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Amethi: 2019 में स्मृति ने तोड़ा राहुल की जीत का सिलसिला, नेहरू-गांधी परिवार की सियासी पैठ की गवाह रही अमेठी

Fri, 03 May 2024 01:29 PM IST
शिवेंद्र तिवारी स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Fri, 03 May 2024 01:29 PM IST
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सार
Amethi: लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट की चर्चा हमेशा होती है। अमर उजाला की खास चुनावी सीरीज ‘सीट का समीकरण’ में जानते हैं यहां का पूरा सियासी गणित... 
 
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Election 2024: Amethi Parliamentary seat Profile History and political equation
अमेठी का चुनावी इतिहास - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश की चर्चित सीट अमेठी पर बना संशय अब खत्म हो गया है। कई दिनों तक अटकलें लगाई गईं कि यहां से गांधी परिवार का सदस्य चुनाव मैदान में उतर सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। शुक्रवार सुबह कांग्रेस ने अमेठी के साथ-साथ रायबरेली के लिए अपने उम्मीदवारों का एलान कर दिया। पार्टी ने रायबरेली सीट पर पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और अमेठी सीट पर गांधी परिवार के करीबी केएल शर्मा को चेहरा घोषित किया है। 



उम्मीदवारों का एलान होने के बाद भाजपा और कांग्रेस में जुबानी जंग भी शुरू हो गई है। भाजपा ने दावा किया है कि राहुल गांधी ने डरकर अमेठी छोड़ दिया। उधर कांग्रेस ने अमेठी से अपने पुराने कार्यकर्ता को मौका देने की बात कही है। इस पूरे लोकसभा चुनाव में अमेठी सीट की खूब चर्चा है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी यहां की मौजूदा सांसद हैं। कभी नेहरू-गांधी परिवार का गढ़ रही इस सीट से संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी सांसद रह चुके हैं। हालांकि, दशकों बाद कांग्रेस से कोई गांधी नेहरू परिवार से यहां चुनाव नहीं लड़ रहा है। 




सवाल ये है कि अमेठी सीट का सियासी गणित क्या है? 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या हुआ था? अमेठी का चुनावी इतिहास क्या कहता है? आइये इन सभी सवाल के जवाब जानते हैं हमारी इस खास चुनावी सीरीज ‘सीट का समीकरण’ में...

अमेठी का चुनावी इतिहास
अमेठी का चुनावी इतिहास - फोटो : AMAR UJALA

अमेठी का चुनावी इतिहास क्या कहता है? 
अमेठी लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से एक है। ऐतिहासिक तौर पर यह सीट गांधी-नेहरू परिवार का गढ़ रही है। यह सीट 1967 में अस्तित्व में आई थी। यहां पहले चुनाव में कांग्रेस के विद्याधर वाजपेयी को जीत मिली थी। वाजपेयी ने भारतीय जनसंघ के जी. प्रसाद को हराकर यह जीत हासिल की थी। 1967 के बाद 1972 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस के विद्याधर वाजपेयी ने विजय हासिल की। वाजपेयी ने इस बार भारतीय जनसंघ के गोकुल प्रसाद पाठक को शिकस्त दी।

आपातकाल के ठीक बाद 1977 में हुए चुनाव में इस सीट से संजय गांधी ने चुनाव लड़ा। हालांकि, इस चुनाव में संजय को भारतीय लोक दल के रवींद्र प्रताप सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा। संजय गांधी यह चुनाव 75,744 वोटों के अंतर से हार गए।

इसके बाद 1980 में कांग्रेस की तरफ से संजय गांधी यहां से जीते। उन्होंने अबकी बार जनता पार्टी की तरफ से उतरे रवींद्र प्रताप सिंह को 1,28,545 मतों के बड़े अंतर से हरा दिया। 

