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UGC Bill Row: सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी रेगुलेशन 2026 पर उठाए चार सवाल, जाति-आधारित भेदभाव पर स्पष्टीकरण मांगा

Fri, 30 Jan 2026 03:03 PM IST
शाहीन परवीन एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: शाहीन परवीन Updated Fri, 30 Jan 2026 03:03 PM IST
सार

UGC: सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर सवाल उठाए हैं और जाति-आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित करने के कारण स्पष्टीकरण मांगा है।

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SC frames 4 questions of law on pleas challenging UGC regulations
सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI

विस्तार

UGC Bill Row: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 के इक्विटी विनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कई जरूरी कानूनी सवाल उठे हैं। कोर्ट ने इन सवालों पर विचार करने के लिए चार मुख्य प्रश्न तैयार किए हैं।

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अदालत ने परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए हाल ही में पारित यूजीसी के समानता संबंधी नियमों पर रोक लगा दी है, यह कहते हुए कि ढांचा "प्रथम दृष्टया अस्पष्ट" है, इसके "बहुत व्यापक परिणाम" हो सकते हैं और अंततः यह समाज को "खतरनाक प्रभाव" के साथ विभाजित कर सकता है।

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UGC विनियम 3 की परिभाषाओं पर विवाद

विनियमन 3(1)(सी) के अनुसार "जाति-आधारित भेदभाव" की परिभाषा में "केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के खिलाफ जाति के आधार पर भेदभाव" का उल्लेख किया गया है। 

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विनियम 3(1)(ई) के अनुसार, "भेदभाव" को अधिक व्यापक रूप से "धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता, या इनमें से किसी के आधार पर किसी भी हितधारक के खिलाफ अनुचित, भिन्न या पक्षपातपूर्ण व्यवहार या ऐसा कोई भी कार्य, चाहे वह स्पष्ट हो या निहित" के रूप में परिभाषित किया गया है।

न्यायालय ने गौर किया कि विनियमों में केवल "भेदभाव" के संबंध में ही उपचारात्मक उपाय दिए गए हैं, जिसमें जाति आधारित भेदभाव भी शामिल है। इस संदर्भ में, न्यायालय ने आश्चर्य व्यक्त किया कि "जाति आधारित भेदभाव" को अलग से क्यों परिभाषित किया गया है। 

न्यायालय ने आगे यह भी बताया कि "जाति-आधारित भेदभाव" की परिभाषा में सबसे पिछड़े वर्ग और अति पिछड़े वर्ग को इंगित नहीं किया गया है। 



न्यायालय की अगली चिंता विनियम 7(d) में प्रयुक्त शब्द "पृथककरण" के संबंध में थी। यह खंड उच्च शिक्षा संस्थानों को निर्देश देता है कि वे यह सुनिश्चित करें कि छात्रावासों, कक्षाओं, मार्गदर्शन समूहों या किसी अन्य शैक्षणिक उद्देश्य के लिए किया गया कोई भी चयन, पृथक्करण या आवंटन पारदर्शी, निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण हो। न्यायालय ने प्रश्न उठाया कि क्या यह कक्षाओं और छात्रावासों में जाति-आधारित पृथक्करण का आदेश है जो भाईचारे की भावना का उल्लंघन करता है।
 
इसके बाद न्यायालय ने नियमों से रैगिंग को बाहर रखे जाने पर सवाल उठाया। याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए न्यायालय ने नियमों को स्थगित रखने का भी आदेश दिया।

न्यायालय ने पूछे ये चार सवाल

(i) क्या यूजीसी के 2026 के इन नियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को अलग से परिभाषित करना सही और जरूरी है, जब इन नियमों में ऐसे भेदभाव से निपटने के लिए कोई अलग प्रक्रिया तय नहीं की गई है? खासकर तब, जब नियम 3(ई) में भेदभाव की एक व्यापक परिभाषा पहले से दी गई है, जिसमें सभी तरह के भेदभाव शामिल हैं।

(ii) क्या इन विवादित नियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को लागू करने से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सबसे पिछड़ी जातियों के लिए बने मौजूदा संवैधानिक और कानूनी वर्गीकरण पर कोई असर पड़ेगा? साथ क्या ये नियम ऐसी अत्यंत पिछड़ी जातियों को भेदभाव और व्यवस्था से जुड़ी कमियों से बचाने के लिए पर्याप्त और प्रभावी सुरक्षा देते हैं?

(iv) क्या विवादित विनियमों के ढांचे में भेदभाव के एक विशिष्ट रूप के रूप में "रैगिंग" शब्द का उल्लेख न करना, जबकि यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2012 में मौजूद है, एक प्रतिगामी और बहिष्करणकारी विधायी चूक है? यदि हां, तो क्या ऐसी चूक न्याय तक पहुंच में विषमता पैदा करके भेदभाव के शिकार लोगों के साथ असमान व्यवहार का उल्लंघन करती है और इस प्रकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है? 

(v) कोई अन्य सहायक प्रश्न जो इन कार्यवाही के दौरान पक्षों द्वारा उत्पन्न हो सकता है या प्रस्तावित किया जा सकता है और जिसके लिए इस न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।

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