{"_id":"5a842f154f1c1bb3208b9478","slug":"this-female-journalist-comes-from-a-community-where-girls-are-not-allow-to-go-to-school","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"जहां लड़कियों की पढ़ाई बैन, वहां खुद के दम पर लड़ी जंग और बन गईं पत्रकार","category":{"title":"Success Stories","title_hn":"सफलताएं","slug":"success-stories"}}
जहां लड़कियों की पढ़ाई बैन, वहां खुद के दम पर लड़ी जंग और बन गईं पत्रकार
जयंती बुरुडा
Updated Wed, 14 Feb 2018 06:34 PM IST
विज्ञापन
jayanti
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उस दिन, जब कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी के संस्थापक ने मेरे सामने कलिंग टीवी के लिए काम करने का प्रस्ताव रखा, मेरा एक सपना सच होने जैसा था। यह मीडिया चैनल इसी संस्था द्वारा संचालित किया जाता है।
मैं ओडिशा के एक पिछड़े जिले मलकानगिरी से ताल्लुक रखने वाली अठाईस वर्षीय युवती हूं। यह वही जिला है, जो अक्सर कुपोषण की वजह से आदिवासी बच्चों की मौत के कारण सुर्खियों में रहता है। मैं आदिवासी हूं, शायद इसीलिए पत्रकार बनने का मेरा सफर औरों से हटकर है।
हम कुल ग्यारह भाई-बहन हैं। मेरे माता-पिता कभी स्कूल नहीं गए, लेकिन मेरे पिता ने मुझे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। वे चाहते थे कि उनकी पांचों बेटियां शिक्षित हों, और उनके बेटे खेत में काम करें। उनकी इस सोच की प्रेरणा क्या रही, यह वही जानते हैं। मेरी बड़ी बहन मेरे गांव की पहली आदिवासी लड़की थीं, जिन्होंने ग्रेजुएशन किया था। मैंने भी ग्रेजुएशन किया, लेकिन मैं केवल स्नातक की पढ़ाई करके थमना नहीं चाहती थी, बल्कि मेरी ख्वाहिश थी कि मैं अपने समुदाय की आवाज बनूं।
विज्ञापन
विज्ञापन
मैं ओडिशा के एक पिछड़े जिले मलकानगिरी से ताल्लुक रखने वाली अठाईस वर्षीय युवती हूं। यह वही जिला है, जो अक्सर कुपोषण की वजह से आदिवासी बच्चों की मौत के कारण सुर्खियों में रहता है। मैं आदिवासी हूं, शायद इसीलिए पत्रकार बनने का मेरा सफर औरों से हटकर है।
विज्ञापन
हम कुल ग्यारह भाई-बहन हैं। मेरे माता-पिता कभी स्कूल नहीं गए, लेकिन मेरे पिता ने मुझे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। वे चाहते थे कि उनकी पांचों बेटियां शिक्षित हों, और उनके बेटे खेत में काम करें। उनकी इस सोच की प्रेरणा क्या रही, यह वही जानते हैं। मेरी बड़ी बहन मेरे गांव की पहली आदिवासी लड़की थीं, जिन्होंने ग्रेजुएशन किया था। मैंने भी ग्रेजुएशन किया, लेकिन मैं केवल स्नातक की पढ़ाई करके थमना नहीं चाहती थी, बल्कि मेरी ख्वाहिश थी कि मैं अपने समुदाय की आवाज बनूं।
विज्ञापन