अमेठी का चुनावी इतिहास
अमेठी का चुनावी इतिहास - फोटो : AMAR UJALA

उपचुनाव ने पैदा कर दी गांधी परिवार में दरार 
अमेठी सीट से संजय गांधी अच्छे मतों से जीतकर पहली बार संसद में पहुंचे। हालांकि, कुछ महीनों के बाद ही विमान दुर्घटना में संजय की मौत हो गई। उधर इस घटना ने इंदिरा गांधी और कांग्रेस के सामने एक सियासी संकट खड़ा कर दिया। इंदिरा ने अपने बड़े बेटे राजीव गांधी को राजनीति में उतारने का फैसला कर लिया। इसके साथ ही अमेठी उप-चुनाव के लिए राजीव को अमेठी से कांग्रेस का उम्मीदवार बना दिया गया।

इस उपचुनाव में विपक्ष ने लोकदल के युवा नेता शरद यादव को उम्मीदवार बनाया, लेकिन राजीव यह चुनाव जीत गए। इंदिरा गांधी के इस फैसले ने परिवार में फूट पैदा कर दी और संजय की पत्नी मेनका गांधी ने अपना संजय विचार मंच के नाम से अपना नया राजनीतिक दल बना लिया। 

जब पारिवारिक लड़ाई बनी सियासी 
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। इसके बाद लोकसभा चुनावों की घोषणा हो गई। राजीव फिर अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए गए तो मेनका ने राजीव के मुकाबले संजय विचार मंच के उम्मीदवार के रूप में पर्चा भर दिया। 

यह मुकाबला नेहरू-गांधी परिवार के दोनों वारिसों के बीच हो गया। जब नतीजे आए तो मेनका के सामने राजीव को प्रचंड जीत मिली। 1984 लोकसभा चुनाव में राजीव को 3,65,041 वोट जबकि उनके विरोध में उतरीं मेनका को महज 50,163 वोट ही मिल सके। इस तरह से मेनका को 3,14,878 वोटों से करारी हार झेलनी पड़ी। 

1989 में राजीव का मुकाबला महात्मा गांधी के पोते से 
साल 1989 के लोकसभा चुनाव में भी अमेठी सीट पर राजीव गांधी का दबदबा बना रहा। इस बार उनके सामने महात्मा गांधी के पोते और मशहूर जीवनीकार व पत्रकार राजमोहन गांधी थे। इस चुनाव में राजीव ने राज मोहन को 2,02,138 वोटों से शिकस्त दी। 

राजीव के सामने भाजपा की चुनौती 
1991 के लोकसभा चुनाव में अमेठी सीट पर राजीव गांधी के सामने भाजपा की चुनौती थी। 1991 में अमेठी से पार्टी ने रवींद्र प्रताप को अपना उम्मीदवार बना दिया। जब नतीजे आए तो एक बार फिर राजीव गांधी को जीत मिली। इस चुनाव में कांग्रेस 1,12,085 वोटों से जीत गई। 

मई 1991 में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। इसके बाद हुए उप-चुनाव में कांग्रेस के कैप्टन सतीश शर्मा को जीत मिली। 1996 के लोकसभा चुनाव हुए तो अमेठी में एक बार फिर पार्टी ने सतीश शर्मा को मौका दिया जिनके सामने भाजपा से राजा मोहन सिंह थे। नतीजा एक बार फिर कांग्रेस के पक्ष में गया और पार्टी के प्रत्याशी 40,143 वोटों से चुनाव जीत गए। 

1998 के लोकसभा चुनाव में अमेठी सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई। इस बार भाजपा की तरफ से उतरे संजय सिंह ने कांग्रेस के कैप्टन सतीश शर्मा को 23,270 वोटों से शिकस्त दी। 

सोनिया गांधी
सोनिया गांधी - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

पहली बार चुनावी रण में यहीं उतरीं सोनिया 
पति की हत्या के करीब छह साल बाद सोनिया गांधी का राजनीतिक आगाज हुआ। 1997 में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता लेने के बाद 1999 में लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी पहली बार चुनावी रण में उतरीं। सियासी करियर की शुरुआत कर रही सोनिया ने पहला चुनाव अमेठी संसदीय क्षेत्र से लड़ा। उधर सोनिया के सामने भाजपा ने डॉ. संजय सिंह को खड़ा किया। पहले ही चुनाव में सोनिया को प्रचंड जीत मिली। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को 3,00,012 वोटों से हराया। 

