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'मुझे देखकर ही मेरे गांव वालों ने अपनी लड़कियों को स्कूल भेजना शुरू किया था'

Sat, 17 Mar 2018 12:37 PM IST
बिद्या देवी भंडारी
बिद्या देवी भंडारी Updated Sat, 17 Mar 2018 12:37 PM IST
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biography President of Nepal Bidhya Devi Bhandari based on interview
Nepal President Bidya Devi Bhandari

जब मैं कैंपस (उच्च शिक्षा) में पढ़ रही थी, उस वक्त राजधानी काठमांडू से शुरू हुआ एक छात्र आंदोलन पूरे देश में फैल चुका था। उस वक्त मैंने अपने कैंपस से चंदा इकट्ठा करके उसे काठमांडू भेजा था। यह राजनीति में मेरी पहली भागीदारी थी।

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मेरा जन्म 1961 में पूर्वी नेपाल के पहाड़ी जिले भोजपुर के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मेरे पिता स्थानीय हाई स्कूल के हेडमास्टर थे। चौधरी जैसी छवि वाले मेरे दादा जी समाज में अच्छी पैठ रखते थे। अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण बचपन में मुझे कभी लड़की होने के नाते किसी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा।
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यह मेरे लिए सौभाग्य की बात थी, क्योंकि उस दौर में नेपाल में ऐसा होना सामान्य बात नहीं थी। यह मेरे दादा जी के स्नेह का ही परिणाम था कि मैं अपने परिवार की पहली मैट्रिक पास महिला बनी। इसमें कोई शक नहीं कि मुझे देखकर ही मेरे गांव वालों ने अपनी लड़कियों को स्कूल भेजना शुरू किया था।

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जब वाम विचारधारा से प्रभावित हुई

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मेरा परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था, लेकिन गांव के दूसरे गरीबों के प्रति मैं हमेशा से संवेदनशील रही। मैं जब भी ऐसे लोगों को देखती, जो पैसे, दवा और पुराने कपड़ों की भीख मांगते थे, तो मैं यही सोचती कि समाज में ऐसी असमानता की असल वजह आखिर क्या है? जब मैंने अपने एक रिश्तेदार के बारे में सुना कि वह किसी ऐसी क्रांति का समर्थन कर रहे हैं, जो सभी सामाजिक वर्गों की बुनियादी जरूरतों के हक की वकालत करती है, तो मैं वाम दर्शन के करीब आई।

बहुत कम उम्र से ही मैं सामंतवादी जमीदारों के खिलाफ लोगों के बीच पर्चे बांटने लगी थी। हालांकि मैं जिन लोगों के खिलाफ थी, उनमें कहीं न कहीं मेरे दादा जी को भी शामिल किया जा सकता था, लेकिन उन्होंने कभी मुझे कोई काम करने से मना नहीं किया। उनके इसी व्यवहार ने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

पति की राजनीतिक विरासत संभाली
शुरू से ही मैं अपने घर में दादा जी और चाचा-ताउओं के बीच होनी वाली राजनीतिक बातचीत को ध्यान से सुनती थी। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी-लेनिनवादी के एक छात्र संगठन से जुड़ने के साथ मेरे राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई। मेरे बारे में तब तक बहुत कम लोगों को पता था, जब तक मेरा विवाह नेपाल के नामी नेताओं की फेहरिस्त में शामिल मदन भंडारी से नहीं हुआ था।

आसान नहीं रहा महिला मंत्री होना

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दुर्भाग्यवश विवाह के कुछ ही वर्षों के भीतर एक कार दुर्घटना में उनका देहांत हो गया। पति की मृत्यु के बाद मैंने उनकी राजनीतिक विरासत संभाली। तमाम दक्षिण एशियाई देशों में प्रचलित आम धारणाओं की तरह नेपाल में भी रूढ़िवादियों को एक विधवा का इस तरह काम करना अच्छा नहीं लगा। मैंने पति की मृत्यु के कारण रिक्त हुई संसदीय सीट पर एक वर्ष पश्चात हुआ चुनाव न सिर्फ लड़ा, बल्कि जीता भी।

सांसद बनने के तीन साल बाद देश की गठबंधन सरकार में मुझे जनसंख्या एवं पर्यावरण मंत्री बनने का मौका मिला। मैं अपने मंत्रालय से खुश थी, पर मुझे काम करने में बहुत दिक्कत हो रही थी, क्योंकि एक महिला मंत्री होने के नाते मुझे अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा था। देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनने के वक्त ही नहीं, बल्कि जब मैं अपनी पार्टी के तीन उपाध्यक्षों में से एक चुनी गई, तब भी कई पुरुषों ने मेरा विरोध किया था।

-दूसरी बार चुनी गई नेपाल की प्रथम महिला राष्ट्रपति के साक्षात्कारों पर आधारित।
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