मंजिलें और भी हैं: कभी टीवी ठीक करता था, अब वर्जीनिया में पढ़ता हूं
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मां मेरे जीवन की एकमात्र ऐसी शख्सीयत हैं, जो मुझे हर दिन जीने के लिए प्रेरित करती हैं। मैं कभी उनका कर्ज नहीं चुका सकता। उन्होंने मुझे प्रेरित किया, तो मैंने कभी हार नहीं मानी। मैं मुंबई की कुर्ला बस्ती का रहने वाला हूं। मेरी मां लिपिक की नौकरी करती थीं, कुछ मतभेदों के चलते मेरे जन्म के बाद ही मेरी मां को घर से निकाल दिया गया।
बाद में पापा ने उनको तलाक दे दिया। मुझे पालने और तलाक की कार्रवाई पूरी करने के चक्कर में मां को नौकरी भी छोड़नी पड़ी। मेरे घर के हालात इस कदर खराब थे कि कई रातें मैंने और मां ने वड़ा-पाव, समोसा या ब्रेड खाकर गुजारी हैं। बाद में कुर्ला के एक स्थानीय ट्रस्ट ने हमें मदद देनी शुरू की। वहां से हमें राशन और पहनने के कपड़े मिल जाते थे। मैंने उन कपड़ों को अब तक संभाल कर रखा है। मां ने मेरा दाखिला स्कूल में करवा दिया था, पर उनकी नौकरी छूटने के बाद फीस भरने के लाले पड़ गए। रिश्तेदारों ने भी हमारी ओर ध्यान देना बंद कर दिया। मेरी स्कूल फीस भरने के लिए मां विभिन्न संगठनों से संपर्क करती थीं और मदद मांगती थीं।
कई बार ऐसा हुआ कि स्थानीय स्कूल ने मेरा परीक्षा परिणाम तब तक जारी नहीं किया, जब तक कि मैंने स्कूल की फीस नहीं भर दी। उम्र बढ़ने के साथ मैंने छोटे-मोटे काम करने शुरू कर दिए। अपनी स्कूल फीस निकालने के लिए मैंने एक स्थानीय टीवी रिपेयरिंग की दुकान में काम किया। इसके बाद मैंने कुछ दिन कपड़े की दुकान पर और कई छात्रों के असाइनमेंट का काम भी किया। बाद में एक संस्था से मिले सहयोग से मैंने शिक्षा ऋण लेकर केजे सोमैया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया।
कॉलेज में मैंने रोबोटिक्स में तीन राष्ट्रीय और चार राज्य-स्तरीय पुरस्कार जीते। इसके बाद मुझे लार्सन एंड टूब्रो में इंटर्नशिप करने का मौका मिल गया। मैं आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने के बारे में सोच रहा था, पर मुझे ऋण चुकाने, अपने घर का नवीनीकरण करने और अमेरिका जाने के लिए अपनी टिकट का भुगतान करने के साथ पॉकेट मनी के लिए रुपयों की आवश्यकता थी। पढ़ाई के साथ घर का खर्च चलाने के लिए मैंने विदेशी छात्रों को ऑनलाइन कोचिंग देना शुरू किया।
इन छात्रों को पढ़ाना मेरे लिए अलग तरह का अनुभव था। चूंकि पहले मैं कोचिंग पढ़ा चुका था, तो वहां का अनुभव मेरे काम आया। बाद में कोचिंग के लिए मेरे पास कई बच्चों के आवेदन आए। कोचिंग से होने वाली कमाई से मैंने अपने सारे कर्ज चुका दिए। कॉलेज के बाद, मैंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) में प्रवेश लिया, जहां शोधार्थी के रूप में मुझे मासिक तीस हजार रुपये मिलते थे।
टीआईएफआर में पढ़ाई के दौरान मैंने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में दो शोध पत्र प्रकाशित किए। इन पत्रों ने वर्जीनिया विश्वविद्यालय का ध्यान आकर्षित किया, जहां से स्नातक अनुसंधान सहायक के रूप में काम करने का मेरे पास ऑफर आया। इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मुझे एहसास हुआ कि मेरी दिलचस्पी नैनो स्केल भौतिकी में है। मैंने अपनी इंजीनियरिंग के बाद के शोध के लिए जो विषय चुना, वह भी नैनो स्केल भौतिकी से संबंधित रहा है।
अब मैं शोध कर रहा हूं कि नैनो स्केल डिवाइस और अन्य सामान कैसे बनाए जाएं। पीएचडी के बाद, मैं नौकरी करना चाहता हूं। अपने देश में मैं एक कंपनी की स्थापना करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि भारत प्रौद्योगिकी का आत्मनिर्भर विनिर्माण केंद्र बने। जरूरतमंदों और वंचित विद्यार्थियों की मदद करने के बारे में भी मैंने सोच रखा है।
(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
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