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कृष्ण कालीन खेती की शिक्षा देने के लिए संस्कृति विश्वविद्यालय ने खोला इकोलॉजिकल फॉर्मिंग सेंटर

Mon, 31 Dec 2018 02:09 PM IST
kapil sharma Advertorial
Advertorial Published by: kapil sharma Updated Mon, 31 Dec 2018 02:09 PM IST
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Sanskriti university opened ecological farming center
sanskriti university
-परिस्थितिकीय खेती सिखाने को उद्यम मंत्रालय के साथ हुआ करार
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- देशभर के युवा व किसान ले सकेंगे ट्रेनिंग
- पर्यावरण संरक्षण के साथ इस तरह की खेती से सबको होगा लाभ 
-आगरा मंडल का संस्कृति विश्वविद्यालय एक मात्र केंद्र 

उत्तर प्रदेश की टॉप यूनिवर्सिटीज में शुमार संस्कृति विश्वविद्यालय ने अब कृष्णकालीन खेती को लोकप्रिय बनाने का बीड़ा उठाया है। संस्कृति विश्वविद्यालय ने सर्वोत्तम खेती के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन इकोलॉजिकल फॉर्मिंग शुरुआत की है। विश्वविद्यालय का लक्ष्य है, भगवान कृष्ण की लीलाओं से खेती के लिए मिले संदेश को प्रचारित करना। इसे परिस्थितिकीजन्य खेती कहा गया है।
अंग्रेजी में इसे इकोलॉजिकल फॉर्मिंग कहा जाता है। संस्कृति विश्वविद्यालय ने इसी मकसद के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन इकोलॉजिकल फॉर्मिंग की शुरुआत की है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के प्रोसेस एंड प्रोडक्ट्स डेवलमेंट सेंटर (पीपीडीसी) के निर्देशन में यह केन्द्र चलेगा। विश्वविद्यालय में देशभर के छात्र एवं किसान टिकाऊ खेती पर आधारित ट्रेनिंग, सलाह आदि ले सकेंगे। आगरा मंडल में संस्कृति विश्वविद्यालय का यह सेंटर अपनी तरह का पहला केंद्र है। भगवान कृष्ण के बारे में ग्रंथों से मिली जानकारी के हिसाब से देखा जाए तो भगवान कृष्ण ने ब्रज में धरती माता को उपजाऊ बनाने के लिए गोचारण किया, ताकि गायों का गोबर जगह-जगह गिरकर जमीन को उपजाऊ बनाए। यमुना शुद्धीकरण के लिए कालिया नाग को मारा, ताकि उसका जल शुद्ध हो सके।
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वायु प्रदूषण रोकने के लिए ब्योमासुर नामक राक्षस के वध की कथा से इकोलॉजिकल फॉर्मिंग की दिशा में बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। ऐसी खेती जिससे प्राप्त उत्पाद दाने-चारे के रूप में किसी भी जीवधारी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न छोड़ेंगे। जैव विविधता कायम रहे, जैविक खेती पर इस समय सरकार का भी जोर है, लेकिन इससे भी श्रेष्ठ परिस्थितिकीय खेती है। जैविक खेती इसका एक घटक है। परिस्थितिकीय खेती किसी भी क्षेत्र में मौजूद संसाधनों के आधार पर होती है। 
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नवंबर से ही इकोलॉजिकल फॉर्मिंग के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हो जाएंगे। इस एमओयू के लिए एमएसएमई के निदेशक पन्नीरसेल्वम ने विश्वविद्यालय में द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर विवि के कुलाधिपति सचिन गुप्ता, ओएसडी मीनाक्षी शर्मा, कुलपति डॉक्टर  राणा सिंह, उप कुलपति डॉक्टर अभय कुमार, कार्यकारी निदेशक पीसी छाबड़ा आदि मौजूद थे। इस अनुबंध से विश्वविद्यालय के छात्रों को बड़ी खुशी हुई है। अब वे पढ़ाई के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेकर खेती से भी जुड़ सकेंगे। एमएसएमई के सहयोग से यह केंद्र स्थापित होने से स्थानीय और बाहरी छात्र एवं किसान सभी को कई तरह के लाभ होंगे। अनुसंधान, स्किल डेवलपमेंट, ट्रेनिंग प्रोग्राम, वर्कशॉप आदि का आयोजन सतत रूप से होता रहेगा। विशेषज्ञ विश्वविद्यालय एवं एमएसएमई के संयुक्त प्रयासों से श्रेष्ठतम बुलाए जाएंगे।  सर्वांगीण विकास के लिए इस तरह के प्रयोग आवश्यक हैं। इंजीनियरिंग, कृषि एवं विज्ञान के छात्रों को भी इस केंद्र की स्थापना से लाभ होगा। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के माध्यम से ट्रेनिंग लेने वाले लोगों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाएंगे। यह जानना जरूरी है कि किसानों ने खेतों में गोबर आदि की खाद डालना बंद कर दिया है। इससे जमीन मैं मौजूद जीवांश कार्बन बेहद घट गया है। वह दिन दूर नहीं जब जीवांश कार्बन के न रहने से रासायनिक खाद भी खेतों में उपज बढ़ाने का काम नहीं कर सकेगी। इसका असर चारे-दाने की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। कमजोर जमीन से पैदा होने वाले अन्न में भी अनेक तरह के पोषक तत्वों की कमी है। दूध या भोजन के रूप में खाए जाने वाले अनाजों में भी वह ताकत अब नहीं बची है। धनिए में अब सुगंध नहीं रही। दालों में प्रोटीन का प्रतिशत घट रहा है। गेहूं में कार्बोहाइड्रेट जैसे तत्वों की कमी हो रही है। इन सब चीजों का असर मानव, पशु-पक्षी और पर्यावरण सभी पर पड़ रहा है। परिस्थितिकी जन्य खेती इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। यह प्रयास धरती माता के साथ लोगों के बिगड़ते स्वास्थ्य की दिशा में भी सुधार कर सकेगा। उपजाऊ जमीन में उपजा अन्न भी पोषक एवं लाभाकारी होगा। हमारा प्रयास ब्रज और देश के लोगों की सेहत के साथ उनके सर्वांगीण विकास का है।

-Advertorial
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