जल संरक्षण की दिशा में अनूठा कदम, संरक्षित किया गया पानी खेतों तक पहुंचा रहे सुभाष
मैंने देखा है कि करीब 30 साल में हमारे गांव में मानसून के दौरान कभी अच्छी बारिश नहीं हुई है, साथ ही जल संरक्षण न हो पाने के चलते सारा पानी बह जाता था। गांव के बूढ़े लोग बताते हैं कि गांव की मिट्टी ज्वार और गन्ना जैसी फसलों के लिए आदर्श मानी जाती थी, लेकिन अच्छी मिट्टी होने के बाद भी पानी के अभाव में लोग खेती नहीं कर पा रहे थे।
मैं जयगांव का रहने वाला हूं, जो महाराष्ट्र के सतारा जिले में पड़ता है। मैं केवल चार साल का था, जब पापा का निधन हुआ। बचपन से ही मैंने अपने गांव के लोगों को सूखे से संघर्ष करते हुए देखा है। धीरे-धीरे उम्र के साथ जिम्मेदारियां बढ़ीं, तो मैं और मेरे कई साथी गांव छोड़कर रोजगार के सिलसिले में मुंबई चले गए। चूंकि मैंने गांव में वाहन चलाना सीखा था, तो यहां आकर मुझे काम ढूंढ़ने में ज्यादा परेशानी नहीं उठानी पड़ी। मैंने ट्रैवल एजेंसियों में कारों, बसों में ड्राइवर के तौर पर काम करना शुरू किया।
मुझे काम में मजा आ रहा था, साथ ही बचत भी ठीक-ठाक हो रही थी। धीरे-धीरे मैं मुंबई में जम गया। इस दौरान मुझे एक दिन आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम 'खुशी' में भाग लेने का अवसर मिला। मैं वहां कई ऐसे लोगों से मिला, जो समाज में बदलाव लाने के प्रयास में लगे थे। वहीं से मेरे विचार बदल गए। मुझे लगा कि आजकल युवा बड़े शहरों में रहने लगे हैं, मगर उनके गांवों की स्थिति क्या होती होगी। वहां की स्थितियों में तो और अधिक असंतुलन आ जाता होगा।
ऐसे में मैंने संकल्प लिया कि इस स्थिति को समय रहते सुधारना होगा, क्योंकि अभी नहीं तो कभी नहीं। इस बात को समझने के बाद मैं मुंबई से वापस गांव चला आया। यहां आकर सबसे पहले मैंने गांव को खुले में शौचमुक्त करने का प्रयास शुरू किया। और शौचालय निर्माण के साथ जल संरक्षण के विकल्प भी खोजने लगा। मैंने देखा कि यहां समस्याएं कई थीं और बिना किसी सरकारी मदद के उन्हें हल करना मुश्किल था। इसलिए मैंने सरपंच का चुनाव लड़ने का विचार किया।
सुखद बात यह रही कि गांव वालों ने मेरा साथ दिया। 32 वर्ष की उम्र में मैं यगांव का सरपंच बन गया। सरपंच बनने के बाद मैंने पहला काम यह किया कि गांव के सभी लोगों तक शौचालय की उपलब्धता करवाई। इसके बाद मैंने गांव में पानी की समस्या को हल करने की दिशा में प्रयास करने शुरू कर दिए। इस बीच, मैंने आर्ट ऑफ लिविंग्स से सहायता मांगी। इस पर उन्होंने मुझे नदी कायाकल्प परियोजना के सहयोग से पानी की कमी के मुद्दे का समाधान बताया। फिर गांव के सभी लोगों के साथ मिलकर मैंने स्टॉप द वाटर, सेव द वाटर के नाम से एक अभियान शुरू किया।
इसमें महाराष्ट्र सरकार की तरफ से हमें आर्थिक सहायता मिली। हमारी कोशिशों के चलते अब बारिश के मौसम में गांव के तालाब को भरा जा चुका है। गांव के कुएं
को भी सुधारा जा चुका है, जिससे पीने का पानी आसानी से मिल रहा है। मुझे लगता है कि यह सिर्फ शुरुआत है और चीजें अकेले कुछ वर्षों में नहीं बदलेगी। इसमें समय लगेगा और हमें इसके लिए काम करना होगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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