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इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर की पहल भारत से 'भुखमरी' मिटा सकती है

Sun, 29 May 2016 10:58 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Sun, 29 May 2016 10:58 AM IST
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This Software Engineer's Idea Could Feed Millions of Hungry in India
'भुखमरी' के खिलाफ गजब की जंग! - फोटो : thebetterindia

कभी-कभी वो नन्हें हाथ, जो मैले है, धूल-धक्कड़ से गंदे हैं, जिनमें आंख-नाक का कीचड़ लगा है, वो आपकी ओर लपकते हैं, तो इस भागम-भाग में भी आपके औसत धड़कते दिल की धड़कन बढ़ा देते हैं। पसीजने पर मजबूर कर देते हैं। चतुर दिमाग सोच में पड़ जाता है। मन व्याकुल होने लगता है। अपना बचपन याद आता है। एक सवाल जेहन में कौंधता है कि संस्कृति संपन्न कहे जाने वाले भारत में ये असमानता क्यों है? कई दफे नन्हें हाथों की जगह बूड़े हाथ भी होते हैं, अमूमन, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर कटे-फटे हाथ भी होते हैं जिनकी तादात आपके अरमानों से कहीं ज्यादा होती है। फिर आप सिक्कों में संवेदनाओं को तौलते हैं, उन हाथों में थमाकर क्षणिक राहत महसूस करते और आगे बढ़ जाते हैं। शायद! 

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लेकिन राहत नहीं है, क्योंकि उनकी संख्या करोड़ों में है। और अगर दुनिया का आंकड़ा लिया जाए तो गिनते नहीं बनेगा। वो हाथ फैलाते हैं क्योंकि बाहर की आवोहवा उनके बदन को सुलगाती है और पेट की आग उन्हें अंदर ही अंदर स्वाहा करने पर तुली होती है।
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हालांकि उनके पेट आग को बुझाने के लिए सरकारें हमेशा से फिक्रमंद नजर आईं। लेकिन देश की तरक्की के 6 दशक बाद भी उनकी तादात में इजाफा ही हुआ है।

इसमें नई और आश्चर्य करने वाली बात नहीं है, ये होना तय है, जब तक कि हम और आप बंगलुरु के इस युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर की तरह पहल नहीं करेंगे। आगे की स्लाइड में पढ़े पूरी सक्सेस स्टोरी।

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भूख मिटाकर चेहरों पर मुस्कान लाने की मुहिम

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6 महीने में मिली जबरदस्त सफलता - फोटो : thebetterindia

वैसे तो देश के इस लाल का वास्ता तो कंप्यूटर से है, सॉफ्टवेयर बनाता है, लेकिन अब वंचितों की भूख मिटाकर उनके चेहरे पर मुस्कान भी लाता है। नाम है हरशील मित्तल। आज अपने पेशे से नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यों के लिए मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं। हरशील 'लेट्स फीड बंगलुरु' के नाम से मुहिम चला रहे हैं। इस मुहिम की शुरूआत उन्होंने अपनी सोसायटी से की। 

साल भर पहले एक दिन भूख से बेहाल लोगों के देखकर हरशील को एक साधारण सा लेकर गजब आइडिया आया। उन्होंने अपने साथ दो और दोस्तों को लिए और सोसायटी के घरों में जाकर लोगों से बात की। उनसे कहा कि महीने में एक दिन वो जरूरतमंद लोगों के लिए कुछ अतिरिक्त खाना बनाएं। लोगों को हरशील का सुझाया विचार बहुत पसंद आया। उन्होंने वैसा ही किया। खाना वितरण के लिए महीने का तीसरा रविवार तय हुआ। 

शुरू में तो तिलकनगर इलाके में 40 लोगों को हरशील और उनके दोस्तों ने खाना खिलाया। दूसरों को खाना खिलाने से उन्हें और सोसायटी वालों को वो आत्मिक शांति और सुकून मिला जो करोड़ों खर्च करने के बाद भी नहीं मिलता। हरशील ने पहल को आगे ले जाने ठानी और सोशल मीडिया के माध्यम ले वॉलिंटियर बनाने शुरू किए।

एक विचार ने 750 वॉलिंटियरों को इकट्ठा कर दिया

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स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर ले रहे हैं मुहिम में हिस्सा - फोटो : thebetterindia

देखते ही देखते उनके ही जैसे तमाम नौकरीपेशा युवा, छात्र और समाजसेवा में दिलचस्पी रखने वाले लोग मुहिम से जुड़ते चले गए। आज तकरीबन 750 पंजीकृत वॉलिंटियर मुहिम को चला रहे।