इसके लिए मैंने पत्रकारिता का कोर्स करने का फैसला किया। लेकिन मेरे लिए यह फैसला इतना आसान नहीं था। इस कोर्स के लिए नजदीकी संस्थान मेरे घर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर कोरापुट का ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय था। घरवालों ने साफ कह दिया कि यह पढ़ाई संभव नहीं है। इस मौके पर मेरी एक सहेली ने मेरी मदद की। हॉस्टल की फीस से बचने के लिए उसने अपने एक रिश्तेदार के घर पर रुकने की व्यवस्था की, जिन्होंने मुझे अपनी बेटी के बराबर तवज्जो दी। मेरे घरवाले इतने गरीब थे कि वे मेरे पास आकर मुझसे मिल भी नहीं सकते थे।
पढ़ाई पूरी करने के बाद भुवनेश्वर में पेशेवर प्रशिक्षण के वक्त भी मुझे आर्थिक दिक्कतें हुईं, जब तक मेरी मुलाकात फिल्म निर्माता बिरेन दास से नहीं हुई। बिरेन ने न सिर्फ मेरी मदद की, बल्कि अगले एक साल तक मुझे अपने निर्देशन में प्रशिक्षण दिया। उन्होंने मुझे अपने घर में रहने की जगह दी। उनकी बदौलत ही मैं वह आत्मविश्वास हासिल कर सकी, जिसकी जरूरत एक पत्रकार बनने के लिए होती है। लोगों को यदि पता चल जाए कि मैं एक आदिवासी हूं, तो उनका मेरे प्रति नजरिया बदल जाता है। लेकिन मेरे अग्रजों ने मुझे एक आदिवासी होने के मायने सिखाए हैं।
पढ़ाई पूरी करने के बाद भुवनेश्वर में पेशेवर प्रशिक्षण के वक्त भी मुझे आर्थिक दिक्कतें हुईं, जब तक मेरी मुलाकात फिल्म निर्माता बिरेन दास से नहीं हुई। बिरेन ने न सिर्फ मेरी मदद की, बल्कि अगले एक साल तक मुझे अपने निर्देशन में प्रशिक्षण दिया। उन्होंने मुझे अपने घर में रहने की जगह दी। उनकी बदौलत ही मैं वह आत्मविश्वास हासिल कर सकी, जिसकी जरूरत एक पत्रकार बनने के लिए होती है। लोगों को यदि पता चल जाए कि मैं एक आदिवासी हूं, तो उनका मेरे प्रति नजरिया बदल जाता है। लेकिन मेरे अग्रजों ने मुझे एक आदिवासी होने के मायने सिखाए हैं।
मैंने न सर्फ मीडिया की ताकत समझी, बल्कि अपनी आदिवासी संस्कृति का भी गहन अध्ययन किया। इसी की बदौलत मैं अपने समुदाय के लिए काम करने को प्रेरित हुई। मैं भुवनेश्वर से करीब सात सौ किलोमीटर दूर मलकानगिरी जिले से रिपोर्टिंग करती हूं, जो अब तक मीडिया की नजर में उस तरह नहीं आया, जैसा आना चाहिए था। स्थानीय समुदाय का हिस्सा होने के कारण मुझे यात्रा और किसी भी प्रकार के संवाद में कोई परेशानी नहीं होती।
काम की शुरुआात में मेरे पास दूसरे पत्रकारों की तरह खुद का लैपटॉप या कैमरा नहीं था, फिर भी मैं अपना काम भली-भांति करती रही। कई मर्तबा मुझे पुलिस और जांच एजेंसियों द्वारा शक भरी निगाहों से देखा जाता है। उन्हें लगता है कि मैं माओवादियों की हितैषी हूं। पर मैं तो उस समाज की आवाज बनने का काम कर रही हूं, जिसे अब तक उसका हक नहीं मिल सका है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
काम की शुरुआात में मेरे पास दूसरे पत्रकारों की तरह खुद का लैपटॉप या कैमरा नहीं था, फिर भी मैं अपना काम भली-भांति करती रही। कई मर्तबा मुझे पुलिस और जांच एजेंसियों द्वारा शक भरी निगाहों से देखा जाता है। उन्हें लगता है कि मैं माओवादियों की हितैषी हूं। पर मैं तो उस समाज की आवाज बनने का काम कर रही हूं, जिसे अब तक उसका हक नहीं मिल सका है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
कमेंट
कमेंट X