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सरकार भी नहीं कर पाई वो काम जो एक पत्रकार ने कर दिखाया

Tue, 17 May 2016 02:39 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Tue, 17 May 2016 02:39 AM IST
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Housing Society Residents Give Old Cycles to Kids Who Walk a Long Way to School
गरीब बच्चों के लिए अनूठी मुहिम - फोटो : facebook

उनके घर स्कूल से दूर थे। स्कूल दूरदराज के गांवों में थे। सीजन कोई भी हो 3 से 7 किलोमीटर पैदल चलकर उन्हें स्कूल जाना पड़ता था। उन बच्चों के हालात को कोई देख रहा था। उन नन्हें पैरों की किलोमीटर लंबी पदचाप वो सुन रहा था। वो बेचैन हो उठा, उसने ठान लिया कि चाहें कुछ भी हो जाए मुफलिसी और किस्मत के मारे बच्चों के लिए कुछ न कुछ जरूर करेगा। 

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एक दिन पॉश इलाके की हाउसिंग सोसायटी में खराब पड़ी साइकिलों को देखकर उसके मन में विचार कौंधा।  और एक विचार, एक प्रयास, एक मुहिम ने देखते ही देखते सैकड़ों बच्चों की जिंदगी में खुशियां और सहूलियत भर दी। 
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कहानी महाराष्ट्र की है। एक स्वतंत्र पत्रकार के नेक इरादों और उसकी जी तोड़ मेहनत से मिली सफलता की है। आगे की स्लाइड में पढ़ें पूरी सक्सेस स्टोरी।

रंग लाई साइकिल रीसाइकिल मुहिम, जरूरतमंदों के खिले चेहरे

Housing Society Residents Give Old Cycles to Kids Who Walk a Long Way to School
एक पत्रकार के विचार की सफलता की कहानी - फोटो : thebetterindia

स्वतंत्र और स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट के तौर पर ख्याति प्राप्त सुनंदन लेले सचिन की 75 सेचुरी को अपनी आंखों से देख चुके हैं। बीबीसी और जी जैसे संस्थानों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर सेवाएं देते रहे हैं। एक दिन महाराष्ट्र के फुटहिल इलाके के विंझर गांव में एक स्कूल के बच्चों को देख उनका दिल कचोट गया। 

ये इलाके का इकलौता स्कूल था। स्कूल में 500 बच्चे थे। गांवों के बच्चे 3 से 7 किलोमीटर तक का लंबा सफर पैदल तय करके स्कूल पढ़ने आते थे। 

सुनंदन की मानें को बच्चे इतने गरीब घरों से थे कि उनके पास स्कूल पहुंचने के लिए बस का किराया तक नहीं था।

सुनंदन ने अपनी पत्नी और दो अन्य दोस्तों से मिलकर उन बच्चों की मदद के लिए एक प्लान बनाया। सुनंदन हाउसिंग सोसायटी के तमाम घरों में गए और लोगों को समझाया कि उनके बच्चों की पुरानी साइकिलें पड़ी-पड़ी जंग खा रही है, क्यों न उनको रिपेयर कर जरूरतमंद बच्चों को बांट दिया जाए।

आइडिया काम कर गया। सामाज कल्याण के लिए लोग उन पुरानी साइकिलों को दान करने के लिए राजी हो गए। सबने मिलकर  मुहिम शुरू की। इस मुहिम का नाम 'साइकिल रीसाइकिल' रखा गया। मुहिम से जुड़ी निवेदिता की मानें तो हम सभी एक ही समाज का हिस्सा हैं। 

लोग इस मुहिम से जुड़ते ही जा रहे है। मार्च मे इस संगठन ने 50 साइकिलें बच्चों को बांटी। आज साइकिल रीसाइकिल टीम रईस और गरीब लोगों के बीच तमाम खाईयों को पाटने की कोशिश कर रही है।

स्टोरी सोर्स-दबेटरइंडिया

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