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Birth Anniversary: टैगोर की रचना बनी 3 देशों के राष्ट्रगान की प्रेरणास्रोत, नोबेल जीतने वाले पहले भारतीय

Fri, 07 May 2021 03:34 PM IST
वर्तिका तोलानी एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: वर्तिका तोलानी Updated Fri, 07 May 2021 03:34 PM IST
सार

श्रीलंका का राष्ट्रगान  ‘श्रीलंका मथा’ भी टैगोर की ही कविताओं से प्रेरणा लेकर बनाया गया है। श्रीलंका मथा के रचनाकार आनंद समरकून ने एक साक्षात्कार में बताया था कि मैं टैगोर स्कूल ऑफ पोएट्री से बेहद प्रभावित था, यही कारण है कि मैंने अपनी कविताओं की रचना टैगोर से प्रभावित होकर की है।

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rabindranath tagore birth anniversary: first non european to win noble prize whose composition chosen by two nations as national anthem
रवींद्रनाथ टैगोर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

‘जन गण मन’, ‘आमान सोनार बांग्ला’ यह भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान हैं।  वर्ष 1861 में जन्मे रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी गई रचनाओं काे इन दोनों देशों का राष्ट्रगान बनाया गया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्रीलंका का राष्ट्रगान  ‘श्रीलंका माथा’ भी टैगोर की ही कविताओं से प्रेरणा लेकर बनाया गया है। दरअसल, श्रीलंका माथा के रचनाकार आनंद समरकून, रवींद्रनाथ टैगोर के साथ शांतिनिकेतन में रहा करते थे। छह महीने बाद जब वह अपने देश गए जब उन्होंने श्रीलंका माथा की रचना की और बाद में यह गीत वहां का राष्ट्रगान बन गया। समरकून ने एक साक्षात्कार में बताया था कि मैं टैगोर स्कूल ऑफ पोएट्री से बेहद प्रभावित था, यही कारण है कि मैंने अपनी कविताओं की रचना टैगोर से प्रभावित होकर की है।  

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लंदन से कानून पढ़े लेकिन नहीं ली डिग्री
कलकत्ता में जन्मे रवींद्रनाथ टैगोर ने सेंट जेवियर स्कूल से अपनी शिक्षा पूरी की थी। तत्पश्चात कानून की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए। लेकिन उन्होंने बीच में ही विश्वविद्यालय छोड़ दिया और भारती लौट आए। वहीं टैगोर के सबसे बड़े भाई द्विजेंद्रनाथ एक दार्शनिक एवं कवि थे और उनके भाई सत्येंद्रनाथ ऑल यूरोपियन-इंडियन सिविल सर्विस के लिए चयनित होने वाले पहले भारतीय बन गए थे।
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1913 में मिला नोबेल पुरस्कार हुआ चोरी
गीतांजलि मूलत: बांग्ला भाषा में लिखी गई थी। लेकिन टैगोर को यह बेहद पसंद थी और वे दूसरों तक भी यह साहित्य पहुंचाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने इसका अंग्रेजी अनुवाद करना प्रारंभ किया। उन्होंने इसमें से कुछ चुनिंदा कविताएं अपने चित्रकार मित्र विलियम रोथेंसटाइन के साथ साझा की। टैगोर ही तरह उन्हें भी यह कविताएं बेहद पसंद आईं और उन्होंने प्रसिद्ध कवि डब्ल्यू.बी.यीट्स को भेज दी। डब्ल्यू.बी.यीट्स इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने पढ़ने के लिए अनुवादित गीतांजलि मंगवाली। धीरे-धीरे यह किताब प्रसिद्ध होने लगी और 1913 में इसके लिए रवींद्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार विश्व-भारती विश्वविद्यालय की सुरक्षा में रखा गया था, लेकिन 2004 में वहां से किसी ने चोरी कर लिया था।

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