झारखंड में स्कूलों की हालत बद्तर: 20 फीसदी में तो सिर्फ एक टीचर ही करा रहे पढ़ाई, टॉयलेट-पीने का पानी तक नहीं
कोरोना महामारी के बाद झारखंड के स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति में गिरावट देखी गई है। यहां तक कि कई स्कूलों में शिक्षक ही नहीं हैं।
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Jharkhand schools: अर्थशास्त्री जीन द्रेज द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना महामारी के बाद झारखंड के स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति उच्च प्राथमिक स्तर पर 58 प्रतिशत और प्राथमिक स्तर पर 68 प्रतिशत तक गिर गई है। राज्य के 16 जिलों के 138 सरकारी स्कूलों में एक सर्वेक्षण के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई। जिसमें कहा गया है कि 53 प्रतिशत शिक्षकों ने स्वीकार किया कि महामारी के बाद स्कूलों के फिर से खुलने के बाद छात्र पढ़ना और लिखना भूल गए हैं।
वंचित और आदिवासी बच्चों पर नहीं दिया ध्यान
द्रेज ने कहा कि सर्वे से पता चला है कि शिक्षा विभाग द्वारा वंचित और आदिवासी बच्चों को छोड़ दिया गया था। कोरोना महामारी के दौरान स्कूल दो साल के लिए बंद कर दिए गए थे, लेकिन उनके लिए कुछ भी नहीं किया गया था। इस अवधि के दौरान ऑनलाइन शिक्षा सिर्फ एक मजाक थी, क्योंकि सरकारी स्कूलों के 87 प्रतिशत छात्रों के पास स्मार्टफोन तक नहीं था।
जेपीईसी की निदेशक ने भी स्वीकारा
झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (JPEC) की निदेशक किरण कुमारी पासी ने न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा को बताया कि महामारी के बाद छात्रों की सीखने की क्षमता और स्कूलों में उपस्थिति में कमी आई है। उन्होंने कहा कि मैं सर्वेक्षण पर टिप्पणी नहीं करना चाहती क्योंकि मैंने इसे नहीं देखा है। लेकिन, यह एक तथ्य है कि महामारी के बाद छात्रों की सीखने की क्षमता और स्कूलों में उपस्थिति में गिरावट आई है। हमने कई पहल की हैं। जिनमें खेल को बढ़ावा देने से लेकर मनोरंजन गतिविधियां शामिल हैं, जिससे कि छात्रों को स्कूलों में वापस लाया जा सके। स्थिति में अब सुधार हो रहा है।
सर्वे में भी शिक्षकों की कमी
बता दें कि झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लिए झारखंड सरकार द्वारा स्थापित एक स्वायत्त निकाय है। जबकि कक्षा एक से पांच तक प्राथमिक स्तर की शिक्षा है। कक्षा 06 से 08 में उच्च-प्राथमिक स्तर शामिल है। भारत ज्ञान विज्ञान समिति (झारखंड) द्वारा कराए गए सर्वे- 'ग्लूम इन द क्लासरूम: द स्कूलिंग क्राइसिस इन झारखंड' में भी शिक्षकों की भारी कमी पाई गई। बेल्जियम में जन्मे अर्थशास्त्री द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर शोधकर्ता परान अमिताव ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत निर्धारित केवल 20 प्रतिशत उच्च-प्राथमिक विद्यालयों और 50 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात 30 से कम है। रिपोर्ट के लिए सर्वे किए गए 138 स्कूलों में से 20 प्रतिशत में एक ही शिक्षक था। इन स्कूलों में प्राथमिक स्तर के शिक्षकों में पैरा-शिक्षकों का बहुमत 55 प्रतिशत था। वहीं उच्च-प्राथमिक स्तर पर यह आंकड़ा 37 प्रतिशत था।
अस्थायी शिक्षकों द्वारा चलाए जा रहे स्कूल
लगभग 40 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों का सर्वेक्षण किया गया। ये सभी अस्थायी शिक्षकों द्वारा चलाए जा रहे थे। अर्थशास्त्री द्रेज ने कहा, पैरा-शिक्षकों के पास नियमित शिक्षकों की तुलना में कम योग्यता और कम प्रशिक्षण है, और यह संदेहास्पद है कि क्या वे अधिक जवाबदेह हैं। राज्य में पिछले छह वर्षों में कोई शिक्षक भर्ती नहीं की गई। इसके साथ ही सर्वेक्षण में शामिल किसी भी स्कूल में शौचालय, बिजली या पानी की आपूर्ति नहीं थी। रिपोर्ट में इस बात का भी दावा किया गया है।
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