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Year Ender: कोरोनाकाल में बच्चों की मदद के लिए आगे आया कैलाश सत्यार्थी फाउंडेशन, 2021 में किए ये महत्वपूर्ण कार्य

Wed, 29 Dec 2021 06:21 PM IST
सुभाष कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: सुभाष कुमार Updated Wed, 29 Dec 2021 06:21 PM IST
सार

कैलाश सत्यार्थी ने महामारी के दौरान देश-दुनिया के बड़े और महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म पर बच्चों की दुर्दशा को उजागर किया और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने पर बल दिया जिससे कोविड संकट में बच्चे भी एक मुद्दा बने।

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Year Ender during the covid 19 crisis, Kailash Satyarthi Foundation came forward to help the childrens who were suffering, know some important works done in 2021 
कैलाश सत्यार्थी - फोटो : Social Media

विस्तार

वर्तमान में दुनिया में जितने भी गरीब नागरिक हैं, उनमें आधी से अधिक आबादी बच्चों की है। कोरोना महामारी के प्रकोप में लॉकडाउन और आर्थिक संकट के कारण यह बच्चे अप्रत्याशित रूप से गरीबी और बाल श्रम के दलदल में धंसने को मजबूर हुए हैं। बच्चों का बचपन असुरक्षित हो गया है। दुनिया भर में इस संकट को लेकर चर्चा है। ऐसे समय में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने भी आगे आकर बच्चों के बचपन को सुरक्षित करने के लिए विभिन्न कदम उठाए हैं। उन्होंने महामारी के दौरान देश-दुनिया के बड़े और महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म पर बच्चों की दुर्दशा को उजागर किया और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने पर बल दिया। इससे कोविड संकट में बच्चे भी एक मुद्दा बनें। उनके प्रयासों से तमाम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और सरकारें सक्रिय हुईं और बच्चों के लिए नीतियां और योजनाएं बनीं। आइए जानते हैं कैलाश सत्यार्थी फाउंडेशन द्वारा साल 2021 में किए गए कुछ ऐसे ही कार्यों के बारे में..

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फेयर शेयर टू एंड चाइल्ड लेबर अभियान

कोरोना महामारी से उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक संकटों ने बाल श्रमिकों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोतरी की है। कैलाश सत्यार्थी के नेतृत्व में बाल श्रम को समाप्त करने के लिए दुनियाभर के नोबेल पुरस्कार विजेताओं, वैश्विक नेताओं, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और अन्य अतंरराष्ट्रीय संस्थाओं ने “फेयर शेयर टू एंड चाइल्ड लेबर” अभियान की शुरुआत की। फेयर शेयर टू एंड चाइल्ड लेबर अभियान का लक्ष्य बच्चों के लिए दुनियाभर के संसाधनों, नीतियों और सामाजिक सुरक्षा में उनकी आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी की मांग है। कोरोना काल में पैदा हुए आर्थिक संकट से उबरने के लिए अमीर देशों ने जो अनुदान दिया है, उनमें भी बच्चों की हिस्सेदारी के लिए अभियान चलाया गया। दुनिया भर के बच्चों के लिए इस अभियान का इतना महत्व है कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक गाय राइडर, विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस घेब्रेयेसस, स्वीडन के प्रधानमंत्री स्टीफन लोफवेन, अंतर संसदीय संघ के महासचिव मार्टिन चुंगोन्ग, यूएन सस्टेनेबल डिवेलपमेंट सोल्यूशन्स नेटवर्क के अध्यक्ष जैसे वैश्विक नेताओं ने इसका पुरजोर समर्थन किया है।

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स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार बनाने की मांग

भारत समेत दुनियाभर में महामारी की दूसरी लहर के बाद कैलाश सत्यार्थी ने भारत सरकार से स्वास्थ्य देखभाल के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने का आग्रह किया। उन्होंने इसके लिए बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा की जरूरतों की पूर्ति के लिए पर्याप्त बजटीय आवंटन करने की मांग की। सत्यार्थी की इस मांग की अहमियत को समझते हुए कई सांसदों ने इसका समर्थन किया। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सत्यार्थी की इस मांग को महत्वपूर्ण मानते हुए केंद्र सरकार से स्वास्थ्य के अधिकार को संविधान के मौलिक अधिकार का हिस्सा बनाने की वकालत की।

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महामारी से अनाथ हुए बच्चों को तत्काल कानूनी और मानसिक सहायता उपलब्ध कराई

