ढाई सौ गरीब भूमिहीन परिवारों के लिए बने मसीहा, खुद किराये के मकान में करते हैं बसेरा
प्रति व्यक्ति करीब पौने चार सौ वर्ग फुट भूभाग के दस्तावेजों को जिस दिन मैंने दस लोगों के नाम किया, उस दिन मानो मैं अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी से निवृत्त हो गया। यह पूर्णाहुति थी, उस यज्ञ सरीखी प्रक्रिया की, जो मैंने 2.3 एकड़ जमीन दान करने के लिए शुरू की थी। मैंने अपनी जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े श्रमिकों, विधवाओं और दूसरे गरीब जरूरतमंदों को दान की है।
मैं ओडिशा के कोरापुट जिले के जैपोर कस्बे में रहता हूं। मैं लोहे के दरवाजे और खिड़कियां बनाने वाला एक साठ वर्षीय कारीगर हूं। पंद्रह लोगों के अपने परिवार के साथ भले ही मैं किराये के घर में रहता हूं, लेकिन मैंने अपनी सारी जमीन भूमिहीन ग्रामीणों को दान कर दी है। इस काम की शुरुआत 1997 में हुई थी। उस वक्त मैं एक ऐसे परिवार का मुखिया था, जिसे गरीब इलाके में आर्थिक रूप से संपन्न कहा जा सकता था। मैंने अपने घर के पास एक शिव मंदिर बनवाया था।
एक दिन यों ही उसी मंदिर के पुजारी ने मुझसे कहा, मंदिर बनवाने की बात तो ठीक है, मगर यदि तुम सचमुच ईश्वर को खुश करना चाहते हो और उनका आशीर्वाद चाहते हो, तो अपने आसपास के गरीबों की मदद करो। मदद किस प्रकार की जा सकती है, पुजारी ने इसके लिए भी सलाह दी। उसने कहा कि कस्बे में अधिकतर गरीब भूमिहीन हैं। रहने के लिए उनके पास कोई निजी ठिकाना नहीं है।
स्थायी रूप से उनकी यह समस्या खत्म करने के लिए उन्हें नगद सहायता के बजाय जमीन दान करना बेहतर रहेगा। मैंने उसकी बात मान कर लाखों रुपयों की अपनी समस्त बचत खर्च करके पास में ही 2.3 एकड़ जमीन खरीदी। तब तक तो सब ठीक था, लेकिन कुछ ही वक्त बाद मेरा बुरा समय शुरू हो गया। पैसों की तंगी के कारण मुझे वर्कशॉप समेत अपना घर तक बेचना पड़ गया। मैंने किराये के घर में रहना शुरू कर दिया। लेकिन मुफलिसी के दौर में भी जरूरतमंदों को जमीन दान करने के अपने संकल्प से मैं डिगा नहीं।
दो साल पहले मैंने सरकार से अपने लिए लीज पर जमीन लेने की दरख्वास्त की है, जो कि अभी तक लंबित है। बावजूद इसके मैंने अपना कारखाना लगाने के लिए उस जमीन के किसी भी हिस्से का प्रयोग नहीं किया, जो मैंने दान देने के लिए खरीदी थी। यही कारण है कि मैं हर महीने पंद्रह हजार रुपये बतौर किराया खर्च करता हूं।
मैं बचपन से ही रामायण, महाभारत, भागवत और पुराणों की शिक्षाओं को सुनते हुए बड़ा हुआ हूं। मुझे लगता है कि मैंने कुछ नहीं किया है। यह ईश्वर की इच्छा थी कि गरीबों को जमीन मिल जाए। मैं तो बस एक जरिया बना। कई मौके आए, जब रियल एस्टेट के कारोबार से जुड़े विभिन्न लोगों ने मेरी जमीन की कीमत करोड़ों में लगाई। पर पूरी दृढ़ता से हर बार उन्हें मेरा जवाब न में ही मिला।
आज मैं बहुत खुश हूं कि बीस साल पहले किए गए वायदे को मैंने पूरा करके दिखाया है। थोड़ा कष्ट होता है कि एक बड़े परिवार को किराये के घर में पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती है, लेकिन यह कष्ट उन ढाई सौ परिवारों के दुख के मुकाबले कुछ भी नहीं है, जिसका वे जमीन न होने के वक्त सामना करते थे।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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