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IIT Guwahati: आईआईटी के शोधकर्ताओं का कमाल! खोजी धातु विषाक्तता की पहचान के लिए सस्ती और प्रभावी तकनीक

Mon, 27 Jan 2025 04:30 PM IST
आकाश कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: आकाश कुमार Updated Mon, 27 Jan 2025 04:30 PM IST
सार

IIT Guwahati: आईआईटी, गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने जीवित कोशिकाओं और पर्यावरण में हानिकारक धातुओं की मौजूदगी का पता लगाने के लिए एक सस्ता और प्रभावी तरीका विकसित किया है। अधिकारियों के अनुसार, इससे रोग निदान और पर्यावरण निगरानी में मदद होगी।
 

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IIT-Guwahati develops state-of-the-art nanomaterial for mercury detection in living cells, environment
आईआईटी गुवाहाटी। - फोटो : IIT Guwahati Website

विस्तार

IIT Guwahati: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक सस्ता और प्रभावी तरीका विकसित किया है, जिससे जीवित कोशिकाओं और पर्यावरण में हानिकारक धातुओं का पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक बीमारी के निदान और पर्यावरण निगरानी को बेहतर बनाकर धातु विषाक्तता (metal toxicity) की पहचान और प्रबंधन में मदद कर सकती है।

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शोधकर्ताओं ने पेरोव्स्काइट नैनोक्रिस्टल्स नामक विशेष सामग्री का इस्तेमाल किया है। ये नैनोक्रिस्टल्स बहुत छोटे होते हैं (एक बाल की मोटाई से लाख गुना छोटे) और रोशनी के साथ खास तरह से प्रतिक्रिया करते हैं। इन्हें कोशिकाओं में फ्लोरोसेंट (चमकदार) जांच के रूप में उपयोग किया जा सकता है। हालांकि, पानी में जल्दी खराब होने की वजह से इनका उपयोग सीमित था।

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समस्या का समाधान

शोधकर्ताओं ने इन नैनोक्रिस्टल्स को सिलिका और पॉलिमर की कोटिंग से सुरक्षित किया, जिससे उनकी स्थिरता और चमक पानी में बढ़ गई। अब ये नैनोक्रिस्टल्स लंबे समय तक काम कर सकते हैं और विशेष तरंगदैर्ध्य की रोशनी में चमकते हुए हानिकारक पारे (mercury) का सटीक पता लगा सकते हैं।

पारे की पहचान और प्रभाव

  • पारा बहुत खतरनाक होता है और खाने-पीने, पानी, सांस, या त्वचा के संपर्क से शरीर में घुसकर नर्वस सिस्टम, अंगों और मानसिक क्षमताओं को नुकसान पहुंचा सकता है।
  • शोधकर्ताओं ने पाया कि ये नैनोक्रिस्टल्स बेहद संवेदनशील हैं और पारे को नैनोमोलर स्तर तक भी पहचान सकते हैं।
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सेफ्टी और अन्य उपयोग

  • जीवित कोशिकाओं पर किए गए परीक्षणों में ये नैनोक्रिस्टल्स गैर-विषैले साबित हुए और कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना पारे की पहचान कर सके।
  • इनका उपयोग सिर्फ पारे तक सीमित नहीं है। ये अन्य हानिकारक धातुओं की पहचान, दवाओं के वितरण और उपचार की निगरानी के लिए भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।


यह शोध बीमारी के निदान और पर्यावरण की सुरक्षा में बड़ा योगदान दे सकता है। इसकी जानकारी "Journal of Materials Chemistry C" और "Materials Today Chemistry" जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई है।

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