कांग्रेस नेता राहुल गांधी
कांग्रेस नेता राहुल गांधी - फोटो : ani

पिता की सियासी विरासत राहुल ने संभाली 
मां सोनिया के बाद बेटे राहुल गांधी ने भी राजनीति में रास्ता अपना लिया। 2004 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी यहीं से चुनावी राजनीति में कदम रखा। राहुल गांधी ने पहले ही चुनाव में शानदार जीत हासिल की। अमेठी में उन्होंने बसपा उम्मीदवार चंद्र प्रकाश मिश्रा को 2,90,853 वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। इस बार भाजपा यहां तीसरे स्थान पर रही। 2009 के चुनावों में राहुल गांधी को दूसरी बार अमेठी से जीत मिली। इस बार उन्होंने बसपा के आशीष शुक्ला को  3,70,198 मतों से हरा दिया। भाजपा एक बार फिर यहां तीसरे स्थान पर रही। 

स्मृति इरानी
स्मृति इरानी - फोटो : अमर उजाला

जब अमेठी में पहली लड़ाई हार गईं स्मृति 
2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटों पर भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल को जीत मिली थी। महज सात सीटें ऐसी रहीं जहां भाजपा को जीत नहीं मिली थी। इन सात में से दो सीटें कांग्रेस और पांच सीटें सपा ने जीती थीं। इनमें अमेठी सीट भी शामिल थी। इस सीट पर राहुल गांधी ने भाजपा की तरफ से उम्मीदवार बनाई गईं स्मृति ईरानी को हराया था। 2014 में राहुल को 4,08,651 जबकि स्मृति को 3,00,748 वोट मिले। इस तरह से राहुल ने 1,07,903 मतों से यह चुनाव जीत लिया।

भाजपा सांसद व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी।
भाजपा सांसद व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी। - फोटो : amar ujala

2019 में स्मृति ने लिया हार का बदला 
2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी स्मृति नरेंद्र मोदी कैबिनेट में शामिल की गई थीं। इस चुनाव से ही स्मृति ईरानी नेहरू गांधी परिवार पर हमलावर रहीं। राहुल गांधी अक्सर उनके निशाने पर होते। आखिरकार स्मृति ने 2014 की हार का बदला 2019 के चुनाव में ले लिया। इस चुनाव में एक बार फिर स्मृति और राहुल आमने-सामने थे। हालांकि, जीत स्मृति को मिली। इस चुनाव में स्मृति के लिए 4,68,514 वोट पड़े जबकि राहुल के लिए 4,13,394 वोट। इस तरह से स्मृति ने 55,120 वोटों से इस चुनाव में जीत दर्ज की। जीत के इनाम के तौर पर एक बार फिर उन्हें मोदी कैबिनेट में जगह मिली। 

केएल शर्मा अमेठी से बनाए गए कांग्रेस प्रत्याशी।
केएल शर्मा अमेठी से बनाए गए कांग्रेस प्रत्याशी। - फोटो : अमर उजाला

नामांकन के आखिरी दिन तय हुआ 2024 का मुकाबला
यूपी की हाईप्रोफाइल अमेठी सीट पर नामांकन की आखिरी के एक दिन पहले तक कांग्रेस का उम्मीदवार तय नहीं था। आखिरकार तमाम अटकलों को विराम लगाते हुए कांग्रेस ने केएल शर्मा को अपना प्रत्याशी घोषित किया है। उनका सामना भाजपा की तरफ से उतरीं स्मृति ईरानी से होगा। वहीं बसपा ने अमेठी में नन्हे सिंह चौहान को अपना चेहरा बनाया है। कुल मिलाकर देखना दिलचस्प होगा कि जनता यहां से किसे मौका देती है।

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