कैलाश सत्यार्थी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कोरोना महामारी में अनाथ हुए बच्चों की संख्या को उजागर किया था। महामारी की दूसरी लहर में हजारों बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया और वे अनाथ हो गए हैं। सत्यार्थी के नेतृत्व में उनके संगठनों कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन (केएससीएफ) और बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) ने बच्चों और उनके अभिभावकों को तत्काल कानूनी और मानसिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए 24 घंटे का हेल्पलाइन नंबर शुरू किया। साथ ही सरकार से उन्हें आर्थिक सहायता देने की भी मांग की। इसके बाद सरकार ने कोरोना महामारी से अनाथ बच्चों के कल्याण के लिए कई कदम उठाए।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने कैलाश सत्यार्थी को बनाया एसडीजी एडवोकेट

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी पिछले चालीस सालों से बाल श्रम को पूरी दुनिया से खत्म करने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए  कई संगठनों को स्थापित किया है, कई जन-जागरुकता यात्राएं निकाली हैं। उनके नेतृत्व में वर्ष 1998 में दुनियाभर से बदतर प्रकार की बाल मजदूरी को समाप्त करने के लिए 103 देशों में निकाली गई ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर को कौन भूला सकता है। उनकी इसी यात्रा की देन है अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा आईएलओ कन्वेंशन-182 को पारित किया जाना। इस कानून के बनने मात्र से 20 वर्षों में ही दुनियाभर में बाल मजदूरों की संख्या 26 करोड़ से घटकर 16 करोड़ हो गई। कोरोनाकाल में भी सत्यार्थी ने बच्चों के प्रति जिस सक्रियता, संवेदनशीलता, करुणा और तत्परता का परिचय दिया, उसी को रेखांकित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने उन्हें अपना एसडीजी (सतत विकास लक्ष्य)  एडवोकेट नियुक्त किया है। एसडीजी एडवोकेट के रूप में सत्यार्थी संयुक्त राष्ट्र संघ के सतत विकास लक्ष्य को साल 2030 तक हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह भारत के लिए गौरव की बात है।

कोरोनाकाल में 13 हजार से अधिक बच्चों को ट्रैफिकिंग और बाल श्रम से मुक्त कराया गया

कोरोना महामारी के दौरान बच्चों की ट्रैफिकिंग, बाल श्रम, बाल विवाह और डिजिटल चाइल्ड पोर्नोग्राफी में बेतहाशा वृद्धि हुई। ऐसे में कैलाश सत्यार्थी के नेतृत्व में उनके संगठनों ने देशभर में संकट सहायता केंद्र बनाए। संगठनों ने दो हजार से अधिक कोविड केयर किट्स का वितरण करते हुए 17 राज्यों और 390 जिलों में 90 लाख बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित किया। बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) ने महामारी के दौरान 13,000 से अधिक बच्चों को ट्रैफिकिंग और बाल श्रम से मुक्त कराने का काम किया।

कोरोनाकाल में बच्चों को ट्रैफिकिंग के शिकार होने से बचाने के लिए चलाया जागरुकता अभियान

कोरोनाकाल में बड़े पैमाने पर अप्रवासी मजदूर पलायन करके गांव लौटे तो दलालों की नजर उनके बच्चों पर गई। वे गरीबी से लाचार मजदूरों को उनके बच्चों को नौकरी देने का लालच देकर शहरों में ले जाकर बाल श्रम के लिए बेचने लगे। ऐसे में कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन ने ऐसे मजदूर माता-पिताओं और ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए ट्रैफिकिंग के संवेदनशील इलाकों में जन जागरुकता अभियान चलाया। मुक्त बाल मजदूर नेताओं द्वारा चलाए जा रहे “मुक्ति कारवां अभियान” के जरिए बच्चों की ट्रैफिकिंग, बाल श्रम और बाल विवाह के खिलाफ पूरे देश में सघन जागरुकता अभियान चलाया गया। साथ ही ऐसे गावों में इंटेलिजेन्स नेटवर्क तैयार किया गया। फाउंडेशन के कार्यकर्ता गावों में पढ़े-लिखे नौजवानों से संपर्क स्थापित करते और ये नौजवान इलाके के दलालों पर नजर रखते थे। जैसे ही ये दलाल किसी बच्चे को ले जाते, वे फौरन कार्यकर्ताओं को सूचित कर देते थे। ऐसी सूचनाओं पर संगठन ने पुलिस और प्रशासन की मदद से छापामार कार्रवाई कर हजारों बच्चों को ट्रैफिकिंग से मुक्त कराया और तमाम दलालों को सलाखों के पीछे पहुंचाया गया। ट्रैफिकिंग के खिलाफ देश में मजबूत कानून नहीं है। सत्यार्थी लगातार एक एंटी ट्रैफिकिंग कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग पर केंद्र सरकार ने एक एंटी ट्रैफिकिंग बिल तैयार किया है, जिसे संसद में पेश किया जाना है।  

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