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'मेरे रिक्शे की उस सवारी ने मुझे लेखक बना दिया'

मनोरंजन ब्यापारी Updated Wed, 21 Feb 2018 08:56 PM IST
Manoranjan Byapari
Manoranjan Byapari
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उन दिनों कोलकाता की सड़कों पर मैं रिक्शा खींचता था। उस दिन भी एक कॉलेज के पास किसी सवारी के इंतजार में खड़ा था। साड़ी पहने एक महिला आई और मेरे रिक्शा पर बैठ गई। कॉलेज नजदीक में ही था, तो मुझे पूरी उम्मीद थी कि वह महिला कोई प्रोफेसर होगी। रास्ते के सफर में महिला से मेरी कुछ बातचीत हुई।
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बात आगे बढ़ी, तो हिम्मत करते हुए मैंने उससे एक शब्द का अर्थ जानना चाहा। वह शब्द था- जिजीविषा। दरअसल मैं उपन्यास पढ़ने का शौकीन था और इस शब्द की उलझन किसी उपन्यास की ही देन थी। महिला ने मेरे सवाल का जवाब तो दिया, लेकिन उसके चेहरे पर मेरे सवाल पूछने के पीछे का कारण जानने की उत्सुकता साफ देखी जा सकती थी। उसके पूछने पर मैंने उसे सवाल की वजह बताई और यह भी बताया कि मैं कभी स्कूल नहीं गया, पढ़ना-लिखना खुद से ही सीखा।

वह महिला जब रिक्शे से उतरी, तो उसने मुझसे कहा कि 'यदि तुम अपनी कहानी के बारे में कुछ लिखना चाहते हो, तो तुम्हारा स्वागत है।' यह कहकर उसने मुझे एक कागज के टुकड़े पर अपना नाम और पता लिख कर दिया। मैं अचंभित रहा गया, जब पता चला कि मेरी सवारी कोई सामान्य महिला नहीं, बल्कि प्रख्यात साहित्यकार महाश्वेता देवी थीं।

आश्चर्य होता भी क्यों नहीं, जो महिला सीट पर बैठी थीं, उसी सीट के नीचे उनकी लिखी एक किताब रखी थी, जिसे समय मिलने पर मैं बड़े चाव से पढ़ता था। जब यह बात मैंने उन्हें बताई, तो वह बहुत खुश हुईं। दशकों पहले घटी उस छोटी-सी घटना के बाद मेरी जिंदगी बदल गई।
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