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मानसिक रूप से बीमार एक महिला, वर्षों तक दर-दर भटकने के बाद बदल दी अपनी किस्मत

बद्दुला मंगा चिरम्मा Updated Thu, 08 Mar 2018 04:32 AM IST
Baddula Manga Chiramma
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मैं किसी मानसिक बीमारी का शिकार थी। मैं किसी से ढंग से बात नहीं करती थी और अधिकतर वक्त सोती रहती थी। गुस्से में किसी को भी नुकसान पहुंचाती। घर वालों ने भी बीमारी का इलाज करने के बजाय बहुत कम उम्र में मेरी शादी कर दी। ससुराल गई, तो मेरे पति ने भी मुझे अस्वीकार कर दिया। मेरी हरकतों के कारण वह मुझे मारने-पीटने लगा और एक दिन तलाक देकर मुझे मायके छोड़ गया। तलाकशुदा किसी सामान्य महिला को मायके में इज्जत मिलनी मुश्किल होती है, मैं तो मानसिक रूप से बीमार भी थी।
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बीमारी के बावजूद मैं परिवार के तिरस्कार भरे रवैये को समझती थी। नतीजतन तेलंगाना के एक गांव में स्थित अपना घर मैंने छोड़ने का फैसला कर लिया। वर्षों तक देश भर में पागलों की तरह जीवन बिताते हुए, समाज के तमाम जुल्मों सितम का सामना करते हुए करीब आठ साल पहले मैं बंगाल के 24 परगना जिले में एक एनजीओ की निगाह में आई। यह एनजीओ मेरी जैसी समाज द्वारा परित्यक्त महिलाओं को मुख्यधारा में लाने का काम करता है।


एनजीओ की मदद से मेरा एक मनोचिकत्सक की निगरानी में लगभग दो साल तक इलाज चला। बंगाल की धरती पर मैं धीरे-धीरे ठीक हो रही थी। इस बीच एनजीओ कर्मियों ने मेरे परिवार के बारे में पता लगा लिया। मुझे लेकर वे मेरे गांव पहुंचे। अभी दो महीने ही बीते थे कि गांव में मेरी तबीयत फिर से बिगड़ने लगी। कारण यह था कि मेरे प्रति घरवालों के उदासीन रवैये में कोई तब्दीली नहीं आई थी। जो ख्याल मेरा रखा जाना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। इस पूरी प्रक्रिया का हासिल यह निकला कि बहुत जल्द मुझे दोबारा बंगाल भेज दिया गया। मैं भी दोबारा बंगाल पहुंचकर खुश थी।
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