मंजिलें और भी हैं: एक लाख रुपये, फूड ट्रक और पटरी पर जिंदगी
मुझे अपने काम में सबसे ज्यादा खुशी तब हुई, जब महिंद्रा ऐंड महिंद्रा के मालिक आनंद महिंद्रा ने मेरी कहानी से प्रभावित होकर ट्वीट किया और हर संभव मदद का आश्वासन दिया। मैं कर्नाटक के मंगलौर की रहने वाली हूं। मुझे बचपन से खाना बनाने का शौक जरूर था, लेकिन व्यापार में अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि मजबूरी में आई।
वर्ष 2005 में मेरी शादी हुई। मैं काफी खुश थी, घर-परिवार अच्छा था। मेरे पति स्थानीय व्यापार में सक्रिय थे। हमारी जिंदगी ठीक तरह से कट रही थी। यह 2008 की बात है, तब मेरा बच्चा तीन वर्ष का था। मेरे पति मुझसे बोलकर गए कि वह अपने व्यापार के लिए लोन लेने के सिलसिले में बंगलूरू जा रहे हैं, कुछ दिन में लौटेंगे। मैं इंतजार करती रही, पर छह महीने बीतने के बाद भी वह नहीं लौटे। मैंने अपने पति से संपर्क करने की बहुत कोशिश की, पर नाकाम रही।
हमने उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। यहां तक कि उनका मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ था। मुझे समझ आ चुका था कि बच्चे को समाज में पहचान दिलाने के लिए संघर्ष करने का जिम्मा अब मेरा है। चूंकि मैं कई तरह के उत्तरी कन्नड़ खाना बनाना जानती थी, तो फूड कोर्ट खोलने के बारे में सोचने लगी। मैंने थोड़ा-बहुत कर्ज लेकर तकरीबन एक लाख रुपये इकठ्ठा किए। इसके अलावा मेरे पास और कुछ नहीं था, मैं इतने रुपये में न तो कोई दुकान खरीद सकती थी न ही ज्यादा दिन किराये पर दुकान चला सकती थी।
मेरे घर के ठीक सामने महिंद्रा का शोरूम था, मैंने एक दिन विचार किया कि क्यों न एक छोटा ट्रक ले लूं, और उसे ही फूड ट्रक में बदलकर खुद का खाने का व्यापार शुरू करूं। चूंकि पुराना वाहन फाइनेंस पर नहीं निकलता, इसलिए मैंने नया ट्रक लेने के बारे में सोचा जो फाइनेंस पर मिल सकता था। इसलिए मैंने कुछ रुपये सरकार की, 'महिला रोजगार उद्योग योजना' के अंतर्गत लोन लिया और अपने पास बचे हुए सोने के गहने बेच कर रकम जुटाई।
मुझे यह बिल्कुल नहीं पता था कि फूड ट्रक चलेगा या नहीं, लेकिन मैंने बस हिम्मत न हारते हुए उसी पर खाना बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे लोग यहां आने लगे। शुरुआत में तो इससे मुझे पांच-छह सौ रुपये की बचत होती थी, पर जबसे आनंद महिंद्रा ने मेरे लिए ट्वीट किया, तबसे मेरे फूड ट्रक पर ग्राहकों में वृद्धि हुई है, लोग मदद के लिए भी आगे आ रहे हैं। ज्यादातर ग्राहक दक्षिण कन्नड़ के ही होते हैं, जिनमें डॉक्टर, छात्र और नौकरीपेशा लोग घर का खाना खाने आते हैं।
कुछ छात्रों ने मेरे फूड ट्रक को गूगल मैप्स पर डाल दिया है, जिससे इसे खोजने में आसानी रहती है। मेरा भाई सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था, मुझे फूड ट्रक पर एक आदमी की जरूरत थी, तो उसने अपनी नौकरी छोड़ दी है और अब मेरी मदद करता है। मुझे मेरी जिंदगी में उम्मीदें मिली हैं। यहां से होने वाली आमदनी से मैं अपना परिवार चला रही हूं। मैं सभी महिलाओं को यह बताना चाहती हूं कि जिंदगी उतार-चढ़ाव का नाम है।
बस हिम्मत न हारने की और आगे बढ़ते जाने की जरूरत है। अगर आप जिंदगी में मुश्किलों को पार करना सीख जाते हैं, तो पूरी दुनिया आपके लिए लड़ाई लड़ने को तैयार हो सकती है। आप सबमें अपार शक्ति मौजूद है, आपकी खुद की एक पहचान है, जरूरत है तो बस खुद को पहचानने की, फिर कोई भी मुकाम आपसे दूर नहीं।
(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
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