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Success Story: उधारी के कपड़े पहन कर छू लिया आसमान

Thu, 18 Dec 2014 03:19 PM IST
अंशुल डांगी/देहरादून।
अंशुल डांगी/देहरादून। Updated Thu, 18 Dec 2014 03:19 PM IST
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success story of tashi nugshi sister everest mission
विश्व की सबसे ऊंची सात पर्वत चोटी फतह करने के तुरंत बाद ताशी-नुंग्शी अब साउथ पोल के मिशन पर रवाना होंगी। 19 दिसंबर से शुरू हो रहे मिशन को दोनों बहनों ने ‘ऊंचाइयों से आगे दुनिया की हद तक...’ नाम दिया है। इसके जरिये वे दुनिया को बालिकाओं के सशक्त होने का संदेश देना चाहती हैं।
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यह मिशन महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी प्रायोजित (स्पांसर) कर रही है। खास बात यह है कि 29 दिसंबर को खत्म होने वाले इस मिशन के लिए दोनों बहनें 120 किलोमीटर तक स्कीइंग करेंगी। बिना किसी पोर्टर की मदद के वे खुद 70 किलो वजन उठाकर जाएंगी। इस दौरान अत्यधिक वायु दबाव और 60 से 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली बर्फीली हवाओं का सामना उन्हें करना होगा।
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माइनस 40 डिग्री तापमान भी ठंडा नहीं कर पाया जोश
-40 (माइनस 40) डिग्री तापमान में ताशी-नुंग्शी ने अंटार्कटिका के स्थानीय समय के अनुसार 16 दिसंबर की शाम चार बजे (भारतीय समयानुसार 17 दिसंबर की रात 12:30 बजे) माउंट विनसन फतह की। थाली बजाकर खुशी का इजहार करने के साथ ही दोनों बहनों ने चोटी पर तिरंगा फहराया। दोनों बहनों का लक्ष्य 18 दिसंबर (बृहस्पतिवार) की शाम तक बेस कैंप पर पहुंच जाएंगी।
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मां थी पर्वतारोहण के खिलाफ
‘क्या? एवरेस्ट पर चढ़ना है। बेटा सपना अच्छा है, लेकिन आप तो प्रशिक्षक का कोर्स कर रहे हो, उसी पर फोकस करो।’ चार साल पूर्व ताशी-नुंग्शी ने जब पहली बार माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने की बात कही थी तो पिता वीके मलिक ने यही जवाब दिया था। मां अंजू मलिक तो पर्वतारोहण के सख्त खिलाफ थीं, लेकिन बेटियों की जिद के आगे दोनों झुक गए। और सिर्फ वही नहीं झुके, जुडवां बहनों के मजबूत इरादों और जज्बे के दम पर एवरेस्ट समेत दुनिया की सात सबसे ऊंची चोटियों को कदमों में झुका दिया। बेटियों की कामयाबी ने मां-पिता का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है।

हॉकी और एथलेटिक्स खिलाड़ी ताशी-नुंग्शी के पर्वतारोहण की शुरुआत वर्ष 2009 में उत्तरकाशी स्थित नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (एनआईएम या निम) में बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स के दौरान हुई। पिता कर्नल वीके मलिक (सेवानिवृत्त) ने बताया कि दोनों बहनों ने कहा कि हमें एवरेस्ट चढ़ना है तो मैं चौंक गया। लगा कि दोनों छोटी हैं। इसीलिए पहले कोर्स पूरा करने पर ध्यान देने के लिए कहा। मां अंजू थापा मलिक ने इनकार कर दिया। वर्ष 2010 में दोनों ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्कीइंग एंड माउंटेनियरिंग गुलमर्ग से स्कीइंग का कोर्स किया। 2012 में दयारा ग्लेशियर में 10 दिन का कोर्स किया और फिर उत्तरकाशी में सर्च एंड रेस्क्यू एडवांस के बाद प्रशिक्षक के कोर्स के लिए एडमिशन लिया। वर्ष 2012 में दोनों ने फिर एवरेस्ट चढ़ने की जिद की, लेकिन मां नहीं मानी।
इस बीच माता-पिता दोनों बहनों को कोर्स के लिए उत्तरकाशी छोड़ने गए तो एक प्रशिक्षक उन्हें देखते ही गेट पर लेने पहुंच गए। संस्थान के शिक्षक, प्रधानाचार्य ने काफी तारीफ की। इसके बाद मां अंजू ने एवरेस्ट मिशन के लिए हामी भरी और अक्तूबर 2012 से मिशन शुरू हो गया।

मां बनाने लगी गोंद के लड्डू
कभी लड़की समझकर पहाड़ चढ़ने से मना करने वाली अंजू बेटियों का मिशन पूरा होने के बाद खुशी रोक नहीं पा रहीं। दोनों के लिए गोंद के लड्डू, पिन्नी बनाना शुरू कर दिया है। अंजू ने कहा कि दोनों बहुत दुबली थीं। उत्तरकाशी में निम से जब भी छुट्टी पर घर आती, दोनों के हाथ सूजे हुए होते थे। दोनों बहुत कमजोर थीं। डर लगता था कि वजन कैसे उठा सकेंगी, इसीलिए मना करती थी। लेकिन दोनों ने जिद की और अपना सपना आज पूरा कर लिया। नानी विद्या थापा भावुक होते हुए बोली, बेटा-बेटी में कोई अंतर नहीं होता। बताया कि बच्चियों के एवरेस्ट पर चढ़ने के दौरान डर लगा था। हर दिन मंदिर में पूजा करती थीं, लेकिन इसके बाद कोई डर नहीं रहा।


उधारी के कपड़ों से सफर हुआ शुरू
ताशी-नुंग्शी के एवरेस्ट चढ़ने के लिए कपड़े और अन्य उपकरण निम ने ही दिए थे। उधारी के कपड़े पहनकर और उपकरणों के साथ पहली बार में ही दोनों बहनों से एवरेस्ट की चढ़ाई की। इसके बाद इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन नई दिल्ली से कपड़े और उपकरण किराये पर लेकर दोनों बहनों ने सफर जारी रखा।
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