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MCI ने दी MBBS के बाद पोस्ट-ग्रेजुएट (PG) डिप्लोमा करने पर सहमति
Fri, 21 Aug 2020 04:39 PM IST
Garima Garg
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: Garima Garg
Updated Fri, 21 Aug 2020 04:39 PM IST
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PG courses after MBBS
- फोटो : सोशल मीडिया
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ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों की कमी को देखते हुए हालिया प्रतिक्रिया में, केंद्र सरकार और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) ने पोस्ट-ग्रेजुएट (PG) डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू करने पर सहमति व्यक्त की है। अब आवेदक MBBS पूरा करने के बाद पोस्ट-ग्रेजुएट (PG) डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू कर सकते हैं। बता दें कि इस संबंध में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (Ministry of Health and Family Welfare) ने 6 अगस्त को एक नोटिफिकेशन भी निकाला था। ध्यान दें कि इस अधिसूचना में नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस (NBE) के तहत आठ मेडिकल स्पेशलिटीज में पीजी डिप्लोमा कोर्स पेश किए गए हैं।
बता दें कि जिन पाठ्यक्रमों में दो वर्षीय डिप्लोमा दिया जा रहा है, उनमें प्रसूति और स्त्री रोग, एनेस्थिसियोलॉजी, पेडियाट्रिक्स, ट्यूबरकुलोसिस और चेस्ट डिजीज, फैमिली मेडिसिन, नेत्र रोग, रेडियोसिसोसिस और ईएनटी शामिल हैं।
हृदय रोग विशेषज्ञ ने कहा है कि हर साल, लगभग 1.7 लाख आवेदक होते हैं जो अपने एमबीबीएस के बाद पीजी सीटों के लिए आवेदन करते हैं। हालांकि, केवल 50,000 स्नातकोत्तर सीटें हैं जो भारतीय चिकित्सा परिषद और राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के अधीन आती हैं। इसका मतलब यह है कि लगभग 1.2 लाख लोगों को स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों को आगे बढ़ाने का मौका नहीं मिलता है। ऐसे में कुछ लोग तो डॉक्टर बनने का सपना ही छोड़ देते हैं। दो वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के माध्यम से 50,000 स्नातकोत्तर की अतिरिक्त सीटों में से कुछ हजारों सीटों की सुविधा दी जाएगी। ऐसे में डॉक्टरों की कमी और डॉक्टरों के करियर को एक नई राह मिलेगी। इस योजना से अगले दो से चार वर्षों में चिकित्सा विशेषज्ञों की कमी की भरपाई की जा सकती है।
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बता दें कि जिन पाठ्यक्रमों में दो वर्षीय डिप्लोमा दिया जा रहा है, उनमें प्रसूति और स्त्री रोग, एनेस्थिसियोलॉजी, पेडियाट्रिक्स, ट्यूबरकुलोसिस और चेस्ट डिजीज, फैमिली मेडिसिन, नेत्र रोग, रेडियोसिसोसिस और ईएनटी शामिल हैं।
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हृदय रोग विशेषज्ञ ने कहा है कि हर साल, लगभग 1.7 लाख आवेदक होते हैं जो अपने एमबीबीएस के बाद पीजी सीटों के लिए आवेदन करते हैं। हालांकि, केवल 50,000 स्नातकोत्तर सीटें हैं जो भारतीय चिकित्सा परिषद और राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के अधीन आती हैं। इसका मतलब यह है कि लगभग 1.2 लाख लोगों को स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों को आगे बढ़ाने का मौका नहीं मिलता है। ऐसे में कुछ लोग तो डॉक्टर बनने का सपना ही छोड़ देते हैं। दो वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के माध्यम से 50,000 स्नातकोत्तर की अतिरिक्त सीटों में से कुछ हजारों सीटों की सुविधा दी जाएगी। ऐसे में डॉक्टरों की कमी और डॉक्टरों के करियर को एक नई राह मिलेगी। इस योजना से अगले दो से चार वर्षों में चिकित्सा विशेषज्ञों की कमी की भरपाई की जा सकती है।
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