल खुद को सियासत में स्थापित किया, बल्कि इसने लगभग हर चीज पर नियंत्रण कर लिया। सूर्यदेव सिंह का प्रभाव इतना था कि उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को भी अपने दरवाजे पर ला खड़ा किया। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ उनके अच्छे संबंध माने जाते थे। वे दोनों उत्तर प्रदेश के एक ही जिले बलिया के थे। 1991 में सूर्यदेव सिंह के निधन के बाद यहां उप-चुनाव हुए। 

सिंह मेंशन में लगी सेंध
इस उपचुनाव की भी अपनी कहानी है। एक तरफ जनता दल के विधायक सूर्यदेव सिंह का निधन होता है। वहीं, दूसरी ओर जनता दल के एक और मजदूर नेता राजू यादव की हत्या हो जाती है। 26 सितम्बर 1991 को राजू यादव धनबाद से दिल्ली जा रहे थे। लेकिन वो दिल्ली नहीं पहुंच सके। मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर उनकी हत्या कर दी गई। आरोप धनबाद के कोयला माफिया पर लगा। झरिया विधानसभा सीट पर जब उपचुनाव हुए तो जनता दल ने लालू यादव के करीबी राजू यादव की विधवा पत्नी आबो देवी को टिकट दिया। वहीं, सूर्यदेव सिंह के भाई बच्चा सिंह जनता पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे। नतीजे आए तो जनता दल की आबो देवी ने सिंह मेंशन के किले में सेंध लगा दी। आबो देवी जीतने में सफल रहीं। वहीं, सिंह मेंशन के नए चेहरे को झरिया में पहली ही लड़ाई में हार मिली। 1995 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर बच्चा सिंह और आबो देवी आमने-सामने हुए। एक बार फिर नतीजा वही रहा। इस बार भी जनता दल की आबो देवी को जीत मिली। वहीं, समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) के टिकट पर उतरे बच्चा सिंह हार गए। जीत के बाद आबो देवी को लालू प्रसाद यादव सरकार में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री बनाया गया। 

…फिर लौटी सिंह मेंशन की धमक 
इस शक्तिशाली परिवार को अंदरूनी कलह का भी सामना करना पड़ा। यह कलह मुख्य वजह बन गई जिसके कारण सिंह मेंशन का धनबाद में प्रभाव अलग-अलग केंद्रों में बंट गया। अब धनबाद में तीन शक्ति केंद्र बन चुके हैं - सिंह मेंशन, कुंती निवास और रघुकुल। 

सिंह मेंशन की सियासत 
1999 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर बच्चा सिंह झरिया से उतरे। एक बार फिर उनकी पार्टी बदल चुकी थी। इस बार वो समता पार्टी के उम्मीदवार थे। लगातार दो चुनाव हार चुके बच्चा सिंह तीसरे प्रयास में जीतने में सफल रहे। बच्चा ने कांग्रेस के अब्दुल कयूम अंसारी को शिकस्त दी। वहीं, लगातार दो चुनाव जीत चुकींं राजद की आबो देवी तीसरे स्थान पर खिसक गईं। इसके बाद जब 2000 में नए राज्य झारखंड का गठन हुआ तो बच्चा सिंह को बाबूलाल मरांडी कैबिनेट में जगह मिली। एक तरफ धनबाद का ताकतवर परिवार सत्ता में भागीदारी कर रहा था दूसरी पर एक संग्राम परिवार में चल रहा था। रिश्तों में दूरियां बढ़ रही थीं। बाबू लाल मरांडी कैबिनेट में नगर विकास मंत्री बनने के बाद 2002 में बच्चा सिंह अपने नए घर सूर्योदय में चले गए। 2005 आते-आते रिश्तों में कड़वाहट बहुत बढ़ चुकी थी। 2005 के विधानसभा चुनाव में झरिया सीट से सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं और विधायक बनीं। वहीं, बच्चा सिंह बोकारो चले गए। उन्होंने यहां से राजद के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन तीसरे नंबर पर रहे। दूसरी तरफ कुंती सिंह 2005 के बाद 2009 में भी भाजपा के टिकट पर झरिया से जीतने में सफल रहीं। 

जब भाई-भाई के बीच हुई जंग
साल 2014 का विधानसभा चुनाव आता है। कुंती और सूर्यदेव सिंह के बेटे संजीव सिंह 28 साल के हो चुके थे। चुनाव लड़ने की उम्र हो गई थी। मां की जगह भाजपा ने बेटे को टिकट दिया। संजीव भाजपा के उम्मीदवार बने। उनका मुकाबला हुआ संजीव के चचेरे भाई और झरिया के डिप्टी मेयर नीरज सिंह से… पहली बार सूर्यदेव सिंह परिवार के दो सदस्यों में सीधी चुनावी लड़ाई हुई। जीत संजीव को मिली। नीरज सूर्यदेव सिंह के छोटे भाई राजनारायण सिंह के सबसे बड़े बेटे थे। नीरज का राजनीति में आने को कोई इरादा नहीं था। नीरज के छोटे भाई  मुकेश सिंह का इलाके में अच्छा दबदबा था। मुकेश की जिद पर नीरज ने 2009 के विधानसभा चुनाव में धनबाद सीट से निर्दलीय किस्मत आजमाई। इस चुनाव में उन्हें करीब 18 हजार वोट मिले और वो तीसरे नंबर पर रहे। इस चुनाव में नीरज को भाजपा की हार की वजह माना गया। जिसे इस सीट पर कांग्रेस के हाथों एक हजार से भी कम वोट से हार मिली थी।  2010 के निकाय चुनाव में मेयर का पद महिलाओं के लिए आरक्षित होने के बाद उन्होंने डिप्टी मेयर का चुनाव लड़ा और जीता। नीरज को चाचा बच्चा सिंह का भी साथ मिला। इसके बाद नीरज का नाम धनबाद के घर-घर तक पहुंच गया। 2014 में नीरज की हार के बाद भी परिवारिक लड़ाई बढ़ती गई। 
 
साल 2017 में नीरज सिंह की हत्या कर दी गई। नीरज के चचेरे भाई और तब के झरिया विधायक संजीव पर हत्या का आरोप लगा। संजीव सिंह अपने चचेरे भाई नीरज की हत्या के आरोप में अभी भी जेल में बंद हैं।

झरिया सीट पर देवरानी-जेठानी आमने-सामने
झरिया सीट पर देवरानी-जेठानी आमने-सामने - फोटो : Amar Ujala
अब देवरानी-जेठानी आमने-सामने 
2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने नीरज सिंह की विधवा पत्नी पूर्णिमा नीरज सिंह को टिकट दिया। वहीं, भाजपा ने उनकी देवरानी और नीरज की हत्या के आरोपी विधायक संजीव सिंह की पत्नी रागिनी सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया। नतीजा पूर्णिमा सिंह के पक्ष में रहा और उन्होंने यह चुनाव 12,054 वोट से जीत लिया। 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद इस चुनाव में भी देवरानी-जेठानी पूर्णिमा सिंह और रागिनी सिंह एक बार फिर एक दूसरे के खिलाफ मैदान में हैं। वर्तमान में पूर्णिमा सिंह झरिया से कांग्रेस की विधायक हैं। इस चुनाव में वैसे तो झरिया सीट पर कुल 11 उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला पूर्णिमा और रागनी के बीच ही माना जा रहा है।
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