एक महिला जिन्होंने दलित महिलाओं को दी बराबरी की 'प्रेरणा'
पटना के एक रोमन कैथोलिक गर्ल्स स्कूल की बहनों के साथ काम करने के लिए किशोरावस्था में ही मैं अपने गृह राज्य केरल के कोट्टायम से बिहार आकर बस गई थी। पटना में हिंदी और अंग्रेजी सीखने के बाद मैंने अध्यापन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। फिर अगले कई वर्षों तक मैंने उसी स्कूल में पढ़ाने का काम किया।
पटना में रहते हुए मैंने जाना कि एक महादलित जाति होती है, जिन्हें तमाम तरह के सामाजिक भेदभावों का सामना करना पड़ता है। केवल जन्म के कारण उन्हें अस्पृश्य माना जाता है। उनका उठना-बैठना, यहां तक कि सांस लेना तक दूसरों द्वारा प्रभावित होता है। समाज की इस सच्चाई से वास्ता पड़ने पर मुझे बहुत दुख हुआ। मैंने इससे पहले इस तरह के समाजिक भेदभाव की कल्पना तक नहीं की थी।
मैंने अपनी आरामदायक जीवन शैली त्यागकर उस समुदाय की बेहतरी के लिए काम करने का फैसला किया। मैं मुसहर जाति के टोले में रहने लगी। मैंने बहुत करीब से उनकी समस्याओं का अुनभव किया। लड़कियों की बदहाल हालत इनकी कई परेशानियों में से एक प्रमुख समस्या थी। खेतों में काम करने के अलावा लड़कियां घरों में काम करती थीं। यौन उत्पीड़न इनकी नियति का हिस्सा बन चुका था। उनके बाल विवाह की असल वजह भी यही थी।
मैंने ऐसी लड़कियों को शिक्षित करके संविधान में वर्णित उनके अधिकारों के बारे में जागरूक कर उनके भीतर की हीनता ग्रंथि को खत्म करने को लक्ष्य बनाया। दलित महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए मैंने 1987 में नारी गुंजन नाम से एक गैर लाभकारी संस्था की शुरुआत की। अट्ठारह साल तक तमाम तरह के सामाजिक काम करने के बाद 2005 में मैंने पटना के दानापुर में प्रेरणा नाम से ऐसी लड़कियों के लिए आवासीय स्कूल की स्थापना की, जो पढ़ने के बजाय खेतों में मजदूरी करती हैं।
स्कूल खोलने का मेरा मकसद उन सभी लड़कियों को खेतों से निकालकर किताबों के करीब लाना था। शुरुआती परेशानियों के बाद सौ से ज्यादा लड़कियां प्रेरणा का हिस्सा बनीं। ये लड़कियां शिक्षित हों और एक उदाहरण बनकर अपने समाज की दूसरी महिलाओं को प्रेरित भी कर सकें, इसके लिए मैं हर दिन मेहनत करती। लेकिन मेरे लिए उनकी संख्या पर्याप्त नहीं थी। मैं चाहती थी कि राज्य की वे सभी लड़कियां पढ़ें, जो कहीं भैंसों को चारा खिलाती हैं या फिर जंगल में लकड़ियां बीनती हैं।
प्रेरणा की कहानी राज्य के मुख्यमंत्री तक पहुंची, जिसके बाद प्रेरणा का द्वितीय संस्करण गया की भूमि पर अस्तित्व में आया। मेरा उत्साह बढ़ता गया। मैं सौ किलोमीटर के दायरे में सभी मुसहर टोलों में जाकर उन तक अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने का संदेश पहुंचाती रही। नतीजा यह निकला कि आज नारी गुंजन बैनर के तले प्रेरणा स्कूलों में तीन हजार से ज्यादा छात्राओं का नामांकन हो चुका है। छात्राओं को उनके घर पर कोचिंग दिलाने के साथ हम उन्हें एएनएम कोर्स का प्रशिक्षण भी दिलाते हैं। मैं मुसहर समुदाय के सभी बच्चों को खेलों की ओर उन्मुख करने का भी प्रयास कर रही हूं।
मेरी संस्था बिहार के पांच जिलों में 850 स्वयं सहायता समूहों का गठन कर चुकी है। महिलाओं को बराबरी का एहसास कराने के लिए मैंने नारी गुंजन महिला बैंड नाम से एक अनूठा प्रयोग किया है। इस बैंड के जरिये मैं इस मिथक को तोड़ना चाहती थी कि केवल पुरुष ही बैंड बना सकते हैं। मैं जब तक काम करने में सक्षम हूं, तब तक बदलाव के लिए अपनी यात्रा जारी रखूंगी।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
कमेंट
कमेंट X