हरशील की ये टीम महीने के हर तीसरे रविवार को वंचितों को खाना खिलाती है। इस साल 10 हजार लोगों को खाना खिलाने का लक्ष्य रखा गया था जो पहले ही पूरा हो गया है और अब लक्ष्य 25 हजार लोगों तक खाना पहुंचाने का है। महज 6 महीनों में ही वंचितों को खाना खिलाने की इस मुहिम को जबरदस्त सफलता मिली है।

जिन लोगों को हरशील की टीम खाना मुहैया कराती है उनमें बेघर, बेसहारा और विक्लांग लोग हैं, बेहद गरीब लोग (जो भोजन का इंतजाम नहीं कर पाते हैं), अनाथालय, वृद्धाश्रम के लोग शामिल हैं। 

हरशील की टीम ने सामाजिक कार्यों में एक कदम और आगे बढ़ाया है और स्किल डेवलपमेंट, एजुकेशन के लिए भी प्रयास शुरू किए हैं।

बच्चे-बच्चे का रखते हैं ख्याल

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नाच-गाकर बांटते हैं खुशियां, करते हैं लोगों को जागरूक - फोटो : thebetterindia

हरशील कहते हैं कि किसी जरूरतमंदों को पैसे देने से पता नहीं चलता कि वो पैसे उनके इस्तेमाल में आ भी पाते हैं या नहीं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा उन्हें खाना खिलाने से सुकून मिलता है। उनके साथ वक्त विताने, हंसने-गाने और डांस करने से अलग ही आनंद मिलता है। 

चूंकी मुहिम के साथ काम करने वाले ज्यादातर युवा कारपोरेट सेक्टर में फुल टाइम जॉब करते हैं इसलिए महीने के एक दिन खाना खिलाने का अभियान चलता है। इसलिए हरशील आम लोगों से भी आह्वान करते हैं कि वो उनकी इस मुहिम से जुड़े ताकि सार्थक मुहिम एक दिन के लिए ही सीमित न रहें और हर दिन जरूरतमंदों को खाना मिल सके। 

हरशील कहते हैं कि उनके वॉलिंटियर इस काम के लिए 3 से 4 घंटे एक महीने में निकालते हैं। इतना वक्त तो आप एक मूवी देखने में लगा देते हैं, लेकिन अगर ये वक्त मुहिम से जुड़ने के लिए निकाले तो तस्वीर ही दूसरी होगी।

हरशील और उनके वॉलिंटियर मानते हैं कि इस खाना खिलाने की मुहिम के जरिए वे दरअसल लोगों से प्यार और खुशियां बांटने की मुहिम चलाते हैं।

इस मुहिम से सीख लेने की जरूरत

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'भुखमरी' मिटाने के लिए आगे आएं - फोटो : thebetterindia

हरशील के मुताबिक जब लोगों से अतिरिक्त खाना तैयार करने का आग्रह किया गया तो 90 फीसदी लोगों ने खुशी-खुशी साथ देना शुरू कर दिया और मुहिम की खूब सराहना की। महीने एक दिन ये लोग वंचितों के लिए ताजा और शाकाहारी खाना तैयार करते हैं, जो कि स्वास्थ्य की कसौटी पर भी खरा होता है। ये लोग खुद ही अपने घरों में खाने के पैकेट बनाते हैं और हरशील की टीम उन्हें बांट देती है।
 
हरशील की मुहिम बंगलुरू में जरूर चल रही है, लेकिन अगर इससे सबक लिया जाए तो देश के हर कोने में इसे अमल में लाया जा सकता है। जरूरत है तो बस एक संकल्प की। 

अगर इस आप संपन्न है या मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं तो इस मुहिम को आगे बढ़ा सकते हैं। ऐसा करने से आप देश के हर चौथे कुपोषित बच्चे को पोषण दे रहे होंगे, एक करोड़ चौरानबे लाख भुखे लोंगों की संख्या को कम कर रहे होंगे, भुखमरी से हर दिन तकरीबन तीन हजार जाने वाली जानों को कम कर रहे होंगे। आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के एक तिहाई कुपोषित बच्चों की अकेले भारत में रहती है। इसलिए देर न करें और कामयाबी की इस कहानी को आगे बढ़ाएं। 

हरशील और उनकी टीम के कार्यों की हम सराहना करते हैं और ढेरों शुभकामनाएं देते हैं।

आपको ये सक्सेस स्टोरी कैसी लगी, अपनी प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स में देना न भूलें और सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि हर किसी के पास एक सकारात्मक और सार्थक संदेश पहुंच सके।

स्टोरी सोर्स-thebetterindia.